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बुधवार, 23 जनवरी 2019

प्रतिहार राजपूतों के सिंबल या लोगो | मंडोर नागौद अलीपुर बेलासर


मित्रों यह उपर के तीन चित्रों में पहला मंडोर के पडिहारों/प्रतिहारो का सिंबल जो आपको मंडौर जोधपुर
बीकानेर,जैसलमेर,नागौर राजस्थान, में ज्यादा संख्या में मिलेंगे। दूसरा अलीपुरा राज्य का सिंबल है यह राज्य आपको मध्य प्रदेश के ग्वालियर में मौजूद है। तीसरा खनेती राज्य जो वर्तमान में हिमाचल प्रदेश में है। बीच में परिहारों/प्रतिहारो का सबसे बड़ा राज्य नागौद रियासत जो मध्य प्रदेश के सतना जिला मे वर्तमान में है।जिसमें बीच में राज्य का सिंबल ओर दोनों साइड रियासत के आखिरी महाराजा महेन्द्र सिंह जू देव जी है। फिर चौथा सिंबल बेलासर के पडिहार/प्रतिहार राजपूतों का है जो उन्हें बीकानेर रियासत द्वारा मिला है। पांचवे में सूर्य का चित्र है क्योंकि हम सूर्यवंशी क्षत्रिय है।छठे मे हमारे वंश के कुल भूषण महान वीर शासक आदिवाराह परमेश्वर सम्राट मिहिर भोज प्रतिहार जी का चित्र है। इन सब की जानकारी आपको इंटरनेट पर भी उपलब्ध मिलेगी। यह अफवाह जो है कि हम अग्निवंशी क्षत्रिय है। यह सरासर कपोकाल्पनिक है। प्रतिहार वंश का निकास श्रीराम जी के अनुज लक्ष्मण जी से है जो वह प्रतिहार(प्रहरी) के रूप मे थे इसलिए आंगे चलकर इसे प्रतिहार वंश के नाम से जाना जाता है जो शिलालेखों ओर इतिहास में पूर्णतः माना गया है प्रतिहार वंश का हद से ज्यादा शोध होने पर ही आज यह दुर्गति है। कहीं अग्निवंशी तो कहीं गुर्जर जाति से जोडा गया है। मित्रों आज मैं आपको बताना चाहता हूं कि प्रतिहार राजपूतों के साथ गुर्जारा शब्द क्यों जुड गया है। प्राचीन गुर्जररात्र के बाहर निवास करने वाली अनेक जातिया गुर्जर नाम से जानी जाती हैँ। इनमे सौराष्ट्र और कच्छ में मिलने वाली गुर्जर ब्राह्मण, गुर्जर मिस्त्री, गुर्जर लोहार, गुर्जर बढ़ई आदि अनेक जाती हैँ जिन्हें सिर्फ प्राचीन गुर्जरात्र से आने की वजह से गुर्जर कहा जाता है। बाकी इनमे कोई racial similarity नही हैँ। इसी तरह उत्तर महाराष्ट्र में एक ही जगह डोरे गुर्जर, लेवा गुर्जर और कडवा गुर्जर नाम की अलग अलग जातिया मिलती हैँ। इनमे से डोरे गुर्जर अपने को राजपूत कहते हैँ और प्राचीन गुर्जरात्र से आया बताते हैँ। इनमे प्राचीन गुजरात में मिलने वाले राजपूत वंश ही मिलते हैँ। हालांकि नॉन राजपूतो में शादी करने से इनका स्टेटस low हो गया है, इसीलिए local राजपूत इनको हेय दृष्टि से देखते हैँ। लेवा गुर्जर अपने को गुजरात से आए लेवा कुनबी बताते हैँ जो अब वहा पाटीदार या पटेल के नाम से भी जाने जाते हैँ। कडवा गुर्जर गुजरात से आए कडवा कुनबी हैँ। इन तीनो जातियो में कोई racial similarity नही हैँ।
इसी तरह नार्थ वेस्ट इंडिया में मिलने वाली एक गुर्जर चरवाहा जाती जो अपने को तथाकथित प्राचीन गुर्जर जाती का वंशज बताती है, वो भी गुजरात से आने के कारण ही गुर्जर कहलाई है। इसके कोई प्रमाण नही है की अगर कोई गुर्जर जाती थी भी तो यह जाती उसकी वंशज है। गौरतलब है की इस जाती में तथाकथित गुर्जर बताए जाने वाले प्रतिहार, सोलंकी आदि वंश बिलकुल नही मिलते। गौरतलब है की जहाँ प्राचीन गुर्जरात्र की सीमाए थी वहॉ कोई गुर्जर नाम की जाती नही मिलती। सभी गुर्जर नाम की जातिया इस क्षेत्र के बाहर ही मिलती हैँ इससे यह साबित होता है कि गुर्जर शब्द एक geographical expression को denote करता है। गुर्जर शब्द भी एक शिलालेख पर अब तक मिला ओर प्रतिहारों के अब तक के किसी भी ताम्रपत्र ओर शिलालेख मे इस शब्द ओर जाति का वर्णन नहीं मिला जिससे यह प्रमाणित है कि प्रतिहार परिहार,पडिहार ओर उनकी अन्य शाखाऐं शुद्ध क्षत्रिय राजपूत वंश है। इतिहास हमारे साथ है यह केवल कुछ नीच जातियाँ खुद को क्षत्रिय साबित होने का पड़यंत्र कर रही है। खासकर जाट ओर गुज्जर इनमें प्रमुख है।ओर आजकल तो दिल्ली के कुछ इलाकों का नामकरण भी इन गुज्जरो ने गुर्जर सम्राट मिहिर भोज जी के नाम से रखा है।ओर तो दिल्ली का ही बहुत ही फेमस मंदिर अक्षरधाम आप सभी ने देखा ओर सुना होगा वहां भी मिहिर भोज परिहार जी की मूर्ति स्थापित कर उस पर गुर्जर सम्राट बताया ओर प्रदर्शित किया जा रहा है। मित्रों आप सभी हमारा साथ दीजिए इस भ्रम को दूर करने में इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर करके।।।

जय माँ भवानी।
जय मिहिरभोज प्रतिहार
प्रतिहार एकता जिंदाबाद
श्री गाजण माता युथ ब्रिगेड राजस्थान

क्या बडगूजर राजपूत प्रतिहार राजपूत वंश की शाखा है? | बडगुजर राजपूत | Bad...








क्या बडगूजर राजपूत प्रतिहार राजपूत वंश की शाखा है??---

--,  (Badgujar rajputs and pratihar rajput
dynasty)

श्रीमाल जी का नाम बडगूजर राजपूतों की वंशावली में आता है  पर इसका अर्थ सांकेतिक है, इसको समझिये।  राजस्थान में जालौर जिले में स्थित भीनमाल प्राचीन गुर्जरदेश (गुर्जरात्रा) की राजधानी थी, जिसका वास्तविक नाम "श्रीमाल" था,जो बाद में भिल्लमाल और फिर भीनमाल हुआ।  गल्लका लेख के अनुसार अवन्ति के राजा नागभट्ट प्रतिहार ने 7 वी सदी में गुर्जरो को मार भगाया और गुर्जरदेश पर कब्जा किया, गुर्जरदेश पर अधिपत्य करने के कारण ही नागभट्ट प्रतिहार गुरजेश्वर कहलाए जैसे रावण लंकेश कहलाता था।  यही से इनकी एक शाखा दौसा,अलवर के पास राजौरगढ़ पहुंची, राजौरगढ़ में स्थित एक शिलालेख में वहां के शासक मथनदेव पुत्र सावट को गुर्जर प्रतिहार लिखा हुआ है जिसका अर्थ है गुर्जरदेश से आए हुए प्रतिहार शासक।।  इन्ही मथंनदेव के वंशज 12 वी सदी से बडगूजर कहलाए जाने लगे क्योंकि राजौरगढ़ क्षेत्र में पशुपालक गुर्जर/गुज्जर समुदाय भी मौजूद था जिससे श्रेष्ठता दिखाने और अंतर स्पष्ट करने को ही गुर्जर प्रतिहार राजपूत बाद में बडगूजर कहलाने लगे।  पशुपालक शूद्र गुर्जर/गुज्जर समुदाय का राजवंशी बडगूजर क्षत्रियो से कोई सम्बन्ध नही था।पशुपालक गुज्जर/गुर्जर दरअसल बडगूजर (गुर्जर प्रतिहार) राजपूतो के राज्य में निवास करते थे।  राजा रघु के वंशज (क्योंकि श्रीराम और लक्ष्मण जी दोनों रघु के वंशज थे) होने के कारण ही इन्होंने राघव/रघुवंशी पदवी धारण की, इनकी वंशावली में एक अन्य शासक रघुदेव के होने के कारण भी इनके द्वारा राघव टाइटल लिखा जाना बताया जाता है।  इस प्रकार बडगूजर राजपूत वंशावली में श्रीमाल (गुर्जरदेश की राजधानी भीनमाल का प्राचीन नाम) का होना तथा राजौरगढ़ शिलालेख में बड़गुजरो के पूर्वज मथनदेव को गुर्जर प्रतिहार सम्बोधित किया जाना आधुनिक बडगूजर राजपूत वंश को प्रतिहार राजपूत वंश की ही शाखा होना सिद्ध करता है।  श्रीमाल (भीनमाल) के निवासी या वहां से अन्य स्थानों पर जाकर बसे ब्राह्मण श्रीमाली ब्राह्मण कहलाए जो गौड़ ब्राह्मण गुर्जरदेश में बसे, वो गुर्जर गौड़ ब्राह्मण कहलाए।।

सोमवार, 21 जनवरी 2019

सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार काल के तांबे के सिक्के


सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार काल के तांबे के सिक्के

सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार के शासनकाल के समय चलाये गये तांबे के सिक्के जो नवमीं शताब्दी में राज्य मुद्रा के रुप मे चलते थे।

प्रतिहार/परिहार/पढ़ियार क्षत्रिय वंश।।
लक्ष्मणवंशी प्रतिहार राजपूत।।
सम्राट मिहिर भोज।।
जय माँ चामुण्डा।।
जय क्षात्र धर्म।।

रविवार, 20 जनवरी 2019

प्रतिहार कालीन पुष्कर तीर्थ का इतिहास | History of Pushkar teerh Rajasthan India

History of Pushkar teerh Rajasthan India




* प्रतिहार कालीन पुष्कर तीर्थ का इतिहास *

मित्रों आज की इस पोस्ट के माध्यम से हम आपको प्रतिहार कालीन राजस्थान के पुष्कर तीर्थ एवं भारत में एक मात्र ब्रम्हा जी के मंदिर के इतिहास की जानकारी देंगे।।

अजोरगढ महेश्वर (नर्मदा तट) मे प्रतिहार राजा अजराणा ने दुर्ग का निर्माण करवाया था। उसके पुत्र को एक बालयोगी अमर करना चाहता था, बालयोगी ने प्रतिहार राजा के पुत्र नाहड़राव को अमरतेल के कडाहे पर कूदने को कहा जिससे राजा यह सुनकर बहुत ही क्रोधित हो गए। पुत्र मोह के कारण राजा ने योगी को कपटी समझा और उसकी हत्या कर दी। जिसके फलस्वरूप उन्हें कुष्ठ रोग हो गया। इस कुष्ठ रोग के दिन प्रतिदिन बढने से राजा बहुत ही दुखित था।

उस कुष्ठ रोग का निवारण करने के लिए एक किवंदती प्रचलित है कि --

एक दिन प्रतिहार राजा शिकार करने के लिए जंगल की ओर गये और काफी देर जंगल में शिकार की तलास में भटकते रहे काफी देर बाद उन्हें एक जंगली सुअर (वाराह) दिखा। उस जंगली सुअर का पीछा करते हुए राजा अपने सैनिकों से पिछड गये और जंगल में भटक गये। 

आंगे चलकर अजमेर नदी के तीन कोस उत्तर में वह जंगली सुअर अचानक से गायब हो गया। राजा काफी देर से पीछा करने से थक चुके थे और उन्हें बहुत प्यास भी लगी थी, थके हारे राजा परेशान हो गये प्यास से व्याकुल राजा नदी की ओर बढ चले कुछ दूरी पर उन्हे एक गड्ढा मिला जिसमे जंगली सुअर के खुर के निशान थे। उस गड्ढे को राजा ने अपनी तलवार से और गहरा किया और प्यास बुझाई। पानी पीते ही राजा वहीं पर बेहोश हो गये।।

अचेतावस्था में पुष्कर तीर्थ ने राजा को दर्शन दिये और बताया कि मैने वाराह के रुप में तुम्हारे प्राणों की रक्षा की, साथ ही तुम्हारे कुष्ठ रोग का निवारण भी किया।।

होश आने पर प्रतिहार राजा ने देखा की वह कुष्ठ रोग से मुक्त हो गया। इससे खुश होकर राजा ने अपने राजधानी आकर " ऐरा " के वन में एक सरोवर का निर्माण एवं धातु की सीढियाँ भी बनवाई जिसे हम आज पुष्कर तीर्थ एवं पुष्कर ताल के नाम से जानते है तथा भारत में एक मात्र चतुर्मुखी ब्रम्हा जी के मंदिर का निर्माण करवाया जो अपने आप में अद्धितीय मंदिर है। राजा ने जंगली सुअर (वाराह)का शिकार करने पर कडा प्रतिबंध लगा दिया तथा उसके मांस भक्षण पर भी रोक लगा दिया।

इसी घटना के बाद से प्रतिहारों ने वाराह का मांस खाना बंद कर दिया और वाराह को पूजने लगे। और वाराह जयंती भी मनाने लगे। इस विशेष दिन का और महत्व प्रतिहारों मे जब बढा जब इस क्षत्रिय प्रतिहार वंश मे वाराह जयंती के ही दिन कुल दीपक सम्राट मिहिर भोज का जन्म हुआ जो बचपन से ही अदम्य साहसी और शस्त्र/शास्त्र में निपुण थे। 

प्रतिहार राजपूत युद्ध के लिए प्रस्थान करने के पहले यहां चतुर्मुखी ब्रम्हा जी के मंदिर में पूजा अर्चना के लिए जरुर आते थे।

इन सब घटनाओं की जानकारी पुष्कर तालाब की सीढियों पर अंकित कुछ प्रतिहार राजाओं के नाम से हुई जिनमे अजराणा प्रतिहार एवं नाहड़राव प्रतिहार मुख्य रुप से है और यहां के कई शिलालेखों एवं ताम्रपत्रों में भी इसका प्रतिहार राजाओं से जिक्र किया गया है ।

कालीदास ने भी कई जगह पुष्कर तीर्थ का वर्णन किया है --

वह लिखते है - " प्रतिहार नाहड़राव मण्डौरगढ़ करवायों पुष्कर बधायो "

सम्राट पृथ्वीराज चौहान एवं नाहड़राव प्रतिहार समकालीन थे। पृथ्वीराज रासौ, नैणसी विख्यात बांकी दास कई ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है।

प्रतिहार राजा अजराणा का पुत्र नाहड़राव बहुत ही वीर था कुछ समय के लिए परमारो ने 11वीं शताब्दी में प्रतिहारों से उनका प्राचीन राज्य मण्डौर छीन लिया था। जिससे नाहड़राव प्रतिहार ने अपनी वीरता एवं योग्यता से परमारो पर हमला कर पुनः छीन लिया था।

Pratihara / Pratihar / Parihar Rulers of india

Refrence : -
(1) विंध्य क्षेत्र के प्रतिहार वंश का ऐतिहासिक अनुशीलन - लेखक डाॅ अनुपम सिंह
( 2) प्रतिहारों का मूल इतिहास लेखक - देवी सिंह मंडावा
(3) भारत के प्रहरी - प्रतिहार लेखक - डॉ विंध्यराज सिंह चौहान
(4) पृथ्वीराज रासौ ग्रन्थ
(5)कालीदास - रघुवंश 151-154
(6) राजपूतो का इतिहास - लेखक गौरीशंकर हरिचंद्र ओझा
(7) परिहार वंश का प्रकाश लेखक - मुंशी प्रेमचंद देवी
(8) वीरभानुदय काव्य - राजकवि
(9) प्राचीन भारत का इतिहास लेखक - बी.एल. शर्मा
(10) राजशेखर - काव्यभीमांस और मजूमदार एनसीयंट इंडिया पेज 225/ क्षत्रिय वंश वैभव

जय माँ चामुण्डा।।
जय क्षात्र धर्म।।
नागौद रियासत।।
श्री गाजण माता युथ ब्रिगेड राजस्थान

शुक्रवार, 11 जनवरी 2019


हिन्दू राजपूत शौर्य और बहादुरी से जुड़े “क्षत्रिय सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार” के रोचक पहलू जो उन्हे महान बनाते है।             




                                                                   



























== काव्यों एवं इतिहास मे इन विशेषणो से वर्णित किया====
क्षत्रिय सम्राट,भोजदेव, भोजराज, वाराहवतार, परम भट्टारक, महाराजाधिराज, परमेश्वर , प्रभास, महानतम भोज, मिहिर महान।
==== शासनकाल ====
सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार ने 18 अक्टूबर 836 ईस्वीं से 885 ईस्वीं तक 50 साल तक राज किया। मिहिर भोज के साम्राज्य का विस्तार आज के मुलतान से पश्चिम बंगाल तक और कश्मीर से कर्नाटक तक था।
==== प्रतिहार साम्राज्य ====
प्रतिहार साम्राज्य ने अपने शुरूआती शासनकाल मे ही पूरी दूनिया को अपनी ताकत से हिला दिया था। इनके साम्राज्य का क्षेत्रफल लगभग 20 लाख किलोमीटर स्क्वायर माइल्स था। इनका शासनकाल 6ठी शताब्दी से 10वी शताब्दी तक रहा। प्रतिहारों ने अरबों से 300 वर्ष तक लगभग 200 से ज्यादा युद्ध किये जिसका परिणाम है कि हम आज यहां सुरक्षित है। प्रतिहारों ने अपने वीरता, शौर्य , कला का प्रदर्शन कर सभी को आश्चर्यचकित किया है। भारत देश हमेशा ही प्रतिहारो का रिणी रहेगा उनके अदभुत शौर्य और पराक्रम का जो उनहोंने अपनी मातृभूमि के लिए न्यौछावर किया है। जिसे सभी विद्वानों ने भी माना है। प्रतिहार साम्राज्य ने दस्युओं, डकैतों, अरबों, हूणों, कुषाणों, खजरों, इराकी,मंगोलो,तुर्कों, से देश को बचाए रखा और देश की स्वतंत्रता पर आँच नहीं आई।
इनका राजशाही निशान वराह है। ठीक उसी समय मुश्लिम धर्म का जन्म हुआ और इनके प्रतिरोध के कारण ही उन्हे हिंदुश्तान मे अपना राज कायम करने मे 300 साल लग गए। प्रतिहार राजपूत ही भारतीय संस्कृति के रक्षक बने। और इनके राजशाही निशान ” वराह ” विष्णु का अवतार माना है प्रतिहार मुश्लमानो के कट्टर शत्रु थे । इसलिए वो इनके राजशाही निशान ‘वराह’ से आजतक नफरत करते है।
==== शासन व्यवस्था ====
सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार वीरता, शौर्य और पराक्रम के प्रतीक हैं। उन्होंने विदेशी साम्राज्यो के खिलाफ लड़ाई लड़ी और अपनी पूरी जिन्दगी अपनी मलेच्छो से पृथ्वी की रक्षा करने मे बिता दी। सम्राट मिहिरभोज बलवान, न्यायप्रिय और धर्म रक्षक सम्राट थे। सिंहासन पर बैठते ही मिहिरभोज ने सर्वप्रथम कन्नौज राज्य की व्यवस्था को चुस्त-दुरूस्त किया, प्रजा पर अत्याचार करने वाले सामंतों और रिश्वत खाने वाले कामचोर कर्मचारियों को कठोर रूप से दण्डित किया। व्यापार और कृषि कार्य को इतनी सुविधाएं प्रदान की गई कि सारा साम्राज्य धनधान्य से लहलहा उठा। मिहिरभोज ने प्रतिहार राजपूत साम्राज्य को धन, वैभव से चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया। अपने उत्कर्ष काल में उसे ‘सम्राट’ मिहिरभोज प्रतिहार की उपाधि मिली थी। अनेक काव्यों एवं इतिहास में उसे कई महान विशेषणों से वर्णित किया गया है।
==== वराह उपाधी ====
सम्राट मिहिर भोज के महान के सिक्के पर वाराह भगवान जिन्हें कि भगवान विष्णु के अवतार के तौर पर जाना जाता है। वाराह भगवान ने हिरण्याक्ष राक्षस को मारकर पृथ्वी को पाताल से निकालकर उसकी रक्षा की थी। सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार का नाम आदिवाराह भी है। ऐसा होने के पीछे यह मुख्य कारण हैं
=)) जिस प्रकार वाराह (विष्णु जी) भगवान ने पृथ्वी की रक्षा की थी और हिरण्याक्ष का वध किया था ठीक उसी प्रकार मिहिरभोज ने मलेच्छों को मारकर अपनी मातृभूमि की रक्षा की। इसीलिए इनहे आदिवाराह की उपाधि दी गई है।
==== उपासक ====
सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार शिव शक्ति के उपासक थे। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में भगवान शिव के प्रभास क्षेत्र में स्थित शिवालयों व पीठों का उल्लेख है। प्रतिहार साम्राज्य के काल में सोमनाथ को भारतवर्ष के प्रमुख तीर्थ स्थानों में माना जाता था। प्रभास क्षेत्र की प्रतिष्ठा काशी विश्वनाथ के समान थी। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार के जीवन के बारे में विवरण मिलता है। मिहिरभोज के संबंध में कहा जाता है कि वे सोमनाथ के परम भक्त थे उनका विवाह भी सौराष्ट्र में ही हुआ था। उन्होंने मलेच्छों से पृथ्वी की रक्षा की। 50 वर्ष तक राज करने के पश्चात वे अपने बेटे महेंद्रपाल प्रतिहार को राज सिंहासन सौंपकर सन्यासवृति के लिए वन में चले गए थे। सम्राट मिहिरभोज का सिक्का जो कन्नौज की मुद्रा था उसको सम्राट मिहिरभोज ने 836 ईस्वीं में कन्नौज को देश की राजधानी बनाने पर चलाया था।
==== धन व्यवस्था ====
सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार महान के सिक्के पर वाराह भगवान जिन्हें कि भगवान विष्णु के अवतार के तौर पर जाना जाता है। इनके पूर्वज सम्राट नागभट्ट प्रथम ने स्थाई सेना संगठित कर उसको नगद वेतन देने की जो प्रथा चलाई वह इस समय में और भी पक्की हो गई और प्रतिहार साम्राज्य की महान सेना खड़ी हो गई। यह भारतीय इतिहास का पहला उदाहरण है, जब किसी सेना को नगद वेतन दिया जाता हो।
मिहिर भोज के पास ऊंटों, हाथियों और घुडसवारों की दूनिया कि सर्वश्रेष्ठ सेना थी । इनके राज्य में व्यापार,सोना चांदी के सिक्कों से होता है। यइनके राज्य में सोने और चांदी की खाने भी थी। भोज ने सर्वप्रथम कन्नौज राज्य की व्यवस्था को चुस्त-दुरूस्त किया, प्रजा पर अत्याचार करने वाले सामंतों और रिश्वत खाने वाले कामचोर कर्मचारियों को कठोर रूप से दण्डित किया। व्यापार और कृषि कार्य को इतनी सुविधाएं प्रदान की गई कि सारा साम्राज्य धनधान्य से लहलहा उठा। मिहिरभोज ने प्रतिहार साम्राज्य को धन, वैभव से चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया।
==== विश्व की सुगठित और विशालतम सेना ====
मिहिरभोज प्रतिहार की सैना में 4,00,000 से ज्यादा पैदल करीब 30,000 घुडसवार,, हजारों हाथी और हजारों रथ थे। मिहिरभोज के राज्य में सोना और चांदी सड़कों पर विखरा था-किन्तु चोरी-डकैती का भय किसी को नहीं था। जरा हर्षवर्धन बैस के राज्यकाल से तुलना करिए। हर्षवर्धन के राज्य में लोग घरों में ताले नहीं लगाते थे,पर मिहिरभोज के राज्य में खुली जगहों में भी चोरी की आशंका नहीं रहती थी।
==== बचपन से ही बहादुर और निडरता ====
मिहिरभोज प्रतिहार बचपन से ही वीर बहादुर माने जाते थे।एक बालक होने के बावजूद, देश के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को महसूस करते हुए उन्होंने युद्धकला और शस्त्रविधा में कठिन प्रशिक्षण लिया। राजकुमारों में सबसे प्रतापी प्रतिभाशाली और मजबूत होने के कारण, पूरा राजवंश और विदेशी आक्रमणो के समय देश के अन्य राजवंश भी उनसे बहुत उम्मीद रखते थे और देश के बाकी वंशवह उस भरोसे पर खरे उतरने वाले थे।
==== वह वैध उत्तराधिकारी साबित हुए ====
मिहिरभोज प्रतिहार राजपूत साम्राज्य के सबसे प्रतापी सम्राट हुए उनके राजगद्दी पर बैठते ही जैसे देश की हवा ही बदल गई । मिहिरभोज की वीरता के किस्से पूरी दूनीया मे मशूहर हुए।विदेशी आक्रमणो के समय भी लोग अपने काम मे निडर लगे रहते है। गद्दी पर बैठते ही उन्होने देश के लुटेरे,शोषण करने वाले, गरीबो को सताने वालो का चुन चुनकर सफाया कर दिया। उनके समय मे खुले घरो मे भी चोरी नही होती थी।
==== अरबी लेखो मे मिहिरभोज का है यशोगान====
अरब यात्री सुलेमान – पुस्तक सिलसिलीउत तुआरीख 851 ईस्वीं :
जब वह भारत भ्रमण पर आया था। सुलेमान सम्राट मिहिरभोज के बारे में लिखता है कि इस सम्राट की बड़ी भारी सेना है। उसके समान किसी राजा के पास उतनी बड़ी सेना नहीं है। सुलेमान ने यह भी लिखा है कि भारत में सम्राट मिहिरभोज से बड़ा इस्लाम का कोई शत्रु नहीं था । मिहिरभोज के पास ऊंटों, हाथियों और घुडसवारों की सर्वश्रेष्ठ सेना है। इसके राज्य में व्यापार,सोना चांदी के सिक्कों से होता है। ये भी कहा जाता है।कि उसके राज्य में सोने और चांदी की खाने भी थी।
बगदाद का निवासी अल मसूदी 915ई.-916ई 
वह कहता है कि (जुज्र) प्रतिहार साम्राज्य में 90,000 गांव, नगर तथा ग्रामीण क्षेत्र थे तथा यह दो हजार किलोमीटर लंबा और दो हजार किलोमीटर चौड़ा था। राजा की सेना के चार अंग थे और प्रत्येक में सात लाख से नौ लाख सैनिक थे। उत्तर की सेना लेकर वह मुलतान के बादशाह और दूसरे मुसलमानों के विरूद्घ युद्घ लड़ता है। उसकी घुड़सवार सेना देश भर में प्रसिद्घ थी।जिस समय अल मसूदी भारत आया था उस समय मिहिरभोज तो स्वर्ग सिधार चुके थे परंतु प्रतिहार शक्ति के विषय में अल मसूदी का उपरोक्त विवरण मिहिरभोज के प्रताप से खड़े साम्राज्य की ओर संकेत करते हुए अंतत: स्वतंत्रता संघर्ष के इसी स्मारक पर फूल चढ़ाता सा प्रतीत होता है। समकालीन अरब यात्री सुलेमान ने सम्राट मिहिरभोज को भारत में इस्लाम का सबसे बड़ा दुश्मन करार दिया था,क्योंकि प्रतिहार राजपूत राजाओं ने 11 वीं सदी तक इस्लाम को भारत में घुसने नहीं दिया था। मिहिरभोज के पौत्र महिपाल को आर्यवर्त का महान सम्राट कहा जाता था।
==== प्रतिहार शैली कला ====
भारत मे कोई ऐसा स्थान नही बचा जहां प्रतिहारो ने अपनी तलवार और निर्माण कला का जौहर ना दिखाया हो। प्रतिहारो ने सैकडो मंदिर व किले के निर्माण किए थे जिसमे शास्त्रबहु मंदिर, बटेश्वर मंदिर, मण्डौर किला, जालौर किला, ग्वालियर किला, कुचामल किला, पडावली मंदिर, मिहिर बावडी, चौसठ योगिनी मंदिर आदि इनके अलावा सैकडो इलाके व ठिकाने है जहाँ प्रतिहारो ने अपनी कला का प्रदर्शन किया

सम्राट_नागभट्ट_प्रतिहार का इतिहास



 सम्राट_नागभट्ट_प्रतिहार

लक्ष्मणवंशी प्रतिहार क्षत्रिय वंश का वस्तुतः राजनैतिक इतिहास प्रमुख रुप से इसके संस्थापक नागभट्ट प्रथम से प्रारम्भ होता है। नागभट्ट प्रथम के परदादा महाराज हरिश्चन्द्र प्रतिहार का समय डॉ बैजनाथ के अनुसार छठी शताब्दी के आसपास था। डॉ के सी श्रीवास्तव के अनुसार इस वंश की प्राचीनता पांचवीं सदी तक जाती है। पुलिकेशिन द्वितीय के ऐहोल अभिलेख के 22 वें श्लोक में गुर्जरात्रा प्रदेष (वर्तमान का गुजरात) भड़ौच का उल्लेख सर्वप्रथम हुआ।

महाराज हरिश्चन्द्र प्रतिहार का पुत्र रज्जिल, रज्जिल का पुत्र नरभट एवं नरभट का पुत्र नागभट्ट था। इस आधार पर इतिहासकार नागभट्ट का काल 730 ई. से प्रारम्भ मानते है। 730 ई.  वह कालखण्ड था। जब नागभट्ट प्रथम ने भीनमाल पर अधिकार कर वास्तविक रुप से प्रतिहार साम्राज्य का श्री गणेश किया था। उस समय नागभट्ट पूर्णयुवावस्था में था।

नागभट्ट के पिता नरभट मण्डौर के शासक थे। लगभग 725 ईस्वीं के आसपास अरब के मुस्लिमों ने सिंध व मुल्तान पर अधिकार करने के पश्चात मण्डौर राज्य पर आक्रमण किया था। परंतु राजकुमार नागभट्ट ने आंगे बढकर अरबों प्रत्याक्रमण कर उन्हें बुरी तरह पराजित किया तथा पलायन करने पर बाध्य किया। अरब सेनाएँ मण्डौर को छोडकर भीनमाल की ओर बढ गई। उस समय उनका अरब सेनापति जुनैद था।

अरब सेनापति जुनैद मण्डौर के प्रतिहार क्षत्रियों से हार पिटकर पराजित होने के बाद भीनमाल की ओर बढा। उस समय भीनमाल मे चावड़ा क्षत्रियों का शासन था। यहां का शासक कमजोर था। अतः अरबो ने इसे जीत लिया तथा वे उज्जैन की ओर आंगे बढे। बिलादुरी ने अपने ग्रन्थ में लिखा है--- अरब सेनापति जुनैद खां ने उज्जैन, बहरीमद, अलमालिवह (मालवा), मारवाड़, वलमण्डल, दहनाज और बरवास (भड़ौच) पर आक्रमण किये। उसने भीनमाल पर पर अधिकार किया।

इससे सपष्ट है कि इन आक्रमणों में उसे केवल भीनमाल पर ही सफलता मिली। उज्जैन उस समय कन्नौज सम्राट यशोवर्मन के शासनाअंतर्गत था। गौडवहों के अनुसार अरबों के आक्रमण की जानकारी मिलते ही यशोवर्मन महेन्द्र पर्वतीय राजाओं की विजय यात्रा को बीच में छोडकर सीघा मध्य देश को पार करते हुए उज्जैन आकर अरबी सेनाओं पर प्रत्याक्रमण किया।

आक्रमण इतना जबरदस्त था कि अरबों के पांव उखड गये। उसने उनका पीछा करते हुए अनेक युद्धों में पराजित करते हुए  सिंध के पार खदेड़ दिया। अब केवल मकरान ही अरबों के पास रह गया। वहाँ से यशोवर्मन मण्डौर गया। वहां उसका स्वागत हुआ। ऐसा लगता है कि नागभट्ट प्रथम को उसने भीनमाल मजबूत करने के लिए कहा।

उस काल में भीनमाल का बहुत ही महत्व था क्योंकि सिंध में भीनमाल होकर ही मालवा व कन्नौज मध्यदेश में जाया जा सकता था। चीनी यात्री हुऐनसांग 641 ईस्वीं में भीनमाल गया था। उस समय वहाँ चावड़ा क्षत्रियों का शासन था। शिशुपाल वध के लेखक महाकवि माघ एवं 'ब्रहस्फुट' सिद्धान्त के प्रतिपादक श्री ब्रम्हभट्ट भी 628 ईस्वीं में चावडा क्षत्रिय शासकों के काल में भीनमाल में रहते थे।

यशोवर्मन्न मण्डौर से कुरुक्षेत्र चला गया। राष्ट्रीय संकट को देखते हुए भीनमाल की कमजोर स्थिति को ध्यान में रखकर नागभट्ट प्रथम ने आक्रमण कर वहां से चावड़ा क्षत्रियों के शासन को समाप्त कर भीनमाल पर अधिकार कर लिया तथा अपनी राजधानी मेड़ता के स्थान पर भीनमाल स्थानान्तरित कर ली। अब उसने विशाल शक्ति का संगठन कर प्रतिहार साम्राज्य की स्थापना की।

नागभट्ट प्रथम प्रतिहार क्षत्रिय वंश के सर्वश्रेष्ठ योद्धा थे। नागभट्ट को प्रतिहार साम्राज्य का संस्थापक भी माना जाता है। मण्डौर व मेड़ता तक केवल प्रतिहार ही थे। अब चूँकि गुर्जरात्रा प्रदेष का शासक हो गया, अतः यही से यह वंश गुर्जर - प्रतिहार कहलाने लगा। मण्डौर के शासक प्रतिहार ही कहलाते थे।

गुर्जरत्रा : , आनर्त, स्वर्भ, माहीघाटी, अनूप, वलभी, सौराष्ट्र, काठियावाड़, कच्छभुज, मण्डौर, जाँगल कूप दुर्ग आदि स्थानों से खदेड़ने का कार्य नागभट्ट प्रथम ने किया। लाट , थाना क्षेत्र से खदेड़ने का कार्य अवनिजनाश्रय पुलिकेशिन चालुक्य ने एवं मालवा, उज्जैन एवं सिंध से बाहर निकालने का कार्य सम्राट यशोवर्मन ने किया था।

भीनमाल को राजधानी बनाने के पश्चात नागभट्ट प्रथम ने पडोस में लगे राज्य जालौर पर अधिकार किया एवं वहां के सवर्णगिरी पर्वत पर एक शत्रुओं को आतंकित करने वाला दुर्ग का निर्माण भी करवाया। उस समय जालौर में कौन शासन कर रहा था, इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं है। "कुवलयमाला" ग्रन्थ से भी जालौर पर नागभट्ट प्रथम के अधिकार की पुष्टि उपलब्ध होती है।

उस समय प्रतिहार क्षत्रिय वंश का राज्य विस्तार बडे राज्यों तक फैल चुका था। उस समय के चारणो भाटों के अनुसार नागभट्ट प्रथम प्रतिहार वंश में जो तीनो तीनों लोको का रक्षक था नागभट्ट प्रथम नारायण की प्रतिकृति के रुप में उत्पन्न हुआ जिसने सुकृतियों का नाश करने वाले मलेच्छ नरेशों की अक्षौहिणी सेना का विनाश कर दिया। भयंकर अस्त्र शस्त्रों से वह चार भुजाओं से शोभित प्रतीत होता था। साक्षात नारायण (विष्णु) लगता था।"

प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ वी के पांडे ने लिखा है -- अरबो के युद्ध का वर्णन हमे अरब लेखक बिलादुरी से भी प्राप्त होता है। उनका कथन है कि सिंध के गवर्नर जुनैद ने अनेक स्थानों पर विजय प्राप्त की जिसके पास दस लाख सैनिक रहे हो। उसने उज्जैन पर भी आक्रमण किया परंतु जुनैद के उत्तराधिकारी वहां हार गये।

जिससे भारत के अनेक भू भाग उसके हाथों से निकल गये। वह आंगे लिखता है। अरब लेखक बिलादुरी के इस कथन से विदित होता है। इतनी बडी विशाल सेना के वाबजूद जुनैद उज्जैन पर विजय प्राप्त नही कर सका। इसका प्रमुख कारण था कि इस समय उज्जैन का प्रमुख शक्तिशाली प्रतिहार क्षत्रिय शासक सम्राट नागभट्ट प्रथम था।

नागभट्ट प्रथम से अरबों का मुकाबला प्रमुख रुप से दो बार हुआ। एक मण्डौर में रहते हुए तथा दूसरा भड़ौच अथवा कच्छ भुज मे और दोनो ही बार जुनैद को बुरी तरह पराजित होना पडा था। अतः नागभट्ट का ऐसा कोप अरबों के मन में छा गया था कि वे उसका मुकाबला करने की सोच भी नही सकते थे। इसीलिए ग्वालियर प्रशस्ति में कहा गया है कि " मलेच्छा राजा की विशाल सेनाओं  को चूर करने वाला मानो नारायण (विष्णु)  रुप में वह लोगों की रक्षा के लिए उपस्थित हुआ था।"

प्रतिहार राजवंश के संस्थापक नागभट्ट प्रथम के साम्राज्य में संपूर्ण मारवाड जिसमें डीडवाना तक प्रदेश यानि वर्तमान नागौर जिले, गोंडवाना जिसमे जालौर एवं आबू आते थे। तथा उत्तरी गुजरात से लेकर भड़ौच तक का भू भाग आते थे। दक्षिणी राजस्थान का चित्तौड़ राज्य का शासक गोहिल क्षत्रिय राजपूत बप्पा रावल एवं सिंध का जय सिंह मित्र थे। उस समय कन्नौज सम्राट यशोवर्मन भी मित्र थे। इस प्रकार नागभट्ट प्रथम ने भीनमाल के अंतर्गत अपने साम्राज्य को पर्याप्त शक्तिशाली बना लिया था। यह भारतीर पश्चिमी सीमा का वास्तविक प्रतिहार अर्थात रक्षक था।
जय माँ चामुण्डा देवी।।
लक्ष्मणवंशी प्रतिहार।।
सूर्यवंशी क्षत्रिय।।
जय क्षात्र धर्म

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भारतवर्ष में प्रतिहार राजपूतों के ठिकाने। पडिहार परिहार पढ़ियार

भारतवर्ष में प्रतिहारो ( परिहारों) के ठिकाने

ग्वालियर का प्रतिहार वंश
ई. स 1129 के बाद ग्वालियर पर प्रतिहारो का अधिकार तथा पहला प्रतिहार शासक परमलदेव था ग्वालियर पर प्रतिहारो का लगभग सौ वर्षों तक अधिकार रहा तथा वर्तमान में भी ग्वालियर के आसपास कई गांवो में प्रतिहारो का निवास है।
सन 1258 ई. मे बलबन बहुत शक्तिशाली हो गयाथा उसने बडी सेना लेकर ग्वालियर पर आक्रमण कर दिया उस समयतक चाहडदेव स्वर्गवासी हो चुका था। उसका नाती " गणपति याजपल्ल " दुर्ग का अधिपति था।इसमें इतनी क्षमता नही थी की कुछ हजार सैनिकों के बल पर वह दिल्ली की सेना का सामना कर सके। अस्तु वह रात में ही परिवार सहित बिहार चला गया। जहां इनके वंशजो ने परिहारपुर ग्राम बसाया और आज भी हजारो की संख्या में आबाद है। और बाकी कुछ प्रतिहार दल झगरपुर , वीसडीह , मैनीयर उत्तर सुरिजपुर , सुखपुरा, हरपुरा आदि ग्रामों मे आबाद है। चाहडदेव ने अपने राज्य का विस्तार चंदेरी तक कर लिया था। इस तरह कभी सत्ता मे तो कभी सत्ताहीन होकर ग्वालियर मे परिहारो का आवास रहा है और लगभग 150 वर्षो तक संघर्षरत शासन किया। और आज भी ग्वालियर अंचल मे लगभग 25 से उपर गांव है प्रतिहारो के जो आवासित है।सारंगदेव प्रतिहार13 वीं शताब्दी तक ग्वालियर से परिहार वंश का पतन हो गया और बचे कुचे परिहार अलग अलग जगह बस गये। जिसमे सारंगदेव ग्वालियर को छोडकर मऊसहानियां आ गये। एवं इनके अन्य भाई राघवदेव परिहार रामगढ जिगनी चले गये, रामदेव परिहार औरैया गये एवं छोटे भाई गंगरदेव परिहार डुमराई में जा बसे जहां आज भी इनके वंशज लगभग 30 गांवो से उपर आबाद है।

(2) अलीपूरा के प्रतिहार
अलीपुरा , पन्ना, बुंदेलखंड, जुझौति प्रदेश, बड़ा गांव आदि के आस पास का अंचल।

(3) मलहाजनी के प्रतिहार
वर्तमान में इनके वंशजो के आठ गांव जिला इटावा और तीन गांव जिला रायबरेली में है। वर्तमान में मलहाजनी के वर्तमान ठाकुर कार्तिकेय प्रताप सिंह है।।

(4) पंजाब और हिमाचल के प्रतिहार
पंजाब में प्रतिहार (परिहार) क्षत्रिय जिला अमृतसर, होशियार पुर, तथा सियालकोट आदि स्थानों में हैं। इसी प्रकार रियासत जम्मू में तथा हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा, ऊना जिला में तथा बिलासपुर आदि स्थानों में काफी संख्या में हैं। ये स्वयं को तखी प्रतिहार मानते हैं।
राजस्थान के किसी स्थान से हरिहरदेव नामक प्रतिहार अपने भाई को राज्य देकर ज्वालामुखी की तीर्थ यात्रा पर गया था । वह वापस लौटकर नहीं आया और उसने वहीं पर कांगड़ा के कटोच वंशी शासक त्रिलोकचंद की पुत्री से विवाह कर लिया और दहेज में मिले राज्य का शासक हुआ । वर्तमान में पंजाब एवं अन्य समीप के प्रान्तों में जो प्रतिहार हैं वे इसी राजा हरिहरदेव के वंशज हैं । और ये भी हो सकता है यह कन्नौज के प्रतिहार सम्राट भोजदेव प्रथम के समय में पंजाब में जाने चाहिए क्यूकी उसने पंजाब का सूबेदार अलखान प्रतिहार को नियुक्त किया था ।
इसी प्रकार दोआब और जालंधर में भी तखी प्रतिहार हैं वे भड़ाना गाँव के नाम से भद कहलाते । उनकी पदवी महता है और इन तखी प्रतिहारों का गांव कुशल है

(5) बुंदेलखंड ओर जुझौति के प्रतिहार
उसर पुनीत, दर्षाण, जेजाकभुक्ती, तथा बुंदेलखंड आदि में आबाद तथा उत्तरप्रदेश की हंडिया तहसील के फूलपुर,बीबीपुर, कुमौना,नसरतपुर, तथा हरिश्चंद्रपुर(इटावा) के आठ गांवो में एवम् मौदहा तथा पाटनपुर गांवो में आबाद है।

(6) चौबीसी के प्रतिहार
बुंदेलखंड अंचल के रामगढ़ जिगनी आदि बारह गांवो में आबाद तथा इसी अंचल के मंगरोठ, मझगवां, लिधोरा, घगवा,अटोलया, गुढ़ा चिकासी आदि में तथा प्रतिहारों के प्रसिद्ध दुर्ग रामगढ़ पर बुंदेलों के अधिकार हो जाने से तथा वहाँ के शासक महासिंह के युद्ध मे मारे जाने पर इस क्षेत्र के प्रतिहारों की शक्ति क्षीण हो गई। महासिंह के बडे पुत्र तो ग्वालियर की गद्दी पर थे तथा छोटे दो पुत्र वापस रामगढ आ गये। जहां बुंदेला शासक ने बडे भाई मदनदेव प्रतिहार को राव की उपाधि दी तथा जिगनी जागीर मे दी। इसके वंशधर बारह गांवो मे है। राव मदनदेव के सात पुत्र थे, राव जैतसिंह जिगनी, पहाडसिंह मंगरोठ, बानसिंह मझगवां, रणसिंह लिधौरा, बलसिंह गधवा, सिहणदेव अटैलिया, औधणसिंह गुढा चिकासी आदि मे इनके वंशज है। राव जैतसिंह के दस पुत्र थे, राव जसकरण सिंह जिगनी तथा शत्रुजीत, प्रतापसिंह और हाथीराज सिंह भी जिगनी मे ही रहे। सबदल सिंह को कटरा मानपुर (इलाहाबाद) मे जागीर मिली, चितर सिंह को बिल्टी कानपुर में, रामसिंह को मलहेटा की तथा मुकुट सिंह को झगडपुर जिला उन्नाव की जागीर मिली और भूपतसिंह एवं रतन सिंह मलहेटा जिला हमीरपुर मे रहे उक्त स्थानों पर आज भी इनके वंशज अच्छी संख्या में आबाद है।

(7)  > उरई और उन्नाव के प्रतिहार < -----
ग्वालियर के प्रतिहार क्षत्रिय शासक विजयपालदेव के तृतीय पुत्र शिविरशाह ने वि.सं. 1123 में खंगारो से कालपी, महोवा आदि विजय किया तथा कुर्मियों से कोंच ले लिया और उरई को अपनी राजधानी बनाई। इनके दो पुत्र थे छत्रपालदेव और ब्रजदेव। ब्रजदेव परिहार गंगा स्नान करने गये थे, उनका उन्नाव में झगडा हो गया , इन्होने उन्नाव को विजय किया। इनके वंशज उन्नाव ,रायबरेली, जालौन तथा कानपुर आदि स्थानो मे है।

(8) कलहंस प्रतिहार वंश
वर्तमान में इस वंश के छह द्वारे प्रसिद्ध है। इस क्षेत्र में इनकी छह रियासते थी। वर्तमान समय मे इस शाखा के क्षत्रिय उत्तर प्रदेश के गोंडा, बस्ती, जिले मे शोहरतगढ जो राज्य था, तुलसीपुर, प्रतापगढ तथा बिहार के आरा , छपरा ,भागलपुर, शाहाबाद जिलो मे आवसित है।

(9) दगरावरसेला (चम्बलतट) के प्रतिहार
मदनपुर, उटशाना, बड़ोस, उमरैण,राजौरा। व रायपुर में थोड़े बहुत आबाद है। उत्तरप्रदेश के आगरा जिले में फरहौला, गुर्जा,कमले,मढिवायदपुर   काकर खेड़ा, पिडोरा, अर्नोट, आदि गांवों व इनके आस पास काफी संख्या में आबाद है। इनके अलावा आगरा जिले के फतेहाबाद में ई.स 1688 में औरंगजेब ने प्रतिहारो मुसलमान बना दिया था जो की मिलकेजादे पड़िहार कहलाते है

(10) ------- > सिंध के प्रतिहार < ---------
सिंध मे बसने के कारण ही ये सिंध परिहार कहलाते है। जैसलमेर के यदुवंशी भाटी क्षत्रियों ने इन्हे जाम की पदवी से विभूषित किया था। वर्तमान में ये राजस्थान मे कहीं - कहीं तथा सिंध (पाकिस्तान) और जूनागढ (गुजरात) आदि स्थानों पर निवास करते है एवं ये लगभग दो हजार की संख्या मे आबाद है।

(11) सोंधिया प्रतिहार
प्रतिहार शासक लुल्लर के सातवे वंशज दीपसिंह ने सिंध नदी के तट पर शत्रु को परास्त  करके विजय हासिल की थी अत: इनके वंशज  सोंधिया प्रतिहार कहलाए। वर्तमान में इनके वंशज मध्यप्रदेश के ग्वालियर क्षेत्र  तथा झालावाड़ के क्षेत्र में आबाद है।

(12) देवल प्रतिहार
यह वंश राजस्थान के जालौर जिले में आबाद है।
इस शाखा में अनेक सूरमा हुवे जिनमें कुंवर नरपाललदेव देवल का नाम विशेष उल्लेखनीय है
जिसका वीरतापूर्वक युद्ध करते हुवे सिर कट गया था।  सिर कटने के बाद  भी वह युद्धरत रहा तथा शत्रु  सेना का भारी विनाश करके हाहाकार मचा दिया। इसी शाखा के ठाकुर रायधवल ने अपनी पुत्री का विवाह मेवाड़ के  राणा प्रताप सिंह के साथ किया था ।
जालौर क्षेत्र के जसवंतपुरा, रानीवाडा पहाडपुरा मुख्य ठिकाने है इन क्षेत्रों में काफी अच्छी संख्या में देवल प्रतिहार है एवं रानीवाडा विधानसभा से वर्तमान विधायक नारायणसिंह देवल है।

(13) जेठावा प्रतिहार
यह वंश मूल रूप से कश्मीर का है। तथा वहा से सिंध होते हुए काठियावाड़ (सौराष्ट्र) पहुंचकर अपना राज्य स्थापित किया। यह क्षेत्र जेठवाड़ भी कहलाता है। इसकी राजधानी धुमली थी जिसका दूसरा नाम भूतांबिका था। इसलिए यहां के निवासी भुतहा प्रतिहार भी कहलाते है।जेठवा शासकों ने सौराष्ट्र में श्रीनगर ग्राम बसाया। तथा सूर्य का मंदिर बनवाया। जेठवा शासक  राणा सुल्तान जी  ने ई. स सन 1671 से 1699 में पोरबंदर में किले का निर्माण करवाया। भारत के स्वतंत्र होकर देशी राज्यो के विलनिकरण तक पोरबंदर पर जेठवा प्रतिहारो का शासन रहा। आज भी इस क्षेत्र मे पांच हजार से उपर जेठवा परिहार राजपूत निवास कर रहे है।

(14) इंदा प्रतिहार
सूर् पड़िहार के पुत्र इंद्र ने अपने नाम से एक अलग  शाखा चलाई जो कि इंदा पड़िहार कहलाये | वर्तमान में मारवाड़ की शेरगढ़ तहसील में इंदा पड़िहारो के कुल 27 गांव हैं जो कि इंदावटी के नाम से जानी जाती है यह पूरे गांव एक दूसरे से सटे हुए हैं जिससे इनका क्षेत्रफल उतना नहीं है जितना 27 गांवों का होना चाहिए इंदावटी के अलावा भी इनके छिटपुट तौर पर बीकानेर जिले में भी घर आबाद है कोलायत तहसील में एक इंदो का गांव है जिसको इंदो का बाला कहते हैं

(15) लुलावत पड़िहार (प्रतिहार)
राजस्थान में पड़िहारो के काफी संख्या में गांव है जो कि मूल रूप से लुलावत ही है परंतु समय के साथ-साथ अपने पूर्वजों के नाम से उप शाखाओं में में विभक्त होते गए संघन घनत्व की दृष्टि से अवलोकन किया जाए तो रतनसिंघोत लुलावतो की तादाद सबसे ज्यादा हैं बीकानेर तहसील का बेलासर गांव पूरे राजस्थान में इनका सबसे बड़ा गांव है तथा द्वितीय श्रेणी पर पोकरण तहसील का गांव छायण आता है इन दो गांवों के अतिरिक्त इस गोत्र के पड़िहार बीकानेर, रतनगढ़, हुडेरा, सूरतगढ़, नोहर, दून्कर, गोपालसर, धीऀगधाणिया, जाजीवाल, बावरला, जालेली, घुड़ला, व कोलार (पंजाब) आदि गांवों में आबाद है
उपरोक्त गांवों के अलावा राजस्थान के बहुत से दूसरे गांवों में लुलावत पड़िहारो की अन्य उपशाखाएं भी आबाद हैं जैसे कि - उदासर (बीकानेर), दुलचासर, सूरतसिंहपुरा, सुरधना पड़िहारान, मेहरासर, खारड़ा, नापासर, नांदड़ा, अमरपुरा भाटियान, इत्यादि एवं डूंगरगढ, सरदारशहर, नोखा, नागौर, ओसिया, शेरगढ़ तहसीलो के कुछ गांवों में भी आबाद है
 उपरोक्त कुछ गांवों में उदयसिंघोत और कुछ गांवों में नादावत व किसी किसी गांव में रामोटा (रामावत) पड़िहार भी आबाद है तथा मूल रूप से अवलोकन किया जाए तो यह सभी लुलावत पड़िहारो से ही निकली हुई उपशाखाएं हैं (सिर्फ रामोटा पड़िहारो को छोड़कर)
लुलावत शाखा के अन्य गांव खारा बीकानेर हुसनसर बीकानेर रजपूरिया व सानई जोधपुर,खाखूरी(फलोदी जोधपुर) हरियाढाणा,रणसी गांव,खि़रजाँ भोजा, अजबार, बेलवा, नवतला, खुडियाला, बस्तवा, भालू राजवा खियासरिया, बांकियावास कल्लां,बोङाना, नोख, खाखूसरी,


16 रामोटा(रामावत प्रतिहार)
नान्दड़ी, नान्दड़ा कलाँ खूर्द,कुथड़ी,डिगाड़ी,जालेली, हिरादेसर जोधपुर, गुढ़ा बीकानेर इन गांवो में सीमित संख्या में ही आबाद है। कारण है  किसी समय पूंगलगढ़ में तांबल नामक रामटा पडिहार का शासन था। लोकदेवता रामदेवजी के समकालीन पूंगलगढ़ पर पड़िहारों का शासन था तो वहा के इतिहास एवं इतिहासिक देस्तावजो का संरक्षण व संवर्द्धन नहीं हो पाया है जो कि आज लगभग अनूपलब्ध  तथा एक गहन शोध का विषय है।


(17) चौनिया प्रतिहार
यह फलोदी(राज.) में आबाद हो सकते है।

(18)मुढाड (मडाड प्रतिहार)
करनाल,कुरुक्षेत्र,जीन्
द,अम्बाला,पटियाला,रोपड़,सहारनपुर,रूडकी आदि में मिलते हैं हरियाणा से विस्थापित मुस्लिम मड़ाड राजपूत पाकिस्तान में बड़ी संख्या में मिलते हैं जो अपने कुल पर आज भी गर्व करते हैं
अब मुंढाड राजपूत वंश हरियाणा के 80 गांव में बसता है।


== प्रतिहार/परिहार वंश की वर्तमान स्थिति==

भले ही यह विशाल प्रतिहार राजपूत साम्राज्य 15 वीं शताब्दी के बाद में छोटे छोटे राज्यों में सिमट कर बिखर हो गया हो लेकिन इस वंश के वंशज राजपूत आज भी इसी साम्राज्य की परिधि में मिलते हैँ।

आजादी के पहले भारत मे प्रतिहार राजपूतों के कई राज्य थे। जहां आज भी ये अच्छी संख्या में है।

मण्डौर, राजस्थान,जालौर, राजस्थान
माउंट आबू, राजस्थान पाली, राजस्थान बेलासर, राजस्थान चुरु , राजस्थान बाड़मेर राजस्थान कन्नौज, उतर प्रदेश हमीरपुर उत्तर प्रदेश प्रतापगढ, उत्तर प्रदेश झगरपुर, उत्तर प्रदेश उरई, उत्तर प्रदेश जालौन, उत्तर प्रदेश इटावा , उत्तर प्रदेश कानपुर, उत्तर प्रदेश उन्नाव, उतर प्रदेश उज्जैन, मध्य प्रदेश चंदेरी, मध्य प्रदेश ग्वालियर, मध्य प्रदेश जिगनी, मध्य प्रदेश झांसी, मध्य प्रदेश अलीपुरा, मध्य प्रदेश
नागौद, मध्य प्रदेश उचेहरा, मध्य प्रदेश दमोह, मध्य प्रदेश सिंगोरगढ़, मध्य प्रदेश एकलबारा, गुजरात मियागाम, गुजरात कर्जन, गुजरात काठियावाड़, गुजरात उमेटा, गुजरात दुधरेज, गुजरात  खनेती, हिमाचल प्रदेश कुमहारसेन, हिमाचल प्रदेश जम्मू , जम्मू कश्मीर आदि







गुरुवार, 10 जनवरी 2019

पांडूका में मिली प्रतिहार/परिहार कालीन बावड़ी "

पांडूका में मिली प्रतिहार/परिहार कालीन बावड़ी "


मेड़ता सिटी





सोगावास ग्राम पंचायत के राजस्व ग्राम पांडूका में माताजी मंदिर के पीछे स्थित नाड़ी में एक बावड़ी के अवशेष मिले हैं। यह बावड़ी सातवीं शताब्दी में निर्मित हुई थी। यह प्रतिहार कालीन है। वहां मिले एक शिलालेख से इसकी पुष्टि हुई है। मंदिर समिति इन दिनों नाडी की मिट्टी खुदवा रही है।

जेसीबी से खुदाई के दौरान अचानक भगवान गणेश की कुछ मूर्तियां, एक मंदिर का शिखर गुफानुमा सुरंग में कुछ सीढ़ियां नजर आई। इस आधार पर यहां बावड़ी मिलने का दावा किया जा रहा है। मंदिर पुजारी महावीर वैष्णव तथा कांतीदास वैष्णव आदि ने भी खुदाई में बावड़ी निकलने की पुष्टि की है।

सूचना मिलने पर राजस्थान धरोहर संरक्षण एवं प्रोन्नति प्राधिकरण के इतिहासकार नरेन्द्र सिंह शेखावत मौके पर पहुंचे और पुजारियों से इस बाबत जानकारी ली। शेखावत ने भास्कर न्यूज को बताया कि वहां एक धातु पात्र, नाग-नागिन की मूर्ति एवं मंदिर के अवशेष मिले हैं।

बावड़ी की सीढिय़ां स्पष्ट दिखाई देने लगी है। उन्होंने बताया कि एकाध दिन में और अधिक खुदाई होने पर सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा। शेखावत ने इस आशय की जानकारी कलेक्टर मेड़ता उपखण्ड अधिकारी राकेश कुमार गुप्ता को भी दी है। गुप्ता ने बताया कि प्राचीन बावड़ी के अवशेष मिलने की जानकारी मिली है। शनिवार को मौका देखा जाएगा।

पांडूका के माताजी मंदिर में मिले प्राचीन बावड़ी के अवशेष, यहां खुदाई जारी है।

मेड़ता में शासन की पुष्टि

प्राचीन बावड़ी पर लगे शिलालेखों से 7वीं शताब्दी में प्रतिहारों के शासन होने की तथा 13वीं शताब्दी में अल्लाउद्दीन खिलजी के प्रतिनिधि ताजूद्दीन अली के मेड़ता में शासन करने पुष्टि हो रही है।

जय माँ भवानी।।
जय क्षात्र धर्म।।

बुधवार, 9 जनवरी 2019

प्रतिहार शैली में बने बटेश्वर मंदिरों का इतिहास ===

प्रतिहार शैली में बने बटेश्वर मंदिरों का इतिहास ===

मित्रों कुछ दिनो पहले इपिक चैनल द्वारा दिखाए जा रहे " एकांत सीरियल" में लक्ष्मणवंशी प्रतिहार राजवंश के शासन काल के समय बनवाये गये बटेश्वर मंदिर, पडावली मंदिर, चौसठ योगिनी मंदिर को बनवाने वाले परिहार वंश के बारे मे जानकारी दी गई।

एस. के. द्विवेदी ने प्रतिहार क्षत्रिय साम्राज्य पर भी चर्चा की और बताया की आज अगर हिन्दू धर्म भारत में बचा हुआ है उसका श्रेय परिहार राजवंश को जाता है। जिन्होंने अरबों से 300 वर्ष तक लगभग 200 से ज्यादा युद्ध किये जिसका परिणाम है कि हम आज यहां सुरक्षित है। 

प्रतिहार क्षत्रियों का इतिहास सौ दो सौ वर्षों का न होकर हजारो वर्षो का यह कटु सत्य है कि इस धरती पर स्थाई रुप से किसी राजवंश ने शासन नही किया है। यहां अनेको क्षत्रिय राजवंशो ने समयानुसार शासन किया और अपने वीरता, शौर्य , कला का प्रदर्शन कर सभी को आश्चर्य चकित किया। 

मित्रों मनुस्मृति में प्रतिहार ,परिहार, पडिहार, यह सभी शब्द एक है। जहां मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार, हिमाचल प्रदेश, में प्रतिहार लोग परिहार लिखते है वही राजस्थान में प्रतिहार लोग पडिहार शब्द से जाने जाते है और गुजरात के प्रतिहार लोग पढियार नाम से जाने जाते है।

आइये जानते है बटेश्वर के इतिहास को जो प्रतिहार शैली पर बना है जो अपने आप मे एक अदभुत कला है। 

---- > बटेश्वर मंदिर का इतिहास < ----

मध्य प्रदेश के मुरैना से लगभग 35 किलोमीटर दूर बीहड़ों में एक जगह पड़ती है "बटेश्वर तीर्थ" वहां आठवीं से दसवीं शताब्दी के बीच परिहार क्षत्रिय वंशों द्वारा बनवाई गई अब तक सबसे बेहतरीन कला है करीब एक ही जगह पर 200 मंदिरों का निर्माण किया गया था।।

इन मंदिरों का निर्माण प्रतिहार/परिहार क्षत्रिय राजवंश के सम्राट मिहिरभोज के शासनकाल से प्रारम्भ हुआ और सम्राट विजयपाल प्रतिहार के शासनकाल के समय इन मंदिरों का निर्माण कार्य पूरा हुआ।। 

भगवान् शिव और विष्णु को समर्पित ये मंदिर खजुराहो से भी तीन सौ वर्ष पूर्व बने थे चम्बल में डाकुवों के आतंक के कारण ये और भी उपेक्षित रहे और लगभग सारे के सारे गिर चुके थे।।

भारतीय पुरातत्व विभाग के डायरेक्टर (ASI) "के के मुहम्मद" ने इन मंदिरों को पुनर्स्थापित करने का जिम्मा उठाया हैं।।

के के मुहम्मद की वजह से ही आज प्रतिहार / परिहार क्षत्रियों द्वारा बनावाये दो सौ भी अधिक मंदिर वहां अपने पुराने रूप में लाये जा चुके हैं। के के मुहम्मद इन मंदिरों को अपना तीर्थ मानते हैं और चाहते हैं कि आने वाले समय में इस स्थान को तीर्थ यात्रा के रूप में मान्यता मिले, के.के. जी ने भारत के विभिन्न स्थानों पर कई मंदिरों का जीर्णोद्वार किया है।।

के के मुहम्मद मंदिरों और भारतीय मान्यातों का बहुत गूढ़ ज्ञान और श्रद्धा रखते है, और बिना श्रद्धा के इस तरह का पुनर्निर्माण संभव नहीं होता है ।।

बटेश्वर मंदिर के अलावा भी प्रतिहार राजपूतों ने कई चीजो का निर्माण किया था जिसमे मुरैना मप्र.के पडावली मंदिर, चौसठ योगिनी मंदिर आदि जो आप सभी मित्रों को वहां जाकर देखने को मिलेगा। आप सभी मित्रों से एवं परिहार क्षत्रियों से अनुरोध है कि अपने पूर्वजों की कला को जरुर देखे अभी यहां काम चल रहा टूटे हुए मंदिरों के जोडऩे पर काफी समय लगेगा फिर भी एक बार जरुर जाकर देखे।

Jai mihirbhoj pratihar
Jai Maa Gaajan

शनिवार, 5 जनवरी 2019

भारतवर्ष में प्रतिहार राजपूतों के ठिकाने। पडिहार परिहार पढ़ियार

भारतवर्ष में प्रतिहारो ( परिहारों) के ठिकाने
ई. स 1129 के बाद ग्वालियर पर प्रतिहारो का अधिकार तथा पहला प्रतिहार शासक परमलदेव था ग्वालियर पर प्रतिहारो का लगभग सौ वर्षों तक अधिकार रहा तथा वर्तमान में भी ग्वालियर के आसपास कई गांवो में प्रतिहारो का निवास है।
सन 1258 ई. मे बलबन बहुत शक्तिशाली हो गयाथा उसने बडी सेना लेकर ग्वालियर पर आक्रमण कर दिया उस समयतक चाहडदेव स्वर्गवासी हो चुका था। उसका नाती " गणपति याजपल्ल " दुर्ग का अधिपति था।इसमें इतनी क्षमता नही थी की कुछ हजार सैनिकों के बल पर वह दिल्ली की सेना का सामना कर सके। अस्तु वह रात में ही परिवार सहित बिहार चला गया। जहां इनके वंशजो ने परिहारपुर ग्राम बसाया और आज भी हजारो की संख्या में आबाद है। और बाकी कुछ प्रतिहार दल झगरपुर , वीसडीह , मैनीयर उत्तर सुरिजपुर , सुखपुरा, हरपुरा आदि ग्रामों मे आबाद है। चाहडदेव ने अपने राज्य का विस्तार चंदेरी तक कर लिया था। इस तरह कभी सत्ता मे तो कभी सत्ताहीन होकर ग्वालियर मे परिहारो का आवास रहा है और लगभग 150 वर्षो तक संघर्षरत शासन किया। और आज भी ग्वालियर अंचल मे लगभग 25 से उपर गांव है प्रतिहारो के जो आवासित है।सारंगदेव प्रतिहार13 वीं शताब्दी तक ग्वालियर से परिहार वंश का पतन हो गया और बचे कुचे परिहार अलग अलग जगह बस गये। जिसमे सारंगदेव ग्वालियर को छोडकर मऊसहानियां आ गये। एवं इनके अन्य भाई राघवदेव परिहार रामगढ जिगनी चले गये, रामदेव परिहार औरैया गये एवं छोटे भाई गंगरदेव परिहार डुमराई में जा बसे जहां आज भी इनके वंशज लगभग 30 गांवो से उपर आबाद है।

(2) अलीपूरा के प्रतिहार
अलीपुरा , पन्ना, बुंदेलखंड, जुझौति प्रदेश, बड़ा गांव आदि के आस पास का अंचल।

(3) मलहाजनी के प्रतिहार
वर्तमान में इनके वंशजो के आठ गांव जिला इटावा और तीन गांव जिला रायबरेली में है। वर्तमान में मलहाजनी के वर्तमान ठाकुर कार्तिकेय प्रताप सिंह है।।

(4) पंजाब और हिमाचल के प्रतिहार
पंजाब में प्रतिहार (परिहार) क्षत्रिय जिला अमृतसर, होशियार पुर, तथा सियालकोट आदि स्थानों में हैं। इसी प्रकार रियासत जम्मू में तथा हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा, ऊना जिला में तथा बिलासपुर आदि स्थानों में काफी संख्या में हैं। ये स्वयं को तखी प्रतिहार मानते हैं।
राजस्थान के किसी स्थान से हरिहरदेव नामक प्रतिहार अपने भाई को राज्य देकर ज्वालामुखी की तीर्थ यात्रा पर गया था । वह वापस लौटकर नहीं आया और उसने वहीं पर कांगड़ा के कटोच वंशी शासक त्रिलोकचंद की पुत्री से विवाह कर लिया और दहेज में मिले राज्य का शासक हुआ । वर्तमान में पंजाब एवं अन्य समीप के प्रान्तों में जो प्रतिहार हैं वे इसी राजा हरिहरदेव के वंशज हैं । और ये भी हो सकता है यह कन्नौज के प्रतिहार सम्राट भोजदेव प्रथम के समय में पंजाब में जाने चाहिए क्यूकी उसने पंजाब का सूबेदार अलखान प्रतिहार को नियुक्त किया था ।
इसी प्रकार दोआब और जालंधर में भी तखी प्रतिहार हैं वे भड़ाना गाँव के नाम से भद कहलाते । उनकी पदवी महता है और इन तखी प्रतिहारों का गांव कुशल है

(5) बुंदेलखंड ओर जुझौति के प्रतिहार
उसर पुनीत, दर्षाण, जेजाकभुक्ती, तथा बुंदेलखंड आदि में आबाद तथा उत्तरप्रदेश की हंडिया तहसील के फूलपुर,बीबीपुर, कुमौना,नसरतपुर, तथा हरिश्चंद्रपुर(इटावा) के आठ गांवो में एवम् मौदहा तथा पाटनपुर गांवो में आबाद है।

(6) चौबीसी के प्रतिहार
बुंदेलखंड अंचल के रामगढ़ जिगनी आदि बारह गांवो में आबाद तथा इसी अंचल के मंगरोठ, मझगवां, लिधोरा, घगवा,अटोलया, गुढ़ा चिकासी आदि में तथा प्रतिहारों के प्रसिद्ध दुर्ग रामगढ़ पर बुंदेलों के अधिकार हो जाने से तथा वहाँ के शासक महासिंह के युद्ध मे मारे जाने पर इस क्षेत्र के प्रतिहारों की शक्ति क्षीण हो गई। महासिंह के बडे पुत्र तो ग्वालियर की गद्दी पर थे तथा छोटे दो पुत्र वापस रामगढ आ गये। जहां बुंदेला शासक ने बडे भाई मदनदेव प्रतिहार को राव की उपाधि दी तथा जिगनी जागीर मे दी। इसके वंशधर बारह गांवो मे है। राव मदनदेव के सात पुत्र थे, राव जैतसिंह जिगनी, पहाडसिंह मंगरोठ, बानसिंह मझगवां, रणसिंह लिधौरा, बलसिंह गधवा, सिहणदेव अटैलिया, औधणसिंह गुढा चिकासी आदि मे इनके वंशज है। राव जैतसिंह के दस पुत्र थे, राव जसकरण सिंह जिगनी तथा शत्रुजीत, प्रतापसिंह और हाथीराज सिंह भी जिगनी मे ही रहे। सबदल सिंह को कटरा मानपुर (इलाहाबाद) मे जागीर मिली, चितर सिंह को बिल्टी कानपुर में, रामसिंह को मलहेटा की तथा मुकुट सिंह को झगडपुर जिला उन्नाव की जागीर मिली और भूपतसिंह एवं रतन सिंह मलहेटा जिला हमीरपुर मे रहे उक्त स्थानों पर आज भी इनके वंशज अच्छी संख्या में आबाद है।


(7)।   > उरई और उन्नाव के प्रतिहार < -----
ग्वालियर के प्रतिहार क्षत्रिय शासक विजयपालदेव के तृतीय पुत्र शिविरशाह ने वि.सं. 1123 में खंगारो से कालपी, महोवा आदि विजय किया तथा कुर्मियों से कोंच ले लिया और उरई को अपनी राजधानी बनाई। इनके दो पुत्र थे छत्रपालदेव और ब्रजदेव। ब्रजदेव परिहार गंगा स्नान करने गये थे, उनका उन्नाव में झगडा हो गया , इन्होने उन्नाव को विजय किया। इनके वंशज उन्नाव ,रायबरेली, जालौन तथा कानपुर आदि स्थानो मे है।


(8) कलहंस प्रतिहार वंश
वर्तमान में इस वंश के छह द्वारे प्रसिद्ध है। इस क्षेत्र में इनकी छह रियासते थी। वर्तमान समय मे इस शाखा के क्षत्रिय उत्तर प्रदेश के गोंडा, बस्ती, जिले मे शोहरतगढ जो राज्य था, तुलसीपुर, प्रतापगढ तथा बिहार के आरा , छपरा ,भागलपुर, शाहाबाद जिलो मे आवसित है।


(9) दगरावरसेला (चम्बलतट) के प्रतिहार
मदनपुर, उटशाना, बड़ोस, उमरैण,राजौरा। व रायपुर में थोड़े बहुत आबाद है। उत्तरप्रदेश के आगरा जिले में फरहौला, गुर्जा,कमले,मढिवायदपुर   काकर खेड़ा, पिडोरा, अर्नोट, आदि गांवों व इनके आस पास काफी संख्या में आबाद है।


(10) ------- > सिंध के प्रतिहार < ---------
सिंध मे बसने के कारण ही ये सिंध परिहार कहलाते है। जैसलमेर के यदुवंशी भाटी क्षत्रियों ने इन्हे जाम की पदवी से विभूषित किया था। वर्तमान में ये राजस्थान मे कहीं - कहीं तथा सिंध (पाकिस्तान) और जूनागढ (गुजरात) आदि स्थानों पर निवास करते है एवं ये लगभग दो हजार की संख्या मे आबाद है।


(11) सोंधिया प्रतिहार
प्रतिहार शासक लुल्लर के सातवे वंशज दीपसिंह ने सिंध नदी के तट पर शत्रु को परास्त  करके विजय हासिल की थी अत: इनके वंशज  सोंधिया प्रतिहार कहलाए। वर्तमान में इनके वंशज मध्यप्रदेश के ग्वालियर क्षेत्र  तथा झालावाड़ के क्षेत्र में आबाद है।


(12) देवल प्रतिहार
यह वंश राजस्थान के जालौर जिले में आबाद है।
इस शाखा में अनेक सूरमा हुवे जिनमें कुंवर नरपाललदेव देवल का नाम विशेष उल्लेखनीय है
जिसका वीरतापूर्वक युद्ध करते हुवे सिर कट गया था।  सिर कटने के बाद  भी वह युद्धरत रहा तथा शत्रु  सेना का भारी विनाश करके हाहाकार मचा दिया। इसी शाखा के ठाकुर रायधवल ने अपनी पुत्री का विवाह मेवाड़ के  राणा प्रताप सिंह के साथ किया था ।
जालौर क्षेत्र के जसवंतपुरा, रानीवाडा पहाडपुरा मुख्य ठिकाने है इन क्षेत्रों में काफी अच्छी संख्या में देवल प्रतिहार है एवं रानीवाडा विधानसभा से वर्तमान विधायक नारायणसिंह देवल है।


(13) जेठावा प्रतिहार
यह वंश मूल रूप से कश्मीर का है। तथा वहा से सिंध होते हुए काठियावाड़ (सौराष्ट्र) पहुंचकर अपना राज्य स्थापित किया। यह क्षेत्र जेठवाड़ भी कहलाता है। इसकी राजधानी धुमली थी जिसका दूसरा नाम भूतांबिका था। इसलिए यहां के निवासी भुतहा प्रतिहार भी कहलाते है।जेठवा शासकों ने सौराष्ट्र में श्रीनगर ग्राम बसाया। तथा सूर्य का मंदिर बनवाया। जेठवा शासक  राणा सुल्तान जी  ने ई. स सन 1671 से 1699 में पोरबंदर में किले का निर्माण करवाया। भारत के स्वतंत्र होकर देशी राज्यो के विलनिकरण तक पोरबंदर पर जेठवा प्रतिहारो का शासन रहा। आज भी इस क्षेत्र मे पांच हजार से उपर जेठवा परिहार राजपूत निवास कर रहे है।


(14) इंदा प्रतिहार
सूर् पड़िहार के पुत्र इंद्र ने अपने नाम से एक अलग  शाखा चलाई जो कि इंदा पड़िहार कहलाये | वर्तमान में मारवाड़ की शेरगढ़ तहसील में इंदा पड़िहारो के कुल 27 गांव हैं जो कि इंदावटी के नाम से जानी जाती है यह पूरे गांव एक दूसरे से सटे हुए हैं जिससे इनका क्षेत्रफल उतना नहीं है जितना 27 गांवों का होना चाहिए इंदावटी के अलावा भी इनके छिटपुट तौर पर बीकानेर जिले में भी घर आबाद है कोलायत तहसील में एक इंदो का गांव है जिसको इंदो का बाला कहते हैं


(15) लुलावत पड़िहार (प्रतिहार)
राजस्थान में पड़िहारो के काफी संख्या में गांव है जो कि मूल रूप से लुलावत ही है परंतु समय के साथ-साथ अपने पूर्वजों के नाम से उप शाखाओं में में विभक्त होते गए संघन घनत्व की दृष्टि से अवलोकन किया जाए तो रतनसिंघोत लुलावतो की तादाद सबसे ज्यादा हैं बीकानेर तहसील का बेलासर गांव पूरे राजस्थान में इनका सबसे बड़ा गांव है तथा द्वितीय श्रेणी पर पोकरण तहसील का गांव छायण आता है इन दो गांवों के अतिरिक्त इस गोत्र के पड़िहार बीकानेर, रतनगढ़, हुडेरा, सूरतगढ़, नोहर, दून्कर, गोपालसर, धीऀगधाणिया, जाजीवाल, बावरला, जालेली, घुड़ला, व कोलार (पंजाब) आदि गांवों में आबाद है
उपरोक्त गांवों के अलावा राजस्थान के बहुत से दूसरे गांवों में लुलावत पड़िहारो की अन्य उपशाखाएं भी आबाद हैं जैसे कि - उदासर (बीकानेर), दुलचासर, सूरतसिंहपुरा, सुरधना पड़िहारान, मेहरासर, खारड़ा, नापासर, नांदड़ा, अमरपुरा भाटियान, इत्यादि एवं डूंगरगढ, सरदारशहर, नोखा, नागौर, ओसिया, शेरगढ़ तहसीलो के कुछ गांवों में भी आबाद है
 उपरोक्त कुछ गांवों में उदयसिंघोत और कुछ गांवों में नादावत व किसी किसी गांव में रामोटा (रामावत) पड़िहार भी आबाद है तथा मूल रूप से अवलोकन किया जाए तो यह सभी लुलावत पड़िहारो से ही निकली हुई उपशाखाएं हैं (सिर्फ रामोटा पड़िहारो को छोड़कर)
लुलावत शाखा के अन्य गांव खारा बीकानेर हुसनसर बीकानेर रजपूरिया व सानई जोधपुर,खाखूरी(फलोदी जोधपुर) हरियाढाणा,रणसी गांव,खि़रजाँ भोजा, अजबार, बेलवा, नवतला, खुडियाला, बस्तवा, भालू राजवा खियासरिया, बांकियावास कल्लां,बोङाना, नोख, खाखूसरी,आदि


16 रामोटा(रामावत प्रतिहार)
नान्दड़ी, नान्दड़ा कलाँ खूर्द,कुथड़ी,डिगाड़ी,जालेली, हिरादेसर जोधपुर, गुढ़ा बीकानेर इन गांवो में सीमित संख्या में ही आबाद है। कारण है  वहा के इतिहास एवं इतिहासिक देस्तावजो का संरक्षण व संवर्द्धन नहीं हो पाया है जो कि आज लगभग अनूपलब्ध  तथा एक गहन शोध का विषय है।


(17) चौनिया प्रतिहार
यह फलोदी(राज.) में आबाद हो सकते है।


(18)मुढाड (मडाड प्रतिहार)
करनाल,कुरुक्षेत्र,जीन्
द,अम्बाला,पटियाला,रोपड़,सहारनपुर,रूडकी आदि में मिलते हैं अब मुंढाड राजपूत वंश हरियाणा के 80 गांव में बसता है।


== प्रतिहार/परिहार वंश की वर्तमान स्थिति==

भले ही यह विशाल प्रतिहार राजपूत साम्राज्य 15 वीं शताब्दी के बाद में छोटे छोटे राज्यों में सिमट कर बिखर हो गया हो लेकिन इस वंश के वंशज राजपूत आज भी इसी साम्राज्य की परिधि में मिलते हैँ।

आजादी के पहले भारत मे प्रतिहार राजपूतों के कई राज्य थे। जहां आज भी ये अच्छी संख्या में है।

मण्डौर, राजस्थान,जालौर, राजस्थान
माउंट आबू, राजस्थान पाली, राजस्थान बेलासर, राजस्थान चुरु , राजस्थान बाड़मेर राजस्थान कन्नौज, उतर प्रदेश हमीरपुर उत्तर प्रदेश प्रतापगढ, उत्तर प्रदेश झगरपुर, उत्तर प्रदेश उरई, उत्तर प्रदेश जालौन, उत्तर प्रदेश इटावा , उत्तर प्रदेश कानपुर, उत्तर प्रदेश उन्नाव, उतर प्रदेश उज्जैन, मध्य प्रदेश चंदेरी, मध्य प्रदेश ग्वालियर, मध्य प्रदेश जिगनी, मध्य प्रदेश झांसी, मध्य प्रदेश अलीपुरा, मध्य प्रदेश
नागौद, मध्य प्रदेश उचेहरा, मध्य प्रदेश दमोह, मध्य प्रदेश सिंगोरगढ़, मध्य प्रदेश एकलबारा, गुजरात मियागाम, गुजरात कर्जन, गुजरात काठियावाड़, गुजरात उमेटा, गुजरात दुधरेज, गुजरात  खनेती, हिमाचल प्रदेश कुमहारसेन, हिमाचल प्रदेश जम्मू , जम्मू कश्मीर आदि







 प्रतिहार राजपूत वंश के ठिकाने देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करेhttps://youtu.be/QtN3ZdFXMFU