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प्रतिहार वंश का इतिहास
chalati patti
शनिवार, 16 जनवरी 2021
प्रतिहार कालीन ओसियां जैन मंदिर | Oshiya Jain Temple of Kshatriya Pratihar Dynasty
जोधपुर से 65 किलोमीटर दूर औसियाँ जैन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। इन मंदिरों का निर्माण क्षत्रिय प्रतिहार शासकों द्वारा करवाया गया था।
अन्य नाम
स्थानीय प्राचीन अभिलेखों से सूचित होता है कि ओसियां के कई नाम मध्य काल तक प्रचलित थे, जो हैं- 'उकेश', 'उपकेश', 'अकेश' आदि। किंवदंती है कि इसको प्राचीन काल में 'मेलपुरपत्तन' तथा 'नवनेरी' भी कहते थे। 'ओसवाल' जैनों का मूल स्थान ओसियां ही है।
राजपूत सम्राट वत्सराज प्रतिहार (778-794 ईस्वी) के समय निर्मित महावीर स्वामी का मंदिर स्थापत्य का उत्कृष्ट नमूना है, इसके अतिरिक्त सच्चिया माता का मंदिर, सूर्य मंदिर, हरीहर मंदिर इत्यादि प्रतिहार कालीन स्थापत्य कला के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। ये मंदिर प्रतिहार शैली में निर्मित है।
वत्सराज ने औसियां के मंदिरों का निर्माण करवाया। औसियां सूर्य व जैन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। इसके समय उद्योतन सूरी ने "कुवलयमाला" की रचना 778 में जालौर में की। औसियां के मंदिर महामारू शैली में बने है। लेकिन औसियां का हरिहर मंदिर पंचायतन शैली में बना है।
-औसियां राजस्थान में प्रतिहारों का प्रमुख केन्द्र था।
-औसिंया (जोधपुर)के मंदिर प्रतिहार कालीन है।
-औसियां को राजस्थान को भुवनेष्वर कहा जाता है।
-औसियां में औसिया माता या सच्चिया माता (ओसवाल जैनों की देवी)ओर सांखला राजपूतों की कुलदेवी का मंदिर है जिसमें महिसासुर मर्दनी की प्रतिमा है।
ओसियां (Osiyan) एक प्राचीन पश्चिमी भारत में राजस्थान के जोधपुर जिले राज्य में स्थित शहर है। यह थार रेगिस्तान में नखलिस्तान की है, और अपने मंदिरों के लिए "राजस्थान का खजुराहो" के रूप में जाना जाता रहा है। शहर में एक पंचायत गांव और ओसियां तहसील का मुख्यालय भी है। यह जोधपुर में जिला मुख्यालय के उत्तर में सड़क मार्ग से 69 किमी (43 मील) निहित है, मुख्य जोधपुर से दूर एक मोड़ पर - बीकानेर राजमार्ग।
ओसियां को प्रतिहार शैली के 8वी से 11 वीं सदी के टूटे मंदिरों के घर के रूप में प्रसिद्ध है। शहर प्रतिहार राजवंश के दौरान मारवाड़ के राज्य का एक प्रमुख धार्मिक केंद्र था। समूह में 18 मंदिरों में से,
* सूर्य मंदिर
* काली मंदिर,
* सच्चियाय माता मंदिर
* और मुख्य जैन महावीर को समर्पित एक मंदिर उनकी कृपा और वास्तुकला में बाहर खड़ा है।
राजपूत सम्राट वत्सराज प्रतिहार के समय से ही जैनत्व के काफी निकट रहे हैं ओसिया के महावीर मंदिर हम सच्चियाय माता मंदिर एवं सूर्य मंदिर इसके प्रत्यक्ष प्रमाण है उसके पश्चात महेंद्र पाल प्रतिहार के पुत्र रत्नपाल प्रतिहार हुए जिन्हें रत्न सुरी के नाम से जाना जाता है उन्होंने ओसिया नगरी के 140000 नागरिकों को जैन धर्म में दीक्षित किया था(बहुत से प्रतिहार राजपूतों ने जैन धर्म अपनाया था) तत्पश्चात राज्यपाल की युद्ध नहीं करने की नीति के चलते उसकी हत्या कर दी गई उनके वंशजों की रक्षा की खातिर वे लोग सभी रावल शाखा के सानिध्य में आकर अपने जैन धर्म को अनुसरण करते हुए आगे बढ़ने लगे यहां तक कि उन्होंने अपना गोत्र भी बदल दिया एवं नए वंश की स्थापना करी जिसे ओसिया से निकलने के कारण ओसवाल वंश कहा जाता है
प्रतिहार राजपूतों के बारे में ओसिया के महावीर मंदिर का लेख जो विक्रम संवत 1013(ईस्वी 956) का है तथा संस्कृत और देवनागरी लिपि में है,उसमे उल्लेख किया गया है कि-
तस्या कार्षात्कल प्रेम्णालक्ष्मण: प्रतिहारताम ततो अभवत प्रतिहार वंशो राम समुव:।।६।।
तदुंदभशे सबशी वशीकृत रिपु: श्री वत्स राजोडsभवत।
अर्थात लक्ष्मण ने प्रेमपूर्वक उनके प्रतिहारी का कार्य किया,अनन्तर श्री राम से प्रतिहार वंश की उत्पत्ति हुई। उस प्रतिहार वंश में वत्सराज हुआ। जिसने मन्दिरो का निर्माण करवाया।(प्रतिहार राजपूत वंश एक शुद्ध सूर्यवंशी रघुवंशी क्षत्रिय राजपूत वंश है )
ये शहर के एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र था। इस स्थिति को बनाए रखा, सैकड़ों साल के लिए हिंदू धर्म और जैन धर्म का प्रमुख केंद्र रहा। यह शहर अचानक खत्म हो गया जब 1195 में गौर के मोहम्मद की सेनाओं द्वारा हमला किया गया था।
सौजन्य:- श्री गाजण माता यूथ ब्रिगेड राजस्थान
जय मां चामुण्डा।।
जय मिहिरभोज।।
जय वत्सराज।।
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शनिवार, 2 जनवरी 2021
हुतात्मा ठाकुर मोहन सिंह मडाड(रघुवंशी प्रतिहार)=
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=हुतात्मा ठाकुर मोहन सिंह मडाड(रघुवंशी प्रतिहार)=

(यादगार अहमद की तवारीखें-सलतीने-अफगाना; इलियट एंड डौसन भाग 5; बाबरनामा, सर एडीलवर्ट टेबोलेट का अंग्रेजी अनुवाद पर आधारित)
ठाकुर मोहन सिंह मडाड का इतिहास साहस और शौर्य की परकाष्ठा है और भारत के इतिहास में जालौर के सोनीगारा चौहान वीरमदेव के बाद क्षत्रियों का शौर्य प्रदर्शित करने वाले इस दुर्लभ वीर पुरुष की जितनी प्रशंशा की जाय वह कम ही होगी क्योकि अल्प और सीमित साधन रहते हुए इन्होंने उस बाबर की समुद्र सी लहराती प्रबल सत्ता को चुनौती दी उसके अह्निर्श विजयों से उत्तर भारत थर थर काँप रहा था, इन्होंने उस महाबली बाबर को भी अपनी तलवार का पानी पिला कर छोड़ा।
यह घटना है सन 1530 की है| उस समय बाबर लाहौर में था और आगरा जाने की तैयारी में था। 4 मार्च सन् 1530 ईस्वी को बाबर ने लाहौर से आगरा जोन के लिए प्रस्थान किया।
सरहिंद पहुँचने पर उसे समाना के काजी ने उससे मुलाकात कर बताया की कैथल के मोहन सिंह मडाड (मंडहिर) नामक राजपूत ने उसकी इमलाक (जागीर) पर हमला करके उसे लूटकर जलाया और उसके बेटे को मार डाला। काजी की बात सुन के आग बबूला हुए बाबर ने फ़ौरन ही तीन हजार घुड़सवारों के साथ अली कुली हमदानी को कैथल परगना में ठाकुर मोहन सिंह मडाड के गाँव भेजा।
यादगार अहमद बताता है की अलसुबह मुग़लों की सेना ठाकुर मोहन सिंह मडाड के गाँव पहुँचीं उस समय गाँव में बारात आई हुयी थी। जोड़े का दिन था और उस दिन ठण्ड भी कुछ ज्यादा ही था। जब मुघल सेना की गाँव की तरफ कूच की खबर सुनी तब वह भी अपने नौजवानों के साथ बाहर निकला और सामने आते ही मडाडों ने तेजी से वाणों की वर्षा करते हुए शाही सेना के पाँव उखाड़ दिए। इस भयंकर युद्ध में 1 हजार तुर्क मारे गए शेष भाग कर पास के ही एक जंगल में छिप गए।
यादगार अहमद को शर्मिंदगी उठाते हुए भी इस घटना का जिक्र करना पड़ा और उसने हार का बहाना बनाते हुए लिखा के जाड़े की दिनों में तुर्की धनुष की तांत अकड़ जाती है इस वजह से तुर्क कायदे से धनुष पर बाण चढ़ा ही नहीं सके।
जंगल में पहुचने के बाद तुर्कों ने लकड़ियाँ इकट्ठी कर के उसमे आग जलाकर पूरी तरह तापा और आग से धनुष की तांत को ढीला कर फर से योजना बनाकर एक बार फिर मोहन के गाँव की और बढ़ने लगे। तुर्कों की इस धृष्टता को देखकर राजपूतों की आँखों में खून उतर आया और उन्होंने दुगने उत्साह से तुर्कों से मुकाबला किया। इस बार भी बहुत सारे शाही सैनिक मारे गए। बाकि सैनिको को लेकर अली खान हमदानी भाग चला और सरहिंद पहुँच कर ही साँस ली।
शाही सेना की हार सुनकर बाबर शर्मसार होते हुए ठाकुर मोहन सिंह मडाड के नाश का संकल्प लेते हुए तुरन्त 6000 घुड़सवार सैनिकों के साथ अपने सिपहसालार तरसम बहादुर और नौरंगवेग को भेजा जो पानीपत दोनों युद्धों में अपनी तलवार और तीर का जौहर दिखा चुके थे। इन्होंने छोटे मोटे युद्ध तो देखे ही नहीं थे बड़ी बड़ी लड़ाइयों में अपनी योग्यता दिखाने का आनंद आता था। ठाकुर मोहन सिंह मडाड के पराकम की कहानी अली कुली हमदानी के मुँह से तरसेम बेग ने सुनी थी। हमदानी संकोच करते हुए बेग को बताता है की अब तक लड़ीं हुईं लड़ाइयों में सिर्फ ठाकुर मोहन सिंह मडाड ने ही उसकी पीठ देखी है।
सरहिंद से चलते चलते तरसेम बेग ने सोचा की मोहन सिंह जरूर विशेष किस्म का बहादुर व्यक्ति होगा नहीं तो सब ओअर गालियाँ न्योछावर करने वाला अली कुली मोहन सिंह के तारीफों के पुल नहीं बाँधता। रास्ता तय करते हुए उसने सोच लिया के दुश्मन को सिर्फ बल से नहीं छल से मारना और हराना होगा।
ठाकुर मोहन सिंह मडाड के गांव के नजदीक आने पर तरसेम बेग ने अपने सैनिकों को तीन भागों में बाँट दिया। हरावल दस्ते को यह हिदायत दी की वे गाँव के पास जाकर मडाडों को ललकारें। जब ललकार सुनकर राजपूत गाँव से बाहर युध्द के लिए आग बाबुल होकर निकलें तो हरावल दस्ता भाग चले और भागते जाए इसी बीच उसकी राइट विंग गाँव को घेर ले और उसमें आग लगा दे इस विंग की कमांड उसने खुद अपने हाथों में ली और नौरंग बेग के हाथों में 2 हजार घुड़सवारों की सेना रिजर्व रखी। जब मडाड बीच में घिर जाएँ तब उन पर जोरदार करना इस दस्ते का काम था।
यादगार अहमद बताता है के जिस दिन जब शाही सेना ठाकुर मोहन सिंह मडाड के गाँव पहुची संयोग वष उस दिन भी गांव में बारात आई हुई थी।
जब शाही सेना का हरावल दस्ता गाँव के नजदीक पहुँचा तो योजना अनुसार उन्होंने मडाडों को ललकारा तब मडाडों की नस नस में चिंगारी दौड़ पङी और वह तुरन्त तैयार होकर बहार निकले और शाही सेना पर तीरों की बौछार करने लगे।राजपूतों के आम के साथ ही पूर्व योजनानुसार शाही सेना पश्चिम की ओर भागने लगी और क्षत्रियों ने उनका तेजी से पीछा किया। शाही सेना भागती रही और राजपूत सेना उसका पीछा करती रही इसी बीच तरसेम बेग की टुकड़ी ने राजपूत विहीन गाँव में आग लगा दी। जब राजपूतों ने गाँव से उमड़ता हुआ धुँआ देखा तो वग वापिस लौटे। उनके पीछे मुड़ते ही भागती हुई सेना लौटने लगी। इस प्रकार राजपूतों की सेना शाही सेना के बीच फंस गयी। इसी समय नौरंगबेग अपनी सेना के साथ राजपूतों पर टूट पड़ा। चारों और से घिरने के बाद भी राजपूत वीरता और शौर्य से लड़े उधर गाँव धु धु करता जलता रहा। राजपूत शाही सेना के इस छल को नहीं समझ पाए और पूरा साहस और पराक्रम होते हुए भी इन्हें पराजित होना पड़ा।
इस युद्ध में एक हजार वीर राजपूत शहीद हुए । ठाकुर मोहन सिंह अंत तक लड़ते रहे परन्तु कब तक ? आखिर उन्हें भी पृथ्वीराज चौहान की तरह कैदी बनना पड़ा। उस दिन हजारों नर नारियों और बच्चों को शाही सेना ने कैद कर लिया और मोहन सिंह के साथ उन कैदियों को दिल्ली ले जाया गया क्योकि तब तक बाबर सरहिंद से रवाना होकर दिल्ली पहुँच गया था।
दिल्ली दरबार में ठाकुर मोहन सिंह मडाड की पेशी हुई और बाबर ने इन्हें सजा ए मौत का फरमान सुनाया पर साथ साथ यह भी कहा यदि ठाकुर मोहन सिंह मडाड इस्लाम कबूल लेतें है तो उनकी सजा माफ़ कर दी जायेगी। ठाकुर साहब चाहते तो मुस्लिम बनकर अपने प्राण बचा सकते थे परन्तु उस योद्धा को जीवन से प्यारा वह मूल्य था जो क्षत्रियों के लिए अभिप्रीत था उनका धर्म। मोहन सिंह मडाड ने यह साबित कर दिया के वह एक सच्चे प्रतिहार और रघुवंशी थे जिनकी रीत में ही प्राणों से पहले वचन और धर्म की रक्षा करना है।
सिजदा से गर वहिश्त मिले दूर कीजिये,
दोजख ही सही सर को झुकाना नहीं अच्छा।
बेटा तूं राजपूत, याद सदा ही राखिजे,
माथा झुके न सूत, चाहे शीश ही कटिजे।।
==== मृत्युंजय मोहन ====
स्वाभिमानी ठाकुर मोहन अपना सर नहीं झुका सका और ख़ुशी ख़ुशी मृत्यु को आलिंगन करते हुए आगे बढे।क्षत्रियों के इस वारिस को बाबर ने एक विषेश प्रकार की विधि से मौत देने का फैसला किया।
ठाकुर मोहन सिंह को कमर तक मिटटी में दफना दिया गया और शाही सेना ने उनपर तीरों की बौछारें शुरू कर दी। सैकड़ों तीर देखते ही देखते ठाकुर मोहन सिंह का शरीर भेदने लगे। उनके शरीर से खून की फुहारें छूटने लगीं परन्तु गर्दन और शीश बाबर के सामने तना खड़ा रहा। वह अभी भी नहीं झुका जिससे बाबर झल्ला उठा। जब तक रक्त की अंतिम बूँद ठाकुर मोहन सिंह के शरीर से नहीं छुटी वह तन के खड़े रहे और देखने वाले भी हैरानी से देखते रहे की इतनी आघातों के बाद भी उनके चेहरे पर दर्द और पीड़ा नहीं छलक रही थी जैसे वह संवेदनहीन ही हो गए हो। अंत में ठाकुर मोहन सिंह जी का शीश धरती माँ को वंदन करते हुए छु पड़ा और उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।
ठाकुर मोहन सिंह मर कर भी अमर हो गए। उन्होंने दो बार शाही सेना को अपने शौर्य से पराजित किया जिससे बाबर लज्जित हुआ उसने अपनी आत्म कथा तजुके बाबरी में जहाँ छोटी छोटी बातें भी दर्ज कर लीं थी वहीं शर्मिन्दिगी के कारण इस प्रसंग को छोड़ दिया। इस महत्वपूर्ण घटना का पूर्ण विवरण हुमायूँ कालीन यादगार अहमद ने अपनी तवारीख ए सलातीने अफगाना में दिया।
इस युद्ध में मुआँना गाँव के परम् योद्धा ठाकुर मामचन्द मडाड भी शाही सेना के साथ युद्ध करते हुए शहीद हुए वे ठाकुर मोहन सिंह के रिसालदार थे, जिनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी कपूर कँवर सतीं हूईं। जिनकी देवली मुआँना गाँव तहसील सफीदों जिला जींद हरयाणा में आज तक बनीं हुई है जहाँ शादी के बाद हर नव विवाहिता राजपूत क्षत्राणी आशीर्वाद और सौभाग्य लेने जाती है।
=== संदर्भ ===
1. डॉक्टर विंद्यराज चौहान कृत भारत के प्रहरी प्रतिहार वंश।
2. ब्रिटिश कालीन करनाल गजट
3. ठाकुर ईश्वर सिंह मडाड कृत राजपूत वंशवालीव

(यादगार अहमद की तवारीखें-सलतीने-अफगाना; इलियट एंड डौसन भाग 5; बाबरनामा, सर एडीलवर्ट टेबोलेट का अंग्रेजी अनुवाद पर आधारित)
ठाकुर मोहन सिंह मडाड का इतिहास साहस और शौर्य की परकाष्ठा है और भारत के इतिहास में जालौर के सोनीगारा चौहान वीरमदेव के बाद क्षत्रियों का शौर्य प्रदर्शित करने वाले इस दुर्लभ वीर पुरुष की जितनी प्रशंशा की जाय वह कम ही होगी क्योकि अल्प और सीमित साधन रहते हुए इन्होंने उस बाबर की समुद्र सी लहराती प्रबल सत्ता को चुनौती दी उसके अह्निर्श विजयों से उत्तर भारत थर थर काँप रहा था, इन्होंने उस महाबली बाबर को भी अपनी तलवार का पानी पिला कर छोड़ा।
यह घटना है सन 1530 की है| उस समय बाबर लाहौर में था और आगरा जाने की तैयारी में था। 4 मार्च सन् 1530 ईस्वी को बाबर ने लाहौर से आगरा जोन के लिए प्रस्थान किया।
सरहिंद पहुँचने पर उसे समाना के काजी ने उससे मुलाकात कर बताया की कैथल के मोहन सिंह मडाड (मंडहिर) नामक राजपूत ने उसकी इमलाक (जागीर) पर हमला करके उसे लूटकर जलाया और उसके बेटे को मार डाला। काजी की बात सुन के आग बबूला हुए बाबर ने फ़ौरन ही तीन हजार घुड़सवारों के साथ अली कुली हमदानी को कैथल परगना में ठाकुर मोहन सिंह मडाड के गाँव भेजा।
यादगार अहमद बताता है की अलसुबह मुग़लों की सेना ठाकुर मोहन सिंह मडाड के गाँव पहुँचीं उस समय गाँव में बारात आई हुयी थी। जोड़े का दिन था और उस दिन ठण्ड भी कुछ ज्यादा ही था। जब मुघल सेना की गाँव की तरफ कूच की खबर सुनी तब वह भी अपने नौजवानों के साथ बाहर निकला और सामने आते ही मडाडों ने तेजी से वाणों की वर्षा करते हुए शाही सेना के पाँव उखाड़ दिए। इस भयंकर युद्ध में 1 हजार तुर्क मारे गए शेष भाग कर पास के ही एक जंगल में छिप गए।
यादगार अहमद को शर्मिंदगी उठाते हुए भी इस घटना का जिक्र करना पड़ा और उसने हार का बहाना बनाते हुए लिखा के जाड़े की दिनों में तुर्की धनुष की तांत अकड़ जाती है इस वजह से तुर्क कायदे से धनुष पर बाण चढ़ा ही नहीं सके।
जंगल में पहुचने के बाद तुर्कों ने लकड़ियाँ इकट्ठी कर के उसमे आग जलाकर पूरी तरह तापा और आग से धनुष की तांत को ढीला कर फर से योजना बनाकर एक बार फिर मोहन के गाँव की और बढ़ने लगे। तुर्कों की इस धृष्टता को देखकर राजपूतों की आँखों में खून उतर आया और उन्होंने दुगने उत्साह से तुर्कों से मुकाबला किया। इस बार भी बहुत सारे शाही सैनिक मारे गए। बाकि सैनिको को लेकर अली खान हमदानी भाग चला और सरहिंद पहुँच कर ही साँस ली।
शाही सेना की हार सुनकर बाबर शर्मसार होते हुए ठाकुर मोहन सिंह मडाड के नाश का संकल्प लेते हुए तुरन्त 6000 घुड़सवार सैनिकों के साथ अपने सिपहसालार तरसम बहादुर और नौरंगवेग को भेजा जो पानीपत दोनों युद्धों में अपनी तलवार और तीर का जौहर दिखा चुके थे। इन्होंने छोटे मोटे युद्ध तो देखे ही नहीं थे बड़ी बड़ी लड़ाइयों में अपनी योग्यता दिखाने का आनंद आता था। ठाकुर मोहन सिंह मडाड के पराकम की कहानी अली कुली हमदानी के मुँह से तरसेम बेग ने सुनी थी। हमदानी संकोच करते हुए बेग को बताता है की अब तक लड़ीं हुईं लड़ाइयों में सिर्फ ठाकुर मोहन सिंह मडाड ने ही उसकी पीठ देखी है।
सरहिंद से चलते चलते तरसेम बेग ने सोचा की मोहन सिंह जरूर विशेष किस्म का बहादुर व्यक्ति होगा नहीं तो सब ओअर गालियाँ न्योछावर करने वाला अली कुली मोहन सिंह के तारीफों के पुल नहीं बाँधता। रास्ता तय करते हुए उसने सोच लिया के दुश्मन को सिर्फ बल से नहीं छल से मारना और हराना होगा।
ठाकुर मोहन सिंह मडाड के गांव के नजदीक आने पर तरसेम बेग ने अपने सैनिकों को तीन भागों में बाँट दिया। हरावल दस्ते को यह हिदायत दी की वे गाँव के पास जाकर मडाडों को ललकारें। जब ललकार सुनकर राजपूत गाँव से बाहर युध्द के लिए आग बाबुल होकर निकलें तो हरावल दस्ता भाग चले और भागते जाए इसी बीच उसकी राइट विंग गाँव को घेर ले और उसमें आग लगा दे इस विंग की कमांड उसने खुद अपने हाथों में ली और नौरंग बेग के हाथों में 2 हजार घुड़सवारों की सेना रिजर्व रखी। जब मडाड बीच में घिर जाएँ तब उन पर जोरदार करना इस दस्ते का काम था।
यादगार अहमद बताता है के जिस दिन जब शाही सेना ठाकुर मोहन सिंह मडाड के गाँव पहुची संयोग वष उस दिन भी गांव में बारात आई हुई थी।
जब शाही सेना का हरावल दस्ता गाँव के नजदीक पहुँचा तो योजना अनुसार उन्होंने मडाडों को ललकारा तब मडाडों की नस नस में चिंगारी दौड़ पङी और वह तुरन्त तैयार होकर बहार निकले और शाही सेना पर तीरों की बौछार करने लगे।राजपूतों के आम के साथ ही पूर्व योजनानुसार शाही सेना पश्चिम की ओर भागने लगी और क्षत्रियों ने उनका तेजी से पीछा किया। शाही सेना भागती रही और राजपूत सेना उसका पीछा करती रही इसी बीच तरसेम बेग की टुकड़ी ने राजपूत विहीन गाँव में आग लगा दी। जब राजपूतों ने गाँव से उमड़ता हुआ धुँआ देखा तो वग वापिस लौटे। उनके पीछे मुड़ते ही भागती हुई सेना लौटने लगी। इस प्रकार राजपूतों की सेना शाही सेना के बीच फंस गयी। इसी समय नौरंगबेग अपनी सेना के साथ राजपूतों पर टूट पड़ा। चारों और से घिरने के बाद भी राजपूत वीरता और शौर्य से लड़े उधर गाँव धु धु करता जलता रहा। राजपूत शाही सेना के इस छल को नहीं समझ पाए और पूरा साहस और पराक्रम होते हुए भी इन्हें पराजित होना पड़ा।
इस युद्ध में एक हजार वीर राजपूत शहीद हुए । ठाकुर मोहन सिंह अंत तक लड़ते रहे परन्तु कब तक ? आखिर उन्हें भी पृथ्वीराज चौहान की तरह कैदी बनना पड़ा। उस दिन हजारों नर नारियों और बच्चों को शाही सेना ने कैद कर लिया और मोहन सिंह के साथ उन कैदियों को दिल्ली ले जाया गया क्योकि तब तक बाबर सरहिंद से रवाना होकर दिल्ली पहुँच गया था।
दिल्ली दरबार में ठाकुर मोहन सिंह मडाड की पेशी हुई और बाबर ने इन्हें सजा ए मौत का फरमान सुनाया पर साथ साथ यह भी कहा यदि ठाकुर मोहन सिंह मडाड इस्लाम कबूल लेतें है तो उनकी सजा माफ़ कर दी जायेगी। ठाकुर साहब चाहते तो मुस्लिम बनकर अपने प्राण बचा सकते थे परन्तु उस योद्धा को जीवन से प्यारा वह मूल्य था जो क्षत्रियों के लिए अभिप्रीत था उनका धर्म। मोहन सिंह मडाड ने यह साबित कर दिया के वह एक सच्चे प्रतिहार और रघुवंशी थे जिनकी रीत में ही प्राणों से पहले वचन और धर्म की रक्षा करना है।
सिजदा से गर वहिश्त मिले दूर कीजिये,
दोजख ही सही सर को झुकाना नहीं अच्छा।
बेटा तूं राजपूत, याद सदा ही राखिजे,
माथा झुके न सूत, चाहे शीश ही कटिजे।।
==== मृत्युंजय मोहन ====
स्वाभिमानी ठाकुर मोहन अपना सर नहीं झुका सका और ख़ुशी ख़ुशी मृत्यु को आलिंगन करते हुए आगे बढे।क्षत्रियों के इस वारिस को बाबर ने एक विषेश प्रकार की विधि से मौत देने का फैसला किया।
ठाकुर मोहन सिंह को कमर तक मिटटी में दफना दिया गया और शाही सेना ने उनपर तीरों की बौछारें शुरू कर दी। सैकड़ों तीर देखते ही देखते ठाकुर मोहन सिंह का शरीर भेदने लगे। उनके शरीर से खून की फुहारें छूटने लगीं परन्तु गर्दन और शीश बाबर के सामने तना खड़ा रहा। वह अभी भी नहीं झुका जिससे बाबर झल्ला उठा। जब तक रक्त की अंतिम बूँद ठाकुर मोहन सिंह के शरीर से नहीं छुटी वह तन के खड़े रहे और देखने वाले भी हैरानी से देखते रहे की इतनी आघातों के बाद भी उनके चेहरे पर दर्द और पीड़ा नहीं छलक रही थी जैसे वह संवेदनहीन ही हो गए हो। अंत में ठाकुर मोहन सिंह जी का शीश धरती माँ को वंदन करते हुए छु पड़ा और उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।
ठाकुर मोहन सिंह मर कर भी अमर हो गए। उन्होंने दो बार शाही सेना को अपने शौर्य से पराजित किया जिससे बाबर लज्जित हुआ उसने अपनी आत्म कथा तजुके बाबरी में जहाँ छोटी छोटी बातें भी दर्ज कर लीं थी वहीं शर्मिन्दिगी के कारण इस प्रसंग को छोड़ दिया। इस महत्वपूर्ण घटना का पूर्ण विवरण हुमायूँ कालीन यादगार अहमद ने अपनी तवारीख ए सलातीने अफगाना में दिया।
इस युद्ध में मुआँना गाँव के परम् योद्धा ठाकुर मामचन्द मडाड भी शाही सेना के साथ युद्ध करते हुए शहीद हुए वे ठाकुर मोहन सिंह के रिसालदार थे, जिनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी कपूर कँवर सतीं हूईं। जिनकी देवली मुआँना गाँव तहसील सफीदों जिला जींद हरयाणा में आज तक बनीं हुई है जहाँ शादी के बाद हर नव विवाहिता राजपूत क्षत्राणी आशीर्वाद और सौभाग्य लेने जाती है।
=== संदर्भ ===
1. डॉक्टर विंद्यराज चौहान कृत भारत के प्रहरी प्रतिहार वंश।
2. ब्रिटिश कालीन करनाल गजट
3. ठाकुर ईश्वर सिंह मडाड कृत राजपूत वंशवालीव
शुक्रवार, 1 जनवरी 2021
Lulawat pratihar/parihar rajput logo...पड़िहार राजपूत लोगो
Lulawat pratihar rajput logo।। it's a branch of Pratihar rajput dynasty and present time known as parihar rajput and lives in rajasthan....
रविवार, 13 सितंबर 2020
7वीं शताब्दी में हुआ सुंदेलाव तालाब का निर्माण, राजपूत सम्राट नागभट्ट प्रतिहार अपनी मां की याद में बनाया था sundelav jalore
7वीं शताब्दी में हुआ सुंदेलाव तालाब का निर्माण, 147.4 बीघा है भराव क्षेत्र
1300 साल पहले सातवीं शताब्दी में प्रतिहार राजा नागभट्ट ने अपनी माता सुंदरादेवी की याद में इस तालाब का निर्माण करवाया था। उस समय राजा-महाराजा समेत शहरवासियों के पेयजल के लिए इस तालाब के पानी का उपयोग किया जाता था। तालाब 196.25 बीघा क्षेत्र में फैला था, लेकिन तालाब के आसपास कॉलोनियां आबाद हाेने के चलते अब इस तालाब का भराव क्षेत्र 147.4 बीघा क्षेत्र ही रह गया है।
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सौजन्य:- श्री गाजण माता यूथ ब्रिगेड राजस्थान @ जालौर दुर्ग
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