EXPOSE GUJARS :- सम्राट मिहिर भोज प्रतिहार गुर्जर या राजपूत? आईये इसके ऊपर विश्लेषण करते हैं। .
जीवन परिचय सनातन धर्म रक्षक सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार (1) सम्राट मिहिरभोज का जन्म विक्रम संवत 873 (816 ईस्वी) को हुआ था। आपको कई नाम से जाना जाता है जैसे भोजराज, भोजदेव , मिहिर , आदिवराह एवं प्रभास। (2) आपका राज्याभिषेक विक्रम संवत 893 यानी 18 अक्टूबर दिन बुधवार 836 ईस्वी में 20 वर्ष की आयु में हुआ था। और इसी दिन 18 अक्टूबर को ही हर वर्ष भारत में आपकी जयंती मनाई जाती है। (3) इनके दादा का नाम नागभट्ट द्वितीय था उनका स्वर्गवास विक्रम संवत 890 (833 ईस्वी) भादो मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को हुआ। इनके पिता का नाम रामभद्र और माता का नाम अप्पादेवी था। माता पिता ने सूर्य की उपासना की थी जिसके फलस्वरूप उन्हें मिहिरभोज के रुप मे पुत्र की प्राप्ति हुई थी। (4) सम्राट मिहिरभोज की पत्नी का नाम चंद्रभट्टारिका देवी था। जो भाटी राजपूत वंश की थी। इनके पुत्र का नाम महेन्द्रपाल प्रतिहार था जो सम्राट मिहिरभोज के स्वर्गवास उपरांत कन्नौज की गद्दी पर बैठे। (5) विक्रम संवत 945 (888 ईस्वी) 72 वर्ष की आयु में सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार का स्वर्गवास हुआ।
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सम्राट मिहिर भोज प्रतिहार अथवा परिहार/पड़िहार वंश के क्षत्रिय थे। मनुस्मृति में प्रतिहार, पड़िहार, पढ़ियार, परिहार शब्दों का प्रयोग हुआ हैं। परिहार एक तरह से क्षत्रिय शब्द का पर्यायवाची है। क्षत्रिय वंश की इस शाखा के मूल पुरूष भगवान राम के भाई लक्ष्मण माने जाते हैं। लक्ष्मण का उपनाम, प्रतिहार, होने के कारण उनके वंशज प्रतिहार, कालांतर में परिहार/पड़िहार कहलाएं। कुछ जगहों पर इन्हें अग्निवंशी बताया गया है, पर ये मूलतः सूर्यवंशी हैं। पृथ्वीराज विजय, हरकेलि नाटक, ललित विग्रह नाटक, हम्मीर महाकाव्य पर्व (एक) मिहिर भोज की ग्वालियर प्रशस्ति में परिहार वंश को सूर्यवंशी ही लिखा गया है। लक्ष्मण के पुत्र अंगद जो कि कारापथ (राजस्थान एवं पंजाब) के शासक थे, उन्ही के वंशज परिहार/पड़िहार है।
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इस वंश की उत्पत्ति के संबंध में प्राचीन साहित्य,ग्रन्थ और शिलालेख आदि क्या कहते है इसपर भी प्रकाश डालते है।
१) सोमदेव सूरी ने सन ९५९ में यशस्तिलक चम्पू में गुर्जर देश का वर्णन किया है। वह लिखता है कि न केवल प्रतिहार बल्कि चावड़ा,चालुक्य,आदि वंश भी इस देश पर राज करने के कारण गुर्जर कहलाये।
२) विद्व शाल मंजिका,सर्ग १,श्लोक ६ में राजशेखर ने कन्नौज के प्रतिहार राजा भोजदेव के पुत्र महेंद्र को रघुकुल तिलक अर्थात सूर्यवंशी क्षत्रिय बताया है।
३)कुमारपाल प्रबंध के पृष्ठ १११ पर भी गुर्जर देश का वर्णन है...
कर्णाटे,गुर्जरे लाटे सौराष्ट्रे कच्छ सैन्धवे।
उच्चाया चैव चमेयां मारवे मालवे तथा।।
४) महाराज कक्कूड का घटियाला शिलालेख भी इसे लक्ष्मण का वंश प्रमाणित करता है....अर्थात रघुवंशी
रहुतिलओ पड़ीहारो आसी सिरि लक्खणोत्रि रामस्य।
तेण पड़िहार वन्सो समुणई एत्थ सम्प्तो।।
५) बाउक प्रतिहार के जोधपुर लेख से भी इनका रघुवंशी होना प्रमाणित होता है।(९ वी शताब्दी)
स्वभ्राता राम भद्रस्य प्रतिहार्य कृतं सतः।
श्री प्रतिहारवड शोयमत श्रोन्नतिमाप्युयात।
इस शिलालेख के अनुसार इस वंश का शासनकाल गुजरात में प्रकाश में आया था।
६) चीनी यात्री हुएन्त त्सांग ने गुर्जर राज्य की राजधानी पीलोमोलो,भीनमाल या बाड़मेर कहा है।
कुक्कुस्थ(त्स्थ) मूल पृथवः क्ष्मापल कल्पद्रुमाः।
तेषां वंशे सुजन्मा क्रमनिहतपदे धाम्नि वज्रैशु घोरं,
राम: पौलस्त्य हिन्श्रं क्षतविहित समित्कर्म्म चक्रें पलाशे:।
श्लाध्यास्त्स्यानुजो सौ मधवमदमुषो मेघनादस्य संख्ये,
सौमित्रिस्तिव्रदंड: प्रतिहरण विर्धर्य: प्रतिहार आसी।
तवुन्शे प्रतिहार केतन भृति त्रैलौक्य रक्षा स्पदे
देवो नागभट: पुरातन मुने मुर्तिर्ब्बमूवाभदुतम।
अर्थात-सुर्यवंश में मनु,इश्वाकू,कक्कुस्थ आदि राजा हुए,उनके वंश में पौलस्त्य(रावण) को मारने वाले राम हुए,जिनका प्रतिहार उनका छोटा भाई सौमित्र(सुमित्रा नंदन लक्ष्मण) था,उसके वंश में नागभट हुआ। इसी प्रशस्ति के सातवे श्लोक में वत्सराज के लिए लिखा है क़ि उस क्षत्रिय पुंगव(विद्वान्) ने बलपूर्वक भड़ीकुल का साम्राज्य छिनकर इश्वाकू कुल की उन्नति की।
८) देवो यस्य महेन्द्रपालनृपति: शिष्यों रघुग्रामणी:(बालभारत,१/११)
तेन(महिपालदेवेन)च रघुवंश
मुक्तामणिना(बालभारत)
बालभारत में भी महिपालदेव को रघुवंशी कहा है।
९)ओसिया के महावीर मंदिर का लेख जो विक्रम संवत १०१३(ईस्वी ९५६) का है तथा संस्कृत और देवनागरी लिपि में है,उसमे उल्लेख किया गया है कि-
तस्या कार्षात्कल प्रेम्णालक्ष्मण: प्रतिहारताम ततो अभवत प्रतिहार वंशो राम समुव:।।६।।
तदुंदभशे सबशी वशीकृत रिपु: श्री वत्स राजोडsभवत।
अर्थात लक्ष्मण ने प्रेमपूर्वक उनके प्रतिहारी का कार्य किया,अनन्तर श्री राम से प्रतिहार वंश की उत्पत्ति हुई। उस प्रतिहार वंश में वत्सराज हुआ।
१०) गौडेंद्रवंगपतिनिर्ज्जयदुर्व्विदग्धसदगुर्ज्जरेश्वरदिगर्ग्गलतां च यस्य।
नीत्वा भुजं विहतमालवरक्षणार्त्थ स्वामी तथान्यमपि राज्यछ(फ) लानि भुंक्ते।।
-बडोदे का दानपत्र,Indian Antiquary,Vol 12,Page 160
उक्त ताम्रपत्र के 'गुजरेश्वर' एद का अर्थ 'गुर्जर देश(गुजरात) का राजा' स्पष्ट है,जिसे खिंच तानकर गुर्जर जाती या वंश का राजा मानना सर्वथा असंगत है। संस्कृत साहित्य में कई ऐसे उदाहरण मिलते है।
ये लेख गुजरेश्वर,गुर्जरात्र,गुज्जुर इन संज्ञाओ का सही मायने में अर्थ कर इसे जाती सूचक नहीं स्थान सूचक सिद्ध करता है जिससे भगवान्लाल इन्द्रजी,देवदत्त रामकृष्ण भंडारकर,जैक्सन तथा अन्य सभी विद्वानों के मतों को खारिज करता है जो इस सज्ञा के उपयोग से प्रतिहारो को गुर्जर मानते है।
११) कुशनवंशी राजा कनिष्क के समय में गुर्जरों का भारतवर्ष में आना प्रमाणशून्य बात है,जिसे स्वयं डॉ.भगवानलाल इन्द्रजी ने स्वीकार किया है,और गुप्तवंशियों के समय में गुजरो को राजपूताना,गुजरात और मालवे में जागीर मिलने के विषय में कोई प्रमाण नहीं दिया है। न तो गुप्त राजाओं के लेखो और भडौच से मिले दानपत्रों में इसका कही उल्लेख है।
१२)३६ राजवंशो की किसी भी सूची में इस वंश के साथ "गुर्जर" एद का प्रयोग नहीं किया गया है। यह तथ्य भी गुर्जर एद को स्थानसूचक सिद्धकर सम्बंधित एद का कोइ विशेष महत्व नही दर्शाता।
१३)ब्राह्मण उत्पत्ति के विषय में इस वंश के साथ द्विज,विप्र यह दो संज्ञाए प्रयुक्त की गई है,तो द्विज का अर्थ ब्राह्मण न होकर द्विजातिय(जनेउ) संस्कार से है न की ब्राह्मण से। ठीक इसी तरह विप्र का अर्थ भी विद्वान पंडित अर्थात "जिसने विद्वत्ता में पांडित्य हासिल किया हो" ही है।
१४) कुशनवंशी राजा कनिष्क के समय में गुर्जरों का भारतवर्ष में आना प्रमाणशून्य बात है,जिसे स्वयं डॉ.भगवानलाल इन्द्रजी ने स्वीकार किया है,और गुप्तवंशियों के समय में गुजरो को राजपूताना,गुजरात और मालवे में जागीर मिलने के विषय में कोई प्रमाण नहीं दिया है। न तो गुप्त राजाओं के लेखो और भडौच से मिले दानपत्रों में इसका कही उल्लेख है।
--प्रतिहार राजपूतो की वर्तमान स्थिति---
भले ही यह विशाल प्रतिहार राजपूत साम्राज्य बाद में खण्डित हो गया हो लेकिन इस वंश के वंशज राजपूत आज भी इसी साम्राज्य की परिधि में मिलते हैँ।
उत्तरी गुजरात और दक्षिणी राजस्थान में भीनमाल के पास जहाँ प्रतिहार वंश की शुरुआत हुई, आज भी वहॉ प्रतिहार राजपूत पड़िहार आदि नामो से अच्छी संख्या में मिलते हैँ।
प्रतिहारों की द्वितीय राजधानी मारवाड़ में मंडोर रही। जहाँ आज भी प्रतिहार राजपूतो की इन्दा, लुलावत,रामावत शाखाएं बड़ी संख्या में मिलती है। राठोड़ो के मारवाड़ आगमन से पहले इस क्षेत्र पर प्रतिहारों की इसी शाखा का शासन था जिनसे राठोड़ो ने जीत कर जोधपुर को अपनी राजधानी बनाया।
17वीं सदी में भी जब कुछ समय के लिये मुगलो से लड़ते हुए राठोड़ो को जोधपुर छोड़ना पड़ गया था तो स्थानीय इन्दा प्रतिहार राजपूतो ने अपनी पुरातन राजधानी मंडोर पर कब्जा कर लिया था।
इसके अलावा प्रतिहारों की अन्य राजधानी ग्वालियर और कन्नौज के बीच में प्रतिहार राजपूत परिहार के नाम से बड़ी संख्या में मिलते हैँ।
बुन्देल खंड में भी परिहारों की अच्छी संख्या है। यहाँ परिहारों का एक राज्य नागौद भी है जो मिहिरभोज के सीधे वंशज हैँ।
प्रतिहारों की एक शाखा राघवो का राज्य वर्तमान में उत्तर राजस्थान के अलवर, सीकर, दौसा में था जिन्हें कछवाहों ने हराया। आज भी इस क्षेत्र में राघवो की खडाड शाखा के राजपूत अच्छी संख्या में हैँ। इन्ही की एक शाखा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर, अलीगढ़, रोहिलखण्ड और दक्षिणी हरियाणा के गुडगाँव आदि क्षेत्र में बहुसंख्या में है। एक और शाखा मढाढ के नाम से उत्तर हरियाणा में मिलती है। व
उत्तर प्रदेश में सरयूपारीण क्षेत्र में भी प्रतिहार राजपूतो की विशाल कलहंस शाखा मिलती है। इनके अलावा संपूर्ण मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तरी महाराष्ट्र आदि में(जहाँ जहाँ प्रतिहार साम्राज्य फैला था) अच्छी संख्या में प्रतिहार/परिहार राजपूत मिलते हैँ।
प्रतिहार गुज्जर कैसे ??
-प्रतिहारो के गल्लका के लेख में स्पष्ट लिखा है के प्रतिहार सम्राट नागभट्ट जिन्हें गुर्जरा प्रतिहार वंश का संस्थापक भी माना जाता है ने गुर्जरा राज्य पर हमला कर गुज्जरों को गुर्जरा देश से बाहर खदेड़ा व अपना राज्य स्थापित किया... अगर प्रतिहार गुज्जर थे तो खुद को ही अपने देश में हराकर बाहर क्यों खड़ेंगे ?? मिहिर भोज के पिता प्रतिहार क्षत्रिय और पुत्र गुज्जर कैसे ??
- हरश्चरित्र में गुजरादेश का जिक्र बाण भट्ट ने एक राज्य एक भू भाग के रूप में किया है यही बात पंचतंत्र और कई विदेशी सैलानियों के रिकार्ड्स में भी पुख्ता होती है। इस गुर्जरा देस में गुज्जरों को खदेड़ने के बाद जिस भी वंश ने राज्य किया गुर्जरा नरपति या गुर्जर नरेश कहलाया। यदि गुज्जर विदेशी जाती है तो दक्षिण से आये हुए सोलंकी/चालुक्य जैसे वंश भी गुर्जरा पर फ़तेह पाने के बाद गुर्जरा नरेश या गुर्जरेश्वर क्यों कहलाये ?
- प्रतिहार राजा हरिश्चंद्र को मंडोर के शीलालेखों में द्विज लिखा है , जिनकी ब्राह्मण और क्षत्रिय पत्नियां थी । यह मिहिर भोज के भी पूर्वज थे। रिग वेद और मनुस्मृति के अनुसार द्विज केवल आर्य क्षत्रिय और ब्राह्मण जातियाँ ही हो सकती थीं। अगर हरिशन्द्र आर्य क्षत्रिय थे तो उनके वंशज गुज्जर कैसे ??
- अवंती के प्रतिहार राजा, वत्सराज के ताम्रपत्रों और शिलालेखों से यह पता चलता है के वत्सराज प्रतिहार ने नंदपुरी की पहली और आखिरी गुज्जर बस्ती को उखाड़ फेंका नेस्तेनाबूत कर दिया और भत्रवर्ध चौहान को जयभट्ट गुज्जर के स्थान पर जागीर दी। इस शिलालेखों से भी प्रतिहार और गुज्जरों के अलग होने के सबूत मिलते हैं तो प्रतिहार और गुज्जर एक कैसे ???
- देवनारायण जी की कथा के अनुसार भी उनके पिता चौहान क्षत्रिय और माता गुजरी थी जिससे गूजरों की बगड़ावत वंश निकला यही उधारण राणा हर राय देव से कलस्यां गोत्र के गुज्जरों को उतपत्ति ( करनाल और मुज़्ज़फरगर ब्रिटिश गजट पढ़ें या सदियों पुराने राजपूतों के भाट रिकॉर्ड पढ़ें।) , ग्वालियर के राजा मान सिंह तंवर की गुजरी रानी मृगनयनी से तोंगर या तंवर गुज्जरों की उत्पत्ति के प्रमाण मिलतें हैं तो प्रीतिहार राजपूत वंश गुज्जरों से कैसे उतपन्न हुआ ? क्षत्रिय से शुद्र तो बना जा सकता है पर शुद्र से क्षत्रिय कैसे बना जा सकता है।
- जहाँ जहाँ प्रतिहार वंश का राज रहा है वहाँ आज भी प्रतिहार राजपूतों की बस्ती है और यह बस्तियाँ हजारों साल पुरानी है पर यहाँ गुज्जर प्रतिहार नहीं पाये जाते।
मंडोर के इलाके में इन्दा, लुलावत,रामावत व देवल प्रतिहार कन्नौज में कलहंस और मूल प्रतिहार , मध्य प्रदेश में प्रतिहारों को नागोद रियासत व गुजरात में प्रतिहार राजपूतों के आज भी 3 रियासत व् 200 से अधिक गाँव। न कन्नौज में गुज्जर है ना नागोद में ना गुजरात में। और सारे रजवाड़े भी क्षत्रिय व राजपूत प्रतिहार माने जाते है जबकि गुज्जरों में तो प्रतिहार गोत्र व खाप ही नहीं है तो प्रतिहार गुज्जर कैसे ??
- मिहिर भोज नागभट्ट हरिश्चंद्र प्रतिहारों के शिलालेखों और ताम्रपत्रों में इन तीनों को सूर्य वंशी रघु वंशी और लक्षमण के वंश में लिखा है ; गुज्जर है तो ये सब खुद को आर्य क्षत्रिय क्यों बता के गए ??!
- राजोरगढ़ के आलावा ग्वालियर कन्नोज मंडोर गल्लका अवंती उज्जैन के शिलालेखों और ताम्रपत्रों में प्रतिहारों के लिये किसी भी पंक्ति व लेख में गुर्जर गू जर गू गुर्जरा या कोई भी मिलता जुलता शब्द या उपाधि नहीं मिलती है साफ है सिर्फ राजोरगढ़ में गुर्जरा देस से आई हुई खाप को गुर्जरा नरेश को उपाधि मिली !! जब बाकि देश के प्रतिहार गुज्जर नहीं तो राजोरगढ़ के प्रतिहार गुज्जर कैसे ??
