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शनिवार, 29 दिसंबर 2018

प्रतिहार राजपूत वंश का इतिहास


  • प्रतिहार वंश






यूँ तो प्रतिहारो की उत्पत्ति पर कई सारे मत है,किन्तु उनमे से अधिकतर कपोल कल्पनाओं के अलावा कुछ नहीं है। प्राचीन साहित्यों में प्रतिहार का अर्थ "द्वारपाल" मिलता है। अर्थात यह वंश विश्व के मुकुटमणि भारत के पश्चिमी द्वारा अथवा सीमा पर शासन करने के चलते ही प्रतिहार कहलाया।
अब प्रतिहार वंश की उत्पत्ति के बारे में जो भ्रांतियाँ है उनका निराकारण करते है। एक मान्यता यह है की ये वंश अबू पर्वत पर हुए यज्ञ की अग्नि से उत्पन्न हुआ है,जो सरासर कपोल कल्पना है।हो सकता है अबू पर हुए यज्ञ में इस वंश की हाजिरी के कारण इस वंश के साथ साथ अग्निवंश की कथा रूढ़ हो गई हो। खैर अग्निवंश की मान्यता कल्पना के अलावा कुछ नहीं हो सकती और ऐसी कल्पित मान्यताये इतिहास में महत्त्व नहीं रखती।
इस वंश की उत्पत्ति के संबंध में प्राचीन साहित्य,ग्रन्थ और शिलालेख आदि क्या कहते है इसपर भी प्रकाश डालते है।
१) सोमदेव सूरी ने सन ९५९ में यशस्तिलक चम्पू में गुर्जर देश का वर्णन किया है। वह लिखता है कि न केवल प्रतिहार बल्कि चावड़ा,चालुक्य,आदि वंश भी इस देश पर राज करने के कारण गुर्जर कहलाये।
२) विद्व शाल मंजिका,सर्ग १,श्लोक ६ में राजशेखर ने कन्नौज के प्रतिहार राजा भोजदेव के पुत्र महेंद्र को रघुकुल तिलक अर्थात सूर्यवंशी क्षत्रिय बताया है।
३)कुमारपाल प्रबंध के पृष्ठ १११ पर भी गुर्जर देश का वर्णन है...
कर्णाटे,गुर्जरे लाटे सौराष्ट्रे कच्छ सैन्धवे।
उच्चाया चैव चमेयां मारवे मालवे तथा।।
४) महाराज कक्कूड का घटियाला शिलालेख भी इसे लक्ष्मण का वंश प्रमाणित करता है....अर्थात रघुवंशी
रहुतिलओ पड़ीहारो आसी सिरि लक्खणोत्रि रामस्य।
तेण पडिहार वन्सो समुणई एत्थ सम्प्तो।।
५) बाउक प्रतिहार के जोधपुर लेख से भी इनका रघुवंशी होना प्रमाणित होता है।(९ वी शताब्दी)
स्वभ्राता राम भद्रस्य प्रतिहार्य कृतं सतः।
श्री प्रतिहारवड शोयमत श्रोन्नतिमाप्युयात।
इस शिलालेख के अनुसार इस वंश का शासनकाल गुजरात में प्रकाश में आया था।
६) चीनी यात्री हुएन्त त्सांग ने गुर्जर राज्य की राजधानी पीलोमोलो,भीनमाल या बाड़मेर कहा है।
७) भोज प्रतिहार की ग्वालियर प्रशस्ति
मन्विक्षा कुक्कुस्थ(त्स्थ) मूल पृथवः क्ष्मापल कल्पद्रुमाः।
तेषां वंशे सुजन्मा क्रमनिहतपदे धाम्नि वज्रैशु घोरं,
राम: पौलस्त्य हिन्श्रं क्षतविहित समित्कर्म्म चक्रें पलाशे:।
श्लाध्यास्त्स्यानुजो सौ मधवमदमुषो मेघनादस्य संख्ये,
सौमित्रिस्तिव्रदंड: प्रतिहरण विर्धर्य: प्रतिहार आसी।
तवुन्शे प्रतिहार केतन भृति त्रैलौक्य रक्षा स्पदे
देवो नागभट: पुरातन मुने मुर्तिर्ब्बमूवाभदुतम।
अर्थात-सुर्यवंश में मनु,इश्वाकू,कक्कुस्थ आदि राजा हुए,उनके वंश में पौलस्त्य(रावण) को मारने वाले राम हुए,जिनका प्रतिहार उनका छोटा भाई सौमित्र(सुमित्रा नंदन लक्ष्मण) था,उसके वंश में नागभट हुआ। इसी प्रशस्ति के सातवे श्लोक में वत्सराज के लिए लिखा है क़ि उस क्षत्रिय पुंगव(विद्वान्) ने बलपूर्वक भड़ीकुल का साम्राज्य छिनकर इश्वाकू कुल की उन्नति की।
८) देवो यस्य महेन्द्रपालनृपति: शिष्यों रघुग्रामणी:(बालभारत,१/११)
तेन(महिपालदेवेन)च रघुवंश
मुक्तामणिना(बालभारत)
बालभारत में भी महिपालदेव को रघुवंशी कहा है।
९)ओसिया के महावीर मंदिर का लेख जो विक्रम संवत १०१३(ईस्वी ९५६) का है तथा संस्कृत और देवनागरी लिपि में है,उसमे उल्लेख किया गया है कि-
तस्या कार्षात्कल प्रेम्णालक्ष्मण: प्रतिहारताम ततो अभवत प्रतिहार वंशो राम समुव:।।६।।
तदुंदभशे सबशी वशीकृत रिपु: श्री वत्स राजोडsभवत।
अर्थात लक्ष्मण ने प्रेमपूर्वक उनके प्रतिहारी का कार्य किया,अनन्तर श्री राम से प्रतिहार वंश की उत्पत्ति हुई। उस प्रतिहार वंश में वत्सराज हुआ।
१०) गौडेंद्रवंगपतिनिर्ज्जयदुर्व्विदग्धसदगुर्ज्जरेश्वरदिगर्ग्गलतां च यस्य।
नीत्वा भुजं विहतमालवरक्षणार्त्थ स्वामी तथान्यमपि राज्यछ(फ) लानि भुंक्ते।।
-बडोदे का दानपत्र,Indian Antiquary,Vol 12,Page 160
उक्त ताम्रपत्र के 'गुजरेश्वर' एद का अर्थ 'गुर्जर देश(गुजरात) का राजा' स्पष्ट है,जिसे खिंच तानकर गुर्जर जाती या वंश का राजा मानना सर्वथा असंगत है। संस्कृत साहित्य में कई ऐसे उदाहरण मिलते है।
ये लेख गुजरेश्वर,गुर्जरात्र,गुज्जुर इन संज्ञाओ का सही मायने में अर्थ कर इसे जाती सूचक नहीं स्थान सूचक सिद्ध करता है जिससे भगवान्लाल इन्द्रजी,देवदत्त रामकृष्ण भंडारकर,जैक्सन तथा अन्य सभी विद्वानों के मतों को खारिज करता है जो इस सज्ञा के उपयोग से प्रतिहारो को गुर्जर मानते है।
११) कुशनवंशी राजा कनिष्क के समय में गुर्जरों का भारतवर्ष में आना प्रमाणशून्य बात है,जिसे स्वयं डॉ.भगवानलाल इन्द्रजी ने स्वीकार किया है,और गुप्तवंशियों के समय में गुजरो को राजपूताना,गुजरात और मालवे में जागीर मिलने के विषय में कोई प्रमाण नहीं दिया है। न तो गुप्त राजाओं के लेखो और भडौच से मिले दानपत्रों में इसका कही उल्लेख है।
१२)३६ राजवंशो की किसी भी सूची में इस वंश के साथ "गुर्जर" एद का प्रयोग नहीं किया गया है। यह तथ्य भी गुर्जर एद को स्थानसूचक सिद्धकर सम्बंधित एद का कोइ विशेष महत्व नही दर्शाता।
१३)ब्राह्मण उत्पत्ति के विषय में इस वंश के साथ द्विज,विप्र यह दो संज्ञाए प्रयुक्त की गई है,तो द्विज का अर्थ ब्राह्मण न होकर द्विजातिय(जनेउ) संस्कार से है न की ब्राह्मण से। ठीक इसी तरह विप्र का अर्थ भी विद्वान पंडित अर्थात "जिसने विद्वत्ता में पांडित्य हासिल किया हो" ही है।
१४) कुशनवंशी राजा कनिष्क के समय में गुर्जरों का भारतवर्ष में आना प्रमाणशून्य बात है,जिसे स्वयं डॉ.भगवानलाल इन्द्रजी ने स्वीकार किया है,और गुप्तवंशियों के समय में गुजरो को राजपूताना,गुजरात और मालवे में जागीर मिलने के विषय में कोई प्रमाण नहीं दिया है। न तो गुप्त राजाओं के लेखो और भडौच से मिले दानपत्रों में इसका कही उल्लेख है।
उपरोक्त सभी प्रमाणों के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते है की,प्रतिहार वंश निस्संदेह भारतीय मूल का है तथा शुद्ध क्षत्रिय राजपूत वंश है।
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प्रतिहार वंश
संस्थापक- हरिषचन्द्र
वास्तविक - नागभट्ट प्रथम (वत्सराज)
पाल -धर्मपाल
राष्ट्रकूट-ध्रव
प्रतिहार-वत्सराज
राजस्थान के दक्षिण पष्चिम में गुर्जरात्रा प्रदेष में प्रतिहार वंष की स्थापना हुई। ये अपनी उत्पति लक्ष्मण से मानते है। लक्षमण राम के प्रतिहार (द्वारपाल) थे। अतः यह वंष प्रतिहार वंष कहलाया। नगभट्ट प्रथम पष्चिम से होने वाले अरब आक्रमणों को विफल किया। नागभट्ट प्रथम के बाद वत्सराज षासक बना। वह प्रतिहार वंष का प्रथम षासक था जिसने त्रिपक्षीप संघर्ष त्रिदलीय संघर्ष/त्रिराष्ट्रीय संघर्ष में भाग लिया।
त्रिपक्षीय संघर्ष:- 8 वीं से 10 वीं सदी के मध्य लगभग 200 वर्षो तक पष्चिम के प्रतिहार पूर्व के पाल और दक्षिणी भारत के राष्ट्रकूट वंष ने कन्नौज की प्राप्ति के लिए जो संघर्ष किया उसे ही त्रिपक्षीय संघर्ष कहा जाता है।
नागभट्ट द्वितीय:- वत्सराज के पष्चात् षक्तिषाली षासक हुआ उसने भी अरबों को पराजित किया किन्तु कालान्तर में उसने गंगा में डूब आत्महत्या कर ली।
मिहिर भोज प्रथम - इस वंष का सर्वाधिक षक्तिषाली षासक इसने त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग लेकर कन्नौज पर अपना अधिकार किया और प्रतिहार वंष की राजधानी बनाया। मिहिर भोज की उपब्धियों की जानकारी उसके ग्वालियर लेख से प्राप्त होती है।
- आदिवराह व प्रीाास की उपाधी धारण की।
-आदिवराह नामक सिक्के जारी किये।
मिहिर भोज के पष्चात् महेन्द्रपाल षासक बना। इस वंष का अन्तिम षासक गुर्जर प्रतिहार वंष के पतन से निम्नलिखित राज्य उदित हुए।
मारवाड़ का राठौड़ वंष
मेवाड़ का सिसोदिया वंष
जैजामुक्ति का चन्देष वंष
ग्वालियर का कच्छपधात वंष
प्रतिहार
8वीं से 10वीं षताब्दी में उत्तर भारत में प्रसिद्ध राजपुत वंष गुर्जर प्रतिहार था। राजस्थान में प्रतिहारों का मुख्य केन्द्र मारवाड़ था। पृथ्वीराज रासौ के अनुसार प्रतिहारों की उत्पत्ति अग्निकुण्ड से हुई है।
प्रतिहार का अर्थ है द्वारपाल प्रतिहार स्वयं को लक्ष्मण वंषिय सूर्य वंषीय या रधुकुल वंषीय मानते है। प्रतिहारों की मंदिर व स्थापत्य कला निर्माण षैली गुर्जर प्रतिहार षैली या महामारू षैली कहलाती है। प्रतिहारों ने अरब आक्रमण कारीयों से भारत की रक्षा की अतः इन्हें "द्वारपाल"भी कहा जाता है। प्रतिहार गुर्जरात्रा प्रदेष (गुजरात) के पास निवास करते थे। अतः ये गुर्जर - प्रतिहार कहलाएं। गुर्जरात्रा प्रदेष की राजधानी भीनमाल (जालौर) थी।
मुहणौत नैणसी (राजपुताने का अबुल-फजल) के अनुसार गुर्जर प्रतिहारों की कुल 26 शाखाएं थी। जिमें से मण्डोर व भीनमाल शाखा सबसे प्राचीन थी।
मण्डौर शाखा का संस्थापक - हरिचंद्र था।
गुर्जर प्रतिहारों की प्रारम्भिक राजधानी -मण्डौर
भीनमाल शाखा
1. नागभट्ट प्रथम:- नागभट्ट प्रथम ने 730 ई. में भीनमाल में प्रतिहार वंष की स्थापना की तथा भीनमाल को प्रतिहारों की राजधानी बनाया।
2. वत्सराज द्वितीय:- वत्सराज भीनमाल प्रतिहार वंष का वास्तिवक संस्थापक था। वत्सराज को रणहस्तिन की उपाधि प्राप्त थी। वत्सराज ने औसियां के मंदिरों का निर्माण करवाया। औसियां सूर्य व जैन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। इसके समय उद्योतन सूरी ने "कुवलयमाला" की रचना 778 में जालौर में की। औसियां के मंदिर महामारू षैली में बने है। लेकिन औसियां का हरिहर मंदिर पंचायतन षैली में बना है।
-औसियां राजस्थान में प्रतिहारों का प्रमुख केन्द्र था।
-औसिंया (जोधपुर)के मंदिर प्रतिहार कालीन है।
-औसियां को राजस्थान को भुवनेष्वर कहा जाता है।
-औसियां में औसिया माता या सच्चिया माता (ओसवाल जैनों की देवी) का मंदिर है जिसमें महिसासुर मर्दनी की प्रतिमा है।
-जिनसेन ने "हरिवंष पुराण " की रचना की।
वत्सराज ने त्रिपक्षिय संर्घष की षुरूआत की तथा वत्सराज राष्ट्रकूट राजा ध्रुव से पराजित हुआ।
त्रिपक्षिय/त्रिराष्ट्रीय संर्घष
कन्नौज को लेकर उत्तर भारत की गुर्जर प्रतिहार पूर्व में बंगाल का पाल वंष तथा दक्षिणी भारत का राष्ट्रवंष के बीच 100 वर्षो तक के चले संघर्ष को त्रिपक्षिय संघर्ष कहा जाता है।
3. नागभट्ट द्वितीय:- वत्सराज व सुन्दर देवी का पुत्र। नागभट्ट द्वितीय ने अरब आक्रमणकारियों पर पूर्णतयः रोक लगाई। नागभट्ट द्वितीय ने गंगा समाधि ली। नागभट्ट द्वितीय ने त्रिपक्षिय संघर्ष में कन्नौज को जीतकर सर्वप्रथम प्रतिहारों की राजधानी बनाया।
4. मिहिर भोज (835-885 ई.):- मिहिर भोज को आदिवराह व प्रभास की उपाधि प्राप्त थी। मिहिर भोज वेष्णों धर्म का अनुयायी था। मिहिरभोज प्रतिहारों का सबसे अधिक षक्तिषाली राजा था। इस काल चर्माेत्कर्ष का काल था। मिहिर भोज ने चांदी के द्रुम सिक्के चलवाये। मिहिर भोज को भोज प्रथम भी कहा जाता है। ग्वालियर प्रषक्ति मिहिर भोज के समय लिखी गई।
851 ई. में अरब यात्री सुलेमान न मिहिर भोज के समय भारत यात्रा की। अरबीयात्री सुलेमान व कल्वण ने अपनी राजतरंगिणी (कष्मीर का इतिहास) में मिहिर भोज के प्रषासन की प्रसंषा की। सुलेमान ने भोज को इस्लाम का षत्रु बताया।
5. महिन्द्रपाल प्रथम:- इसका गुरू व आश्रित कवि राजषेखर था। राजषेखर ने कर्पुर मंजरी, काव्य मिमांसा, प्रबंध कोष हरविलास व बाल रामायण की रचना की। राजषेखर ने महेन्द्रपाल प्रथम को निर्भय नरेष कहा है।
6. महिपाल प्रथम:- राजषेखर महिपाल प्रथम के दरबार में भी रहा। 915 ई. में अरब यात्री अली मसुदी ने गुर्जर व राजा को बोरा कहा है।
7. राज्यपाल:- 1018 ई. में मुहम्मद गजनवी ने प्रतिहार राजा राज्यपाल पर आक्रमण किया।
8. यषपाल:- 1036 ई. में प्रतिहारों का अन्तिम राजा यषपाल था।
भीनमाल:- हेनसांग/युवाचांग न राजस्थान में भीनमाल व बैराठ की यात्रा की तथा अपने ग्रन्थ सियू की मे भीनमाल को पोनोमोल कहा है। गुप्तकाल के समय का प्रसिद्व गणितज्ञ व खगोलज्ञ ब्रहमागुप्त भीनमाल का रहने वाला था जिससे ब्रहमाण्ड की उत्पत्ति का सिद्धान्त " ब्रहमास्फुट सिद्धान्त (बिग बैन थ्यौरी) का प्रतिपादन किया।
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---प्रतिहार राजपूतो की वर्तमान स्थिति---
भले ही यह विशाल प्रतिहार राजपूत साम्राज्य बाद में खण्डित हो गया हो लेकिन इस वंश के वंशज राजपूत आज भी इसी साम्राज्य की परिधि में मिलते हैँ।
उत्तरी गुजरात और दक्षिणी राजस्थान में भीनमाल के पास जहाँ प्रतिहार वंश की शुरुआत हुई, आज भी वहॉ प्रतिहार राजपूत पड़िहार आदि नामो से अच्छी संख्या में मिलते हैँ।
प्रतिहारों की द्वितीय राजधानी मारवाड़ में मंडोर रही। जहाँ आज भी प्रतिहार राजपूतो की इन्दा शाखा बड़ी संख्या में मिलती है। राठोड़ो के मारवाड़ आगमन से पहले इस क्षेत्र पर प्रतिहारों की इसी शाखा का शासन था जिनसे राठोड़ो ने जीत कर जोधपुर को अपनी राजधानी बनाया। 17वीं सदी में भी जब कुछ समय के लिये मुगलो से लड़ते हुए राठोड़ो को जोधपुर छोड़ना पड़ गया था तो स्थानीय इन्दा प्रतिहार राजपूतो ने अपनी पुरातन राजधानी मंडोर पर कब्जा कर लिया था।
इसके अलावा प्रतिहारों की अन्य राजधानी ग्वालियर और कन्नौज के बीच में प्रतिहार राजपूत परिहार के नाम से बड़ी संख्या में मिलते हैँ।
बुन्देल खंड में भी परिहारों की अच्छी संख्या है। यहाँ परिहारों का एक राज्य नागौद भी है जो मिहिरभोज के सीधे वंशज हैँ।
प्रतिहारों की एक शाखा राघवो का राज्य वर्तमान में उत्तर राजस्थान के अलवर, सीकर, दौसा में था जिन्हें कछवाहों ने हराया। आज भी इस क्षेत्र में राघवो की खडाड शाखा के राजपूत अच्छी संख्या में हैँ। इन्ही की एक शाखा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर, अलीगढ़, रोहिलखण्ड और दक्षिणी हरयाणा के गुडगाँव आदि क्षेत्र में बहुसंख्या में है। एक और शाखा मढाढ के नाम से उत्तर हरयाणा में मिलती है। व
उत्तर प्रदेश में सरयूपारीण क्षेत्र में भी प्रतिहार राजपूतो की विशाल कलहंस शाखा मिलती है। इनके अलावा संपूर्ण मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तरी महाराष्ट्र आदि में(जहाँ जहाँ प्रतिहार साम्राज्य फैला था) अच्छी संख्या में प्रतिहार/परिहार राजपूत मिलते हैँ।

प्रतिहार गुज्जर कैसे ??
-प्रतिहारो के गल्लका के लेख में स्पष्ट लिखा है के प्रतिहार सम्राट नागभट्ट जिन्हें गुर्जरा प्रतिहार वंश का संस्थापक भी माना जाता है ने गुर्जरा राज्य पर हमला कर गुज्जरों को गुर्जरा देश से बाहर खदेड़ा व अपना राज्य स्थापित किया... अगर प्रतिहार गुज्जर थे तो खुद को ही अपने देश में हराकर बाहर क्यों खड़ेंगे ?? मिहिर भोज के पिता प्रतिहार क्षत्रिय और पुत्र गुज्जर कैसे ??

- हरश्चरित्र में गुजरादेश का जिक्र बाण भट्ट ने एक राज्य एक भू भाग के रूप में किया है यही बात पंचतंत्र और कई विदेशी सैलानियों के रिकार्ड्स में भी पुख्ता होती है। इस गुर्जरा देस में गुज्जरों को खदेड़ने के बाद जिस भी वंश ने राज्य किया गुर्जरा नरपति या गुर्जर नरेश कहलाया। यदि गुज्जर विदेशी जाती है तो दक्षिण से आये हुए सोलंकी/चालुक्य जैसे वंश भी गुर्जरा पर फ़तेह पाने के बाद गुर्जरा नरेश या गुर्जरेश्वर क्यों कहलाये ?

- गुज्जर एक विदेशी जाती है जो हूणों के साथ भारत आई जिसका मुख्य काम गोपालन और दूध मीट की सेना को सप्लाई था तो आज भी गुजरात में गुर्जरा ब्राह्मण गुर्जरा वैश्य गुर्जरा मिस्त्री गुर्जरा धोभी गुर्जरा नाई जैसी जातियाँ कैसे मिलती है ??

- प्रतिहार राजा हरिश्चंद्र को मंडोर के शीलालेखों में द्विज लिखा है , जिनकी ब्राह्मण और क्षत्रिय पत्नियां थी । यह मिहिर भोज के भी पूर्वज थे। रिग वेद और मनुस्मृति के अनुसार द्विज केवल आर्य क्षत्रिय और ब्राह्मण जातियाँ ही हो सकती थीं। अगर हरिशन्द्र आर्य क्षत्रिय थे तो उनके वंशज विदेशी शूद्र गुज्जर कैसे ??

- प्रतिहारों की राजोरगढ़ के शिलालेखों में प्रतिहारों को गुर्जर प्रतिहार लिखा है ये शिलालेख मण्डोर और गललका के शिलालेख से बाद के है यानी प्रतिहारों के गुर्जरा राज्य पर अधिपत्य के बाद स्थापित किये गए। सभी इतिहासकार इन्हें स्थान सूचक मानतें हैं। तो कुछ विदेशी इतिहासकार ये लिखते है के 12वि पंक्ति में गूजरों का पास के खेतों में खेती करने का जिक्र किया गया है तो इस वजह से कहा जा सकता है प्रतिहार गुज्जर थे। अब ये समझा दी भैया के राजा और क्षत्रिय की पदवी पा चुकी राजवंशी जाती क्यों खेती करेगी ?? जबकि ये तो शूद्रों का कार्य माना जाता था। यानि साफ़ है के गुर्जरा देस से राजोर आये प्रतिहार ही गुर्जरा प्रतिहार कहलाए जिनके राज्य में गुर्जर देश से आये हुए गर्जर यानी गुर्जरा के नागरिक खेती करते थे और ये प्रतिहारों से अलग थे ।।।

- अवंती के प्रतिहार राजा, वत्सराज के ताम्रपत्रों और शिलालेखों से यह पता चलता है के वत्सराज प्रतिहार ने नंदपुरी की पहली और आखिरी गुज्जर बस्ती को उखाड़ फेंका नेस्तेनाबूत कर दिया और भत्रवर्ध चौहान को जयभट्ट गुज्जर के स्थान पर जागीर दी। इस शिलालेखों से भी प्रतिहार और गुज्जरों के अलग होने के सबूत मिलते हैं तो प्रतिहार और गुज्जर एक कैसे ???

- देवनारायण जी की कथा के अनुसार भी उनके पिता चौहान क्षत्रिय और माता गुजरी थी जिससे गूजरों की बगड़ावत वंश निकला यही उधारण राणा हर राय देव से कलस्यां गोत्र के गुज्जरों को उतपत्ति ( करनाल और मुज़्ज़फरगर ब्रिटिश गजट पढ़ें या सदियों पुराने राजपूतों के भाट रिकॉर्ड पढ़ें।) , ग्वालियर के राजा मान सिंह तंवर की गुजरी रानी मृगनयनी से तोंगर या तंवर गुज्जरों की उत्पत्ति के प्रमाण मिलतें हैं तो प्रीतिहार राजपूत वंश गुज्जरों से कैसे उतपन्न हुआ ? क्षत्रिय से शुद्र तो बना जा सकता है पर शुद्र से क्षत्रिय कैसे बना जा सकता है
- जहाँ जहाँ प्रतिहार वंश का राज रहा है वहाँ आज भी प्रतिहार राजपूतों की बस्ती है और यह बस्तियाँ हजारों साल पुरानी है पर यहाँ गुज्जर प्रतिहार नहीं पाये जाते।
मंडोर के इलाके में इन्दा व देवल प्रतिहार कन्नौज में कलहंस और मूल प्रतिहार , मध्य प्रदेश में प्रतिहारों को नागोद रियासत व गुजरात में प्रतिहार राजपूतों के आज भी 3 रियासत व् 200 से अधिक गाँव। न कन्नौज में गुज्जर है ना नागोद में ना गुजरात में। और सारे रजवाड़े भी क्षत्रिय व राजपूत प्रतिहार माने जाते है जबकि गुज्जरों में तो प्रतिहार गोत्र व खाप ही नहीं है तो प्रतिहार गुज्जर कैसे ??

- मिहिर भोज नागभट्ट हरिश्चंद्र प्रतिहारों के शिलालेखों और ताम्रपत्रों में इन तीनों को सूर्य वंशी रघु वंशी और लक्षमण के वंश में लिखा है ; गुज्जर विदेशी है तो ये सब खुद को आर्य क्षत्रिय क्यों बता के गए ??!

- राजोरगढ़ के आलावा ग्वालियर कन्नोज मंडोर गल्लका अवंती उज्जैन के शिलालेखों और ताम्रपत्रों में प्रतिहारों के लिये किसी भी पंक्ति व लेख में गुर्जर गू जर गू गुर्जरा या कोई भी मिलता जुलता शब्द या उपाधि नहीं मिलती है साफ है सिर्फ राजोरगढ़ में गुर्जरा देस से आई हुई खाप को गुर्जरा नरेश को उपाधि मिली !! जब बाकि देश के प्रतिहार गुज्जर नहीं तो राजोरगढ़ के प्रतिहार गुज्जर कैसे ??

शुक्रवार, 23 नवंबर 2018

जालौर किले का इतिहास :- क्षत्रिय राजपूत सम्राट नागभट्ट प्रतिहार द्वारा निर्मित

 जालौर किले का इतिहास #









मित्रों आज की इस पोस्ट के द्वारा हम आपको प्रतिहार कालीन सवर्णगिरी पर्वत पर बना जालौर किले के इतिहास के बारे में जानकारी देंगे।।

जालौर राजस्थान के दक्षिणी - पश्चिम में स्थित पूर्व मध्यकाल का एक महत्वपूर्ण स्थल रहा है। जालौर का किला मारवाड़ के महत्वपूर्ण सुदृढ़ किलों में से एक है। 8 वीं शताब्दी अर्थात प्रतिहार काल में इसका निर्माण किया गया था। यह किला हिन्दू पद्धति से बना है। 

जबालिपुर या जालहुर सूकडी नदी के किनारे बना हुआ गिरी दुर्ग है। सोहनगढ एवं सवर्णगिरी कनकाचल के नाम से जाना जाता है। इस दुर्ग का निर्माण 8 वीं शताब्दी में प्रतिहार क्षत्रिय वंश के सम्राट नागभट्ट प्रथम (730 से 760) द्वारा जालौर को देश की राजधानी बनाकर किया गया था। आज तक किसी भी आक्रमणकारी ने आक्रमण के द्वारा इस दुर्ग के द्वार को खोल नहीं पाया। प्रतिहार राजपूतों के जालौर से पलायन पश्चात इस दुर्ग पर बारी बारी से कई शासकों ने राज किया जिसमें परमार, सोनगरा चौहान, खिलजी आदि। पर मूलतः यह किले प्रतिहार वंश का ही है।

# सम्राट नागभट्ट प्रतिहार #

इतिहासकार के.एम.पन्निकर ने अपनी पुस्तक "सर्वे ऑफ़ इंडियन हिस्ट्री "में लिखा है -"जो शक्ति मोहम्मद साहिब की मृत्यु के सौ साल के अंदर एक तरफ चीन की दिवार तक पंहुच गयी थी ,तथा दूसरीऔर मिश्र को पराजित करते हुए उतरी अफ्रिका को पार कर के स्पेन को पद दलित करते हुए दक्षिणी फ़्रांस तक पंहुच गयी थी ,जिस ताकत के पास अनगिनित सेना थी तथा जिसकी सम्पति का कोई अनुमान नही था ,जिसने रेगिस्तानी प्रदेशों को जीता तथा पहाड़ी व् दुर्लभ प्रांतों को भी फतह किया था। 

इन अरब सेनाओं ने जिन जिन देशों व् साम्राज्यों को विजय किया ,वंहा कितनी भी सम्पन्न संस्कृति थी उसे समाप्त किया तथा वंहा के निवासियों को अपना धर्म छोड़ कर इस्लाम स्वीकार करना पड़ा। ईरान , मिश्र आदि मुल्कों की संस्कृति जो बड़ी प्राचीन व विकसित थी ,वह इतिहास की वस्तु बन कर रह गयी। अगर अरब हिंदुस्तान को भी विजय कर लेते तो यहां की वैदिक संस्कृति व धर्म भी उन्ही देशों की तरह एक भूतकालीन संस्कृति के रूप में ही शेष रहता। इस सबसे बचाने का भारत में कार्य नागभट्ट प्रतिहार ने किया। उसने खलीफाओं की महान आंधी को देश में घुसने से रोका और इस प्रकार इस देश की प्राचीन संस्कृति व धर्म को अक्षुण रखा। देश के लिए यह उसकी महान देन है। प्रतिहार/परिहार वंश में वैसे तो कई महान राजा हुए पर सबसे ज्यादा शक्तिशाली नागभट्ट प्रथम एवं मिहिर भोज जी थे जिन्होने अपने जीवन मे कभी भी मुगल और अरबों को भारत पर पैर जमाने का मौका नहीं दिया । इसीलिए आप सभी मित्रों ने कई प्रसिद्ध ऐतिहासिक किताबो पर भी पढा होगा की प्रतिहारों को इस्लाम का सबसे बड़ा दुश्मन बताया गया है।।

इस किले में प्रतिहार कालीन वास्तु शैली, परमार कालीन कीर्ती स्तंभ, कान्हणदेव की बावणी, वीरमदेव की चौकी, जैन मंदिर एवं मल्लिकाशाह की दरगाह आदि वास्तु शिल्प के मुख्य नमूने है।

1311 वीं शताब्दी में अलाउद्दीन खिलजी ने यहां के शासक कान्हणदेव चौहान से बडा ही भयावह युद्ध किया और बडे ही मुश्किल से उन्हें परास्त किया और इस दुर्ग को अपने अधिकार में ले सका। 

दुर्ग में प्रवेश के लिए दो द्वार है मुख्य द्वार को सूरज पोल एवं द्वितीय पिछले द्वार को ध्रुव पोल के नाम से जाना जाता है।


प्रतिहारों का मूल प्रदेश आबू पर्वत अर्थात माउंट आबू था। किवदंती अनुसार इस स्थान से रिषी जी के यज्ञोपवीत संस्कार हुआ तभी प्रतिहार सूर्यवंशी से अग्निवंशी कहलाने लगे। और आंगे के इतिहासकारों ने भी बिना किसी शोध के आंख मूदकर प्रतिहार राजपूतों को हर जगह अग्निवंशी ही बता डाला जिससे समाज में प्रतिहारों के अग्निवंशी होने पर हास्य हुआ। कहा जाता है कि भारत भ्रमण करने से पहले ही यह क्षेत्र गुजरात्रा नाम से जाना जाता था। प्रतिहार सत्ता का विस्तार मण्डौर मेढ़ता से हुआ, जो उन दिनों "मारुमण्ड" कहलाता था जब प्रतिहारों की एक शाखा अर्थात ज्येष्ठ शाखा मण्डौर से जालौर आई तब प्रतिहारों को उनके समकालीन लोग गुर्जर कहने लगे और यही लोग जब स्थांनातरित होकर कन्नौज आये तब गुर्जर - प्रतिहार नाम से विख्यात हुए। 

गुर्जर शब्द गुजरात्रा क्षेत्र से आये हुए लोगो के लिए है न कि किसी जाति से संबंधित है। और न ही प्रतिहार गुज्जर/गुर्जर मूल के है। गुर्जर जाति आजकल प्रतिहारों को शोसल मीडिया पर गुज्जर जाति का बता रही है। प्रतिहार सूर्यवंशी क्षत्रिय है। प्रतिहारों ने अपने नाम के साथ कभी भी गुर्जर शब्द प्रयोग नहीं किया यह केवल कुछ मूर्ख इतिहासकारों की ही उपज है। जिससे यह शुद्ध क्षत्रिय वंश बार बार अपमानित हुआ।

प्रतिहारों के पतन के पश्चात गुजरात्रा क्षेत्र मे जब चालुक्य शक्तिमान हुए तब यही गुर्जर शब्द उनके लिए अगली तीन शताब्दियों तक प्रयुक्त होता रहा। गुर्जरात्रा की सीमा पर स्थित "अणहिल पाटक" गुर्जरपुर और गुर्जर नगर कहा गया है। शनैः शनैः गुर्जर शब्द चालुक्यों द्वारा शासित समूचे भू - भाग के लिए प्रयुक्त होने लगा। प्राकृत में उसी को गुजरात कहा जाने लगा। जालौर में विभिन्न राजाओं का शासनकाल इस प्रकार रहा --

सम्राट नागभट्ट प्रतिहार (730 से 760)
सम्राट ककुक्क प्रतिहार
सम्राट देवराज प्रतिहार
सम्राट वत्सराज प्रतिहार

इस तरह जालौर पर प्रतिहार वंश के चार सम्राटों ने शासन किया एवं संपूर्ण भारत वर्ष पर खलीफाओं (अरब) की आंधी को घुसने से रोका। यही से निकलकर कुछ प्रतिहार शाखा कन्नौज, उज्जैन, ग्वालियर, नागौद के लिए प्रस्थान कर गई और यहाँ कई सौ वर्षों तक शासन किया । जिसमें नागौद प्रतिहार बरमै राज्य मुख्य है जिसने 800 सौ वर्षों तक शासन किया है।

Pratihara / Pratihar / Parihar Rulers of india

Refrence : -
(1) प्रतिहार राजपूतो का इतिहास - लेखक रामलखन सिंह
(2) विंध्य क्षेत्र के प्रतिहार वंश का ऐतिहासिक अनुशीलन - लेखक डॉ अनुपम सिंह
(3) प्रतिहारों का मूल इतिहास - लेखक देवी सिंह मंडावा
(4) ग्वालियर प्रशस्ति - मिहिर भोज
(5) राजपूताने का इतिहास पृष्ठ संख्या 161
(6) राजस्थान का इतिहास पृष्ठ संख्या 954
(7) प्राचीन भारत का इतिहास 1 - 8
(8) राजस्थान थ्रू एजेज पृष्ठ संख्या 339/440 - 441
(9) राजोरगढ़ प्रस्तर अभिलेख वि. स. 1016/959 ई. , एपि इंडिया 111, पृष्ठ 263
(10) ग्वालियर प्रशस्ति - आकयॆलाजी इन ग्वालियर, 1934 ग्वालियर

जय माँ चामुण्डा।।
जय क्षात्र धर्म।।
मंडोर रियासत।।

श्री गाजण माता युथ ब्रिगेड राजस्थान

बुधवार, 21 नवंबर 2018

क्षत्रिय प्रतिहार राजपूत वंश का सम्पूर्ण इतिहास

मित्रों आज की इस पोस्ट के द्वारा हम आपको मण्डौर प्रतिहार वंश के संस्थापक राजा हरिश्चंद्र प्रतिहार जी के बारे में जानकारी देंगे।।

मण्डौर वर्तमान में राजस्थान के जोधपुर जिले मे है यहाँ राठौड़ राजपूतों के आगमन के पहले यह स्थान कभी प्रतिहार राजपूतों के अधीन था और यह प्रतिहारों का सबसे प्राचीन राज्य भी था यही से प्रतिहार/परिहार राजपूत वंशजो की शाखाएँ निकलकर विस्तृत हुई जिनमे जालौर, कन्नौज, उज्जैन, ग्वालियर नागौद, अलीपुरा मुख्य रुप से है यहां आज भी प्रतिहार राजपूत अच्छी संख्या में आबाद है।

550 ईस्वीं के लगभग जोधपुर अंचल में हरिश्चन्द्र प्रतिहार द्वारा स्थापित यहां प्रतिहारों की शाखा है। इसकी राजधानी माण्डव्यपुर थी। भीनमाल जोधपुर तथा घटियाला अभिलेखों द्वारा इस शाखा के ग्यारह शासकों की जानकारी मिली है। राजा विप्र हरिश्चंद्र वेदशास्त्र पारंगत प्रतिहार/परिहार वंश के गुरु अर्थात पूर्वज थे। राजशेखर महेन्द्रपाल को 'रघुकुलतिलक' और रघुग्रामणी तथा महिपाल रघुवंशमुक्तामणि जैसे विशेषण देता है। श्री ए.के. व्यास का कथन है कि "विप्र" शब्द क्षत्रिय राजाओं के लिए रीषि अर्थ में प्रयोग किया गया है। यह क्षत्रिय वर्ण का था इसी वंश का इतिहास बाद के अभिलेखों में बाउक के जोधपुर अभिलेख और ककुक्क के अभिलेखों से प्राप्त होता है। इनमें दी गई वंशावलियों में अंतिम राजाओं में अवश्य अंतर है, परंतु वंशावली समान है

राजा हरिश्चंद्र बहुत ही योग्य और वीर शासक था इसने लगभग 550 ईस्वीं के लगभग राजपूताना जोधपुर के पास के क्षेत्र पर अपना अधिकार स्थापित किया और मण्डौर को अपनी राजधानी बनाया। बाउक के जोधपुर अभिलेख के अनुसार राजा हरिश्चंद्र ने मण्डौर नामक स्थान पर शत्रुओं को आतंकित करने वाला दुर्ग भी बनवाया। राजा हरिश्चंद्र की दो पत्नियां थी पहली बडी पत्नी से सहचरी देवी से चार पुत्र भोजभट्ट, कक्क, रज्जिल, दद्द उतपन्न हुए। इन क्षत्रिय कुमारों ने मण्डौर का दुर्ग जीतकर उसकी प्राचीरों को ऊँचा किया।

घटियाला अभिलेख से ज्ञात होता है कि प्रतिहार वंश की परंपरा तीसरे भाई रज्जिल प्रतिहार से प्रारंभ हुई। इस प्रकार प्रतिहार सत्ता का प्रारम्भ "मण्डौर - मेढ़ता " से हुआ। संभवतः रज्जिल के बाद नगभट्ट प्रतिहार (600 - 625) हुआ।

नगभट्ट प्रतिहार ने मेदांतपुर को अपनी राजधानी बनाया।उसके पुत्र तट और भोज दोनो क्रमशः 675 ईस्वीं तक राज्य किया। तट के पराक्रमी पुत्र यशोवर्धन ने शालवंशी प्रथुवर्धन को पराजित किया जिससे वह पूर्व में हार गया था।।

यशोवर्धन के बाद कंदुक गद्दी पर बैठा। कंदुक ने उतराधिकारी शीलुक ने भट्टी देवराज को परास्त किया। शीलुक के ही शासनकाल में अरब आक्रमणकारी जुनैद आया था। उसके पश्चात (750 - 825) ईस्वीं के मध्य क्रमशः जोट भिलदित्य और कक्क इस वंश में हुए। कक्क ने कन्नौज मालवा शाखा के शासक नागभट्ट द्वितीय के साथ मिलकर गौड़ नरेश को पराजित किया। 837 ईस्वीं के जोधपुर अभिलेख में प्रतिहार वंश से संबंधित विस्तृत जानकारी प्राप्त हुई।  प्रतिहार के बाद उसका सौतेला भाई कक्कुक गद्दी पर बैठा। प्रतिहार राजपूतों के उत्तर भारत में कई राज्य थे। जिनमें अलग अलग प्रतिहार नरेश शासन करत थे। लेकिन वह सभी मण्डौर से ही संबंधित थे। प्रतिहारों की भारत में ज्येष्ठ गद्दी एवं प्राचीन राज्य मण्डौर है। क्योंकि जितने भी प्रतिहार राजपूत है भारत में उन सभी के पूर्वज मण्डौर के ही वंशज है। मण्डौर के बाद भारत मे प्रतिहार राजपूतों की सबसे बडी रियासत नागौद बरमै राज्य है जो 1950 तक काबिज रही यहां आज भी 20 से 25 हजार प्रतिहार निवास करते हैं।

प्रतिहार वंश के महान राजा

(1) राजा हरिश्चंद्र प्रतिहार
(2) राजा नागभट्ट प्रतिहार
(3) राजा यशोवर्धन प्रतिहार
(4) राजा वत्सराज प्रतिहार
(5) राजा नागभट्ट द्वितीय प्रतिहार
(6) राजा मिहिर भोज प्रतिहार
(7) राजा महेन्द्रपाल प्रतिहार
(8) राजा महिपाल प्रतिहार
(9) राजा विनायकपाल प्रतिहार
(10) राजा महेन्द्रपाल द्वितीय प्रतिहार
(11) राजा विजयपाल प्रतिहार
(12) राजा राज्यपाल प्रतिहार
(13) राजा त्रिलोचनपाल प्रतिहार
(14) राजा यशपाल प्रतिहार
(15) राजा वीरराजदेव प्रतिहार (नागौद राज्य के संस्थापक )

भारत के शौर्य एवं बलिदान की भावभूमि वाले इतिहास में क्षत्रियों का प्रतिहार वंश मण्डौर, उज्जैन, ग्वालियर, कन्नौज, नागौद आदि को एक के बाद एक अपनी शक्ति का केंद्र बनाकर सदियों तक पूरे उत्तरी भारत पर शासन करता रहा खासकर मारवाड़ मे सीहाजी के पाली प्रवेश से पूर्व तथा प्रवेश के बाद तक मण्डौर पर प्रतिहारों का एकछत्र शासन रहा है। वि. सं. 1300 (ईस्वी सन 1243) पूर्व तक प्रतिहार ही मारवाड़ के शासक थे।
प्रतिहारों का इतिहास व शासन कोई एक - दो शताब्दियों का नहीँ होकर सैकड़ो शताब्दियों का है। अतः इनके इतिहास में अंतराल व भ्रांतियाँ आना स्वाभाविक ही है।

प्रतिहार सूर्यवंशी क्षत्रिय है जो कि अयोध्या के नरोत्तम राजा रामचंद्र के अनुज लक्ष्मण के वंशज है। क्योंकि वनवास के काल में लक्ष्मण ने राम और सीता जी के प्रतिहार (द्वारपाल) का कार्य किया था। अतः उन्हें प्रतिहार की उपाधि से विभूषित किया गया था। यह मत मरुनरेश बाउक प्रतिहार के नौवीं सदी के शिलालेखों में भी वर्णित है।

राजा मिहिर भोज की ग्वालियर प्रशस्ति में वि. सं. 900 में प्रतिहार राजपूतों को सुमित्रा पुत्र लक्ष्मण का वंशज बताया गया है।

सौमित्रिस्तिव्रदंड : प्रतिहरण विधेर्य: प्रतिहार आसीत।।

बाउक प्रतिहार के नौवीं शताब्दी के शिलालेखानुसार --

स्वभ्राता रामभद्रस्य प्रतिहायॆ कृतयत:।।
श्री प्रतिहार बडशोययतशचोतिमानुयात।।

मित्रों ऐसे हजारों शिलालेखों और अभिलेखों मे प्रतिहार राजपूतों को सूर्यवंशी क्षत्रिय बताया है। क्योंकि अग्नि और सूर्य एक समान है जिस कारण ही प्रतिहार/परिहार राजपूत अग्निवंशी भी कहलाते है। पर यह मूलतः सूर्यवंशी क्षत्रिय है।
== प्रतिहार क्षत्रिय वंश की शाखाएँ ==

(1) डाभी
(2) बडगुजर (राघव)
(3) मडाढ और खडाढ
(4) इंदा
(5) लल्लुरा / लूलावत
(6) सूरा
(7) रामेटा / रामावत
(8) बुद्धखेलिया
(9) खुखर
(10) सोधया
(11) चंद्र
(13) माहप
(14) धांधिल
(15) सिंधुका
(16) डोरणा
(17) सुवराण
(18) कलाहँस
(19) देवल
(20) खरल
(21) चौनिया
(22) झांगरा
(23) बोथा
(24) चोहिल
(25) फलू
(26) धांधिया
(27) खखढ
(28) सीधकां
(29) कमाष / जेठवा
(30) सिकरवार

नोट : - (1) प्रतिहारों / परिहारों का दामन हमेशा ही उज्जवल रहा है इस क्षत्रिय कौम ने मुगलों के साथ कभी भी वैवाहिक संबंध नहीं जोडे। अपने बुरे समय में भी आन - मान को कायम रखा। इन्होने अपनी तलवार से मलेच्छों और अरबों को काटा है परंतु शर्मनाक संधियां करके अपनी जाति को मलीन नहीं किया।

(2) मित्रों आज कल एक गंभीर समस्या हम प्रतिहार राजपूतों के सामने आ गई है कुछ शूद्र जातियां जिसमें मुख्य रुप से गुज्जर/गुर्जर आजकल सम्राट मिहिर भोज प्रतिहार जी को गुज्जर घोषित करने मे लगे हैं एवं प्रतिहार वंश को गुज्जर मूल का बता रही है। इन गुज्जरो ने दिल्ली में मिहिर भोज की मूर्तियां स्थापित कर और राष्ट्रीय राजमार्ग का नामकरण कर बेवजह बिना ऐतिहासिक जानकारी इन्हे गुर्जर बता रहे। पर इन्हे ये नही पता है कि मिहिर भोज प्रतिहार के वंशज नागौद राज्य के प्रतिहार राजपूत है मित्रों मिहिर भोज प्रतिहार कन्नौज को देश की राजधानी बनाकर 50 वर्षो तक शासन किया। इनके मृत्यु के बाद कुछ वर्षों तक इनके पुत्र महेन्द्रपाल प्रतिहार ने शासन किया। फिर गजनी के मोहम्मद ने कन्नौज पर आक्रमण कर नगर जलाकर अपने राज्य मिला लिया था महेन्द्रपाल और उनकी छोटी सेना सामना न कर विंध्य क्षेत्र (बुंदेलखण्ड) यहाँ आ गये थे। फिर परिहार दल ने व्यारमा नदी के तट पर भगवान शिव का ध्यान पूजन कर मंदिर का निर्माण किया और एक नये राज्य की स्थापना की जिसका नाम बरमै राज्य रखा। नागौद प्रतिहार वंश की गद्दी आज भी बरमै गद्दी के नाम से जानी जाती है।

(3) मित्रों आज कल प्रतिहार मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ में परिहार के नाम से जाने जाते है एवं राजस्थान के प्रतिहार आजकल पडिहार एवं गुजरात के प्रतिहार लोग पढियार नाम से जाने जाते है।

(4) मित्रों प्रतिहार, परमार, चौहान, सोलंकी ये चारों सूर्यवंशी क्षत्रिय है। अनपढ चारणों और भाटों की वजह से हमे अग्निवंशी बताया गया है।

(5) प्रतिहार वंश शुद्ध क्षत्रिय वंश है। जिसने गुर्जरात्रा प्रदेष में राज्य किया और हूणों के साथ भारत आये गुज्जर चोरों को अपने राज्य से बाहर किया। यही से निकलकर प्रतिहार राजपूतों की ज्येष्ठ शाखा गुर्जर प्रतिहार एवं बडगुजर कहलाई। इसी का फायदा उठाकर गुज्जर आजकल प्रतिहार वंश को गुज्जर मूल का बता रही है। पर इसमें कोई सच्चाई नहीं है। ये बस आरक्षण और थोडी सी समृद्धि मिलने से है। खाली मिहिर भोज मे दाल नही गली तो पूरे प्रतिहार/परिहार वंश को ही गुज्जर घोषित करने मे लगे हैं। खासकर दिल्ली के गुज्जरों को लगता था कि प्रतिहार राजपूत तो अब है नहीं कही क्यों न इनके नाम से ही श्रेष्ठता पाई जाये इन्हें गुज्जर बताकर पर ये मूरख न जाने की उतर और मध्य भारत मे अच्छी संख्या में प्रतिहार और उनकी शाखाएँ निवास करती है।

Pratihara / Pratihar / Parihar Rulers of india

Refrence : -
(1) प्रतिहारों का मूल इतिहास लेखक - देवी सिंह मंडावा
(2) विंध्य क्षेत्र के प्रतिहार वंश का इतिहास लेखक - डा अनुपम सिंह
(3) परिहार वंश का प्रकाश लेखक - मुंशी देवी प्रसाद
(4) नागौद परिचय लेखक - जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी
(5) मण्डौर का इतिहास लेखक - श्री सिंह

जय चामुण्डा देवी।।
जय मां गाजण
जय मिहिरभोज प्रतिहार
जय नागभट ‌‌‌‌‌प्रतिहार
नागौद रियासत


श्री गाजण माता युथ ब्रिगेड राजस्थान

लुलावत पड़िहार (प्रतिहार)

लुलावत पड़िहार (प्रतिहार)

राजस्थान में पड़िहारो के काफी संख्या में गांव है जो कि मूल रूप से लुलावत ही है परंतु समय के साथ-साथ अपने पूर्वजों के नाम से उप शाखाओं में में विभक्त होते गए संघन घनत्व की दृष्टि से अवलोकन किया जाए तो रतनसिंघोत लुलावतो की तादाद सबसे ज्यादा हैं बीकानेर तहसील का बेलासर गांव पूरे राजस्थान में इनका सबसे बड़ा गांव है तथा द्वितीय श्रेणी पर पोकरण तहसील का गांव छायण आता है इन दो गांवों के अतिरिक्त इस गोत्र के पड़िहार बीकानेर, रतनगढ़, हुडेरा, सूरतगढ़, नोहर, दून्कर, गोपालसर, धीऀगधाणिया, जाजीवाल, बावरला, जालेली, घुड़ला, व कोलार (पंजाब) आदि गांवों में आबाद है 
उपरोक्त गांवों के अलावा राजस्थान के बहुत से दूसरे गांवों में लुलावत पड़िहारो की अन्य उपशाखाएं भी आबाद हैं जैसे कि - उदासर (बीकानेर), दुलचासर, सूरतसिंहपुरा, सुरधना पड़िहारान, मेहरासर, खारड़ा, नापासर, नांदड़ा, अमरपुरा भाटियान, इत्यादि एवं डूंगरगढ, सरदारशहर, नोखा, नागौर, ओसिया, शेरगढ़ तहसीलो के कुछ गांवों में भी आबाद है
 उपरोक्त कुछ गांवों में उदयसिंघोत और कुछ गांवों में नादावत व किसी किसी गांव में रामोटा (रामावत) पड़िहार भी आबाद है तथा मूल रूप से अवलोकन किया जाए तो यह सभी लुलावत पड़िहारो से ही निकली हुई उपशाखाएं हैं (सिर्फ रामोटा पड़िहारो को छोड़कर)

श्री गाजण माता युथ ब्रिगेड राजस्थान

कुचामन का किला राजस्थान के नागौर में स्थित है। यह किला राजस्थान के सबसे पुराने किलों में से है। यह किला पर्वत के सबसे ऊपरी हिस्से पर स्थित है जैसे के एक चील का घोंसला होता है । इसका निर्माण गुर्जर प्रतिहार वंश के महान क्षत्रिय राजपूत सम्राट नागभट्ट प्रथम ने 750 ईo में कराया।। 

गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य का संस्थापक "क्षत्रिय राजपूत सम्राट नागभट्ट प्रतिहार" द्वारा निर्मित यह किला राजस्थान में है। गुर्जर प्रतिहार वंश के शासनकाल में ऐसे कई किलो का निर्माण हुआ जिसमे मण्डौर, जालौर, कुचामन, कन्नौज, ग्वालियर के किले गुर्जर प्रतिहार राजाओं के अत्यधिक मात्रा में समृद्धि होने के 

का प्रमाण देते है। छठवीं शताब्दी से लेकर ग्यारहवीं शताब्दी तक इस प्रबल क्षत्रिय प्रतिहार राजवंश ने हिन्दू धर्म को भारत से विलुप्त होने से बचाया है। लेकिन इनके कर्ज का बदला इनके इतिहास को विलुप्त करके दिया हमारे देश मे । 


300 वर्षो तक अगर विदेशी अरबों की आंधी को रोकने का पूर्णतयः श्रेय अगर किसी को जाता है तो वह केवल गुर्जर प्रतिहार राजवंश को है जिसने हरिश्चन्द्र, नागभट्ट, वत्सराज, मिहिरभोज, महेन्द्रपाल, महीपाल, वीरराजदेव जैसे वीर क्षत्रिय  योद्धा दिये। भारत और भारत के वासी सदैव ही इस प्रतिहार राजपूत वंश के रिणी रहेगें। धन्य है ऐसे राजवंश को जिसने देश की रक्षा हेतु अपने प्राण न्यौछावर करदिए । कुचामन का किला अपने प्रखर और भीमकाय परकोटो, 32 दुर्गों, 10 द्वारो और विभिन्न प्रतिरोधक क्षमता वाला किला है। यह एकमात्र अनोखी वास्तुकला वाला किला है। इस किले में जल संरक्षण और प्रबंधन के अच्छे इंतेजाम है।।


किले में कई भूमिगत टैंक आज भी विद्यमान है   कुचामन किले में कई भूमिगत गुप्त ठिकाने, प्राचीन अंधकूप, कारागार हैं जिन्हें आज भी देखा जा सकता है। वर्तमान मे अब ये हेरिटेज होटल में तब्दील हो गया है और यहा बौलीवुड फिल्मो की सूटिंग होती है।

 जय मां भवानी
जय नागभट प्रतिहार

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श्री गाजण माता युथ ब्रिगेड राजस्थान