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रविवार, 29 सितंबर 2019

आबू पर्वत पर अग्निकुण्ड से कैसे उत्पन्न हुये थे क्षत्रिय ? प्रतिहार,परमार,सोलंकी,चौहान

आबू पर्वत पर अग्निकुण्ड से कैसे उत्पन्न हुये थे क्षत्रिय ?

आबू पर्वत में क्षत्रियों की उत्पत्ति के बारे में अक्सर सुनने पढने को मिलता है कि क्षत्रिय राजस्थान में आबू पर्वत पर आयोजित यज्ञ से उत्पन्न हुये है पर क्या यज्ञ के अग्निकुण्ड से मानव की उत्पत्ति संभव है ? यदि नहीं तो फिर यह कहानी व मान्यता कैसे प्रचलित हुई ? क्षत्रियों की अग्निकुंड से उत्पत्ति के पीछे प्रचलित इस कहानी के पीछे कुछ तो ऐसा होगा जिसकी वजह से यह कहानी प्रचलित हुई और अग्निवंश और अग्निकुंड से क्षत्रियों की उत्पत्ति को मिथ बताने वाले इतिहासकारों व विद्वानों ने भी क्षत्रियों को अग्नि द्वारा शुद्ध करने की बात को मान्यता देते हुए अपनी बात को अपरोक्ष रूप से काट कर इस प्रचलित कहानी को मान्यता दे डाली है|

इतिहासकार और विद्वान ओझा, वैद्य और गांगोली के अलावा सभी विद्वानों ने अग्निवंश की मान्यता को प्रत्यक्ष नहीं तो परोक्ष रूप से स्वीकार किया है| इसी कहानी पर राजस्थान के इतिहासकार श्री देवीसिंह जी मंडावा लिखते है कि – “जब वैदिक धर्म ब्राह्मणों के नियंत्रण में आ गया था और बुद्ध ने इसके विरुद्ध बगावत कर अपना नया बौद्ध धर्म चलाया तो शनै: शनै: क्षत्रिय वर्ग वैदिक धर्म त्यागकर बौद्ध धर्मी बन गया| क्षत्रियों के साथ साथ वैश्यों ने भी बौद्ध धर्म अंगीकार कर लिया|

क्षत्रियों के बौद्ध धर्म ग्रहण करने के पश्चात उनकी वैदिक परम्परायें भी नष्ट हो गई और वैदिक क्षत्रिय जो कि सूर्य व चंद्रवंशी कहलाते थे, उन परम्पराओं के सम्राट हो गये तथा सूर्य व चन्द्रवंशी कहलाने से वंचित हो गये| क्योंकि ये मान्यतायें और परम्परायें तो वैदिक धर्म की थी जिन्हें वे परित्याग कर चुके थे| यही कारण है कि ब्राह्मणों ने पुराणों तक में यह लिख दिया कलियुग में ब्राह्मण व शुद्र ही रह जायेंगे व कलियुग के राजा शुद्र होंगे, बौद्ध के अत्याचारों से पीड़ित होकर ब्राह्मणों ने बुद्ध धर्मावलम्बी क्षत्रिय शासकों को भी शुद्र की संज्ञा दे डाली| दुराग्रह से ग्रसित हो उन्होंने यह भी लिख दिया कि कलियुग में वैश्य और क्षत्रिय दोनों लोप हो जायेंगे|

उस काल में समाज की रक्षा करना व शासन चलाना क्षत्रियों का उतरदायित्व था, चूँकि वे बौद्ध हो गये थे अत: वैदिक धर्म की रक्षा का जटिल प्रश्न ब्राह्मणों के सामने उपस्थित हो गया| इस पर ब्राह्मणों के मुखिया ऋषियों ने अपने अथक प्रयासों से चार क्षत्रिय कुलों को वापस वैदिक धर्म में दीक्षित करने में सफलता प्राप्त कर ली| आबू पर्वत पर यज्ञ करके बौद्ध धर्म से वैदिक धर्म में उनका समावेश किया गया| यही अग्निकुंड का स्वरूप है| वे प्राचीन सूर्यवंशी व चन्द्रवंशी ही थे इसलिए बाद में शिलालेखों में भी तीन वंश अपने प्राचीन वंश का हवाला देते रहे लेकिन परमारवंश ने प्राचीन वंश न लिखकर अपने आपको अग्निवंश लिखना शुरू कर दिया|

कुमारिल भट्ट ई.७०० वि. ७५७ ने बड़ी संख्या में बौद्धों को वापस वैदिक धर्म में लाने का कार्य शुरू किया जिसे आगे चलकर आदि शंकराचार्य ने पूर्ण किया| अत: इन चार क्षत्रिय वंशों को वैदिक धर्म में वापस दीक्षा दिलाने का कार्य उसी युग में होना चाहिए| आबू के यज्ञ में दीक्षा का एक ऐतिहासिक कार्यक्रम था जो ६ठी या ७वीं सदी में हुआ है| यह कोई कपोल कल्पना या मिथ नहीं था बल्कि वैदिक धर्म को वापस सशक्त बनाने का प्रथम कदम था जिसकी स्मृति में बाद में ये वंश अपने आपको अग्निकुंड से उत्पन्न अग्निवंशी कहने लग गये| आज भी आबू पर यह यज्ञ स्थल मौजूद है|”

मुग़ल इतिहासकार अबुलफजल ने भी “आईने अकबरी” में इसी मान्यता का उल्लेख किया है| उसने यज्ञ का समय वि. ८१८ दिया है| वंश भास्कर में भी बौद्धों के उत्पात मचाने से उनका दमन करने हेतु अग्निकुल वालों को उत्पन्न किया जाना माना गया है| अबुलफजल के समय किन्हीं प्राचीन ग्रंथों अथवा मान्यताओं से विदित होता है कि ये चारों (प्रतिहार, सोलंकी, परमार और चौहान) वंश बौद्ध धर्म का परित्याग कर वापस अपने पूर्व वैदिक धर्म में लौट आये थे|

चूँकि बौद्ध धर्म अपना चुके क्षत्रियों का वापस धर्म परिवर्तन करने व वैदिक धर्म में दीक्षित करने हेतु यज्ञ कर शुद्धिकरण करने को क्षत्रियों को यज्ञ के अग्निकुंड से उत्पन्न माना जाने की मान्यता प्रचलित हो गयी और धीरे धीरे कहानियां बन गई कि – क्षत्रिय आबू पर्वत पर अग्निकुंड से पैदा हुए थे| जबकि इसी धरा पर मौजूद बौद्ध धर्म में दीक्षित चार क्षत्रिय वंश (प्रतिहार, सोलंकी, परमार और चौहान) यज्ञ के अग्निकुंड के पास बैठ वापस वैदिक धर्म में दीक्षित हुये|

जय मिहिरभोज।।
जय राजपूताना।।

गुरुवार, 12 सितंबर 2019

लक्ष्मणवंशी प्रतिहारों का शिलालेख **अग्निवंश

** लक्ष्मणवंशी प्रतिहारों का शिलालेख **अग्निवंश

मित्रों यह वो शिलालेख है जिसमे राजा मिहिरभोज प्रतिहार , राजा वत्सराज प्रतिहार, राजा बाउक प्रतिहार एवं राजा ककुक्क प्रतिहार को इच्छवाकु कुल का एवं सुमित्रा नंदन लक्ष्मण जी का वंशज बताया है। प्रतिहार इच्छवाकु कुल के सूर्यवंशी क्षत्रिय है और यह प्रमाणित है।।

कुछ विदेशी हठधर्मी है जो इन्हें बदनाम करने की साजिस कर रहे है। प्रतिहार क्षत्रियों ने अपने को कही भी और कभी भी गुर्जर मूल का नही माना है। यह केवल प्रतिहारो के दुश्मनों की सोची समझी चाल थी बदनाम करने की अगर कही भी लिखा मिला है

उसकी वजह है कि वह गुर्जरात्रा प्रदेष पर शासन किया और वहां के राजाओं को गुर्जराज और गुर्जरेश्वर की उपाधि मिली जैसे महाराष्ट्र में रहना वाला हर व्यक्ति मराठा नही है , बंगाल में रहने वाले हर व्यक्ति बंगाली नही होते। वैसे ही गुर्जरात्रा प्रदेष पर अनेक क्षत्रियों ने शासन किया जिसमे चावडा, सोलंकी, राठौड़,परमार, गोहिल, प्रतिहार तो क्या ये गुर्जर मूल के थे।सभी क्षत्रिय अलग अलग वंश के थे जिसमे प्रतिहार लक्ष्मणवंशी  अर्थात सूर्यवंशी क्षत्रिय थे।।

जिसको अब भी समझ नही आ रहा हो की प्रतिहार गुर्जर मूल के है वह उज्जैन सिंहस्थ  जाकर डूब कर मर जाये। मनुस्मृति में प्रतिहार ,परिहार एक ही शब्द है जिनका अर्थ होता है "रक्षक"  प्रतिहार के ही पर्यायवाची है परिहार, पडिहार है। चूतिये थोडा और पढ लेता तो सत्य का ज्ञान हो जाता तुझे और तेरे गाडर समाज को

मिहिरभोज प्रतिहार को भगवान मानने वालो उनकी जयंती मनाओ पर गुर्जर बताकर नही सच्चाई बताकर और वह तुम लोग करोगे नहीं क्योंकि तुम लोगो ने अपने समाज को इतना गुमराह कर दिया है। जिससे वह मिहिरभोज को तो जानते है पर उनके इतिहास और उनके वर्तमान वंशज नागौद राज्य के प्रतिहार राजपूतों को नही जानते हैं।

नागौद रियासत की नींव सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार के वंशज महाराजाधिराज वीरराजदेव प्रतिहार ने डाली थी। कन्नौज पर 1036 ईस्वीं  में मोहम्मद गजनवी ने आक्रमण किया था उस समय यहां पर प्रतिहार नरेश त्रिलोचनपाल शासन कर रहे थे। गजनवी की लाखो सेना और प्रतिहार राजपूतों की हजारो सेना का मुकाबला हुआ जिसमे हावी रहे जिससे प्रतिहारों को कन्नौज छोड़ना पडा।।

कन्नौज को छोडने के बाद प्रतिहार दल बुंदेलखण्ड की ओर पलायन कर गये कुछ वर्ष पश्चात यहां की व्यारमा नदी पर शिव का मंदिर बनवाया और एक नये राज्य की स्थापना की जिसका नाम वरमै राज्य रखा। यहीं की एक ज्येष्ठ शाखा में वीरराजदेव प्रतिहार पुत्र विशालदेव प्रतिहार हुए जो बहुत ही पराक्रमी शासक थे। उनहोंने स्वयं का राज्य स्थापित करने की ठानी और चुने हुए साथियों के साथ निकल पडे।

सिंगोरगढ़ जो जबलपुर के पास है यह प्रतिहारों का छोटा सा राज्य था जहां के प्रतिहार राजा कोतपाल देव ने वीरराजदेव की बुद्धिमता वीरता और पराक्रम को देखकर अपनी सेना में सेनापति का पद दिया। कोतपाल वृद्ध थे और निःसंतान थे। लिहाजा उनहोंने अपने राज्य का उत्तराधिकारी वीरराजदेव प्रतिहार को घोषित कर दिया।।

लगभग दस वर्ष के शासनकाल में वीरराजदेव प्रतिहार ने यहां के किले के परकोटे को और मजबूत किया कई गढिया , बावली का भी निर्माण किया। उस समय देश मे तुगलक वंश बहुत ही हावी था मोहम्मद तुगलक की नजर सिंगोरगढ़ पर पढी और उसने यहां अचानक हमला कर दिया। अचानक हमले से प्रतिहार लोग संभल नही पाये और यह सिंगोरगढ़ राज्य छोडना पडा।

वीरराजदेव प्रतिहार और उनका प्रतिहार दल  सिंगोरगढ़ को छोड कैमोर की पहाडी होते हुए उच्चकल्प (उचेहरा) आये यहीं एक गढी मे तेली लोग डेरा डाले हुए थे और प्रजा के साथ लूटपाट कर उनहें आतंकित कर रखा था। वीरराजदेव प्रतिहार को यह जानकारी मिलते ही उनहोंने तेली लोगो पर हमला कर दिया।

तेली लोग अचानक हमले से कुछ समझ नही पाये और कुछ मारे गये और कुछ भाग गये।
प्रतिहार दल को गढी में काफी धन संपदा मिली जिससे यही पर रुककर राज्य स्थापित करने का निर्णय कर स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। कई वर्षों तक प्रतिहार राजपूतों की मुख्य राजधानी उंचेहरा थी राज्य का विस्तार हो रहा था तो मध्य मे एक ओर किले की जरुरत महसूस हुई

नागबध जो आज नागौद के नाम से जाना जाता है। उचेहरा से 40 किलोमीटर दूर है उचेहरा के महाराज चैन सिंह ने 1720 ईस्वीं में अमरन नदी के तट पर एक भव्य किले की नीव रखकर प्रतिहारो की राजधानी उचेहरा से उठाकर नागौद ले आये और राज्य की शासन व्यवस्था यही से देखी जाने लगी।। नागौद की राजगद्दी बरमै गद्दी के नाम से ही जानी जाती है।।


नागौद के प्रतिहारों के पूर्वज कन्नौज से थे तो उसी वजह से यहां के लोग इनहे कन्नौजिया प्रतिहार भी कहते है। नागौद रियासत भारत में प्रतिहार राजपूतों की सबसे बडी रियासत है। यहां अन्य जगहों से ज्यादा प्रतिहार लोग निवास करते है आज भी नागौद राज्य से बंटवारो से उचेहरा, सतना, रीवा, शहडोल, उमरिया,  मैहर, अमरपाटन, रामपुर बाघेलान मे निकलकर लगभग 200 गांवो मे लगभग 20 हजार प्रतिहार राजपूत लोग निवास करते है।

नागौद राज्य प्रतिहार राजपूतों की शान का प्रतीक है यहां से कई प्रतिहार प्रतिभाये देश विदेश जाकर अपना और समाज का नाम किया है। यहीं नागौद राजपरिवार के पूर्व स्वर्गीय महाराजा महेन्द्र सिंह जी के पुत्र महाराज कुमार नागेन्द्र सिंह जी जो पूर्व मंत्री (P.W.D.) एवं वर्तमान खजुराहो (म.प्र.) लोकसभा से सांसद है और खजुराहो लोकसभा से दो लाख पचास हजार वोटों से अपने प्रतिदंद्वी को हराया था। नागेन्द्र सिंह जी प्रतिहार ही नही समस्त क्षत्रिय समाज के गौरव है। नमन है ऐसे राजनीतिक योद्धा को जिसने बेदाग छवि के साथ सर्वसमाज के हित के लिए कार्य किये और करते आ रहे है।

लक्ष्मणवंशी प्रतिहार।।
सूर्यवंशी क्षत्रिय।।
इच्छवाकु कुल।।
जय क्षात्र धर्म।।

रविवार, 18 अगस्त 2019





जोधपुर बसने से 340 साल पूर्व बना वैद्यनाथ महादेव मंदिर

शहर से करीब 20 कि.मी. दुर स्थित भोगिशैल पहाड़ियों में स्थित वैद्यनाथ महादेव मंदिर जोधपुर की स्थापना से 340 साल पूर्व का है। तत्कालीन मारवाड़ की राजधानी मंडोर में सरदार नाहरसिंह पड़िहार का शासन था। कहा जाता है कि नाहड़ राव प्रतिहार परम शिव भक्त थे। एक बार उनके पुत्र की तबीयत बहुत खराब हो गई। राज चिकित्सक भी प्रवास पर थे। चिंतित मुद्रा में बैठ  नाहरसिंह पड़िहार के पास उस समय एक सैनिक घुड़सवार सूचना लाया की पहाड़ी पर पेड़ के नीचे कोई बुजुर्ग वैद्य विराजे है। सरदार नाहरसिंह वैद्य जी को बुलाने में समय व्यर्थ गंवाने की बजाए । अपने पुत्र को रथ में बैठाकर वैध के पास निकाल पड़े ओर उपचार शुरू करवाया। कुछ ही देर में नाहरसिंह  के पुत्र को आराम  मिला उन्होंने वैध राज को प्रणाम कर अपने साथ मंडोर चलने को कहा। लेकिन वह अन्तर्ध्यान हो गए। नाहरसिंह की समझ में आ गया कि साक्षात महादेव वैधराज बनकर प्रकट हुए थे। इसके बाद नाहरसिंह ने उसी जगह विक्रम संवत 1176 में भाद्र मास की पूर्णिमा के दिन मंदिर प्रतिष्ठित  किया था।
#Pratiharas #parihar Ruler of Mandore
#pratihara #Rajput
@rajastha_ patrika
श्री गाजण माता यूथ ब्रिगेड राजस्थान

रविवार, 11 अगस्त 2019

History of tikuri Thikana Pratihar Dyansty



Tikuri - Thikana
Dynasty - Parihar
Clan- Aganiwanshi
Subclan - Jignahat Vanshi
State - Nagod State
Villages  12

 PRESENT HEAD
Shri Thakur Lal Sahab Maharaj Kumar Balvendra Pratap Singh Parihar Ji, present Thakur Sahab of Thikana Tikuri, born on 9th Oct 1993, completed his schooling from KPS Amarkantak College, Indore.

 HISTORY
The Thikana was originally named was Tikorgarh but is now know as Tikuri after the name of village where the seat of family is situated .The ancestor of family was Shri Thakur Lal Sahab Maharaj Kumar Ranjit Singh Judev Bahadur who was the great grand son of Raja Fakir Shah, Raja of Nagod and grand son of Maharaj Kumar Narhar Shah and son of Shri Thakur Lal Sahab Jagrup Singh, Thakur of Jignahat who distributed the estate of Tikuri.

 GENEALOGY
Shri Thakur Lal Sahab Maharaj Kumar Ranjit Pratap Singh Parihar Ji, founder of Thikana Tikuri which was granted by Thakur Sahab Jagrup Singh ji of Jignahat Estate, married and had issue.

Kunwar Ramdayal Singh Ji (qv)

Shri Thakur Lal Sahab Maharaj Kumar Ramdayal Pratap Singh Parihar Ji, was granted one more thikana of Saliya from Thakur Indrajeet Singh ji Sahab as an adopted son, married and had issues.

Kunwar Jagmochan Singh Ji (qv)

Kunwar Davi Singh Ji

Kunwar Hryaday Singh Ji

Kunwar Shabha Singh Ji

Kunwar Raghunandan Singh Ji

Kunwar Dhanushdhari Singh Ji

Kunwar Randaman Singh Ji

Shri Thakur Lal Sahab Maharaj Kumar Jagmochan Pratap Singh Parihar Ji, fought in the battles of Jignahat 1, 2 and 3; married a daughter of Jamindar Sahab of Kuchi in Rewa State and had issues.

Kunwar Vanshgopal Singh Ji (qv)

Kunwar Rampyaray Singh Ji

Kunwar Anuj Singh Ji

Shri Thakur Lal Sahab Maharaj Kumar Vanshgopal Pratap Singh Parihar Ji, fought in the battles of Jignahat 1, 2 and 3; married a daughter of Jagirdar Sahab of Sarse in Rewa State and had issues.

Kunwar Jagjeet Pratap Singh Ji (qv)

Baisa Kagat Kumari Ji, married to the Jamindar Thakur Sahab of Shamarpakhar in Rewa State.

Shri Thakur Lal Sahab Maharaj Kumar Jagjeet Pratap Singh Ji, completed his study with Maharao Raghubir Singh ji Sahab of Bundi in Bundi fort, afterwards went to Mayo Collage, Ajmer, later he was appointed as a Commander in Chief of Nagod State army, after India's independence in 1947 he became a CI in Indian Police Services, died in 1994, married Thakurain Bittan Baisa, a daughter of Jagirdar Sahab Thakur Jagaswar Singh ji of Garhi Baraoli in Rewa State and had issues.

Kunwar Ramraghav Singh Ji (qv)

Kunwar Bhagwant Singh Ji, married a daughter of Bhudraj Singh Jamindar Thakur Sahab of Kusmaha in Rewa State.

Kunwar Getandra Singh ji, married to Baisa Arun Kumari ji, daughter of Sampat Singh, Jamindar of Jamuna.

Kunwar Abhijeet Singh Ji

Kunwar Pushpraj Singh, married to Baisa Sandhya Kumari ji, daughter of Jamindar of Ghinaochi.

Kunwar Yashu Singh ji

Baisa Lalai Kumari Ji, married to Thakur Shiv Pratap Singh Ji, Jamindar of Jarauha in Rewa State.

Baisa Shushila Kumari Ji, married to Thakur Birash Singh Ji, Jagirdar of Papodh in Rewa State.

Baisa Lila Kumari Ji, married to Thakur Raghunandan Singh Ji, Jamindar of Ghatbelba in Rewa State.

Shri Thakur Lal Sahab Maharaj Kumar Ramraghawa Pratap Singh Ji, completed his study in Nagod State and became a Doctor from Ayurwadya Ratna, married to Thakurain Raghunathu Kumari Ji, daughter of Jagaswar Singh ji, Jamindar of Bhad in Rewah state and had issues.

Kunwar Mahendra Pratap Singh Parihar Ji(qv)

Kunwar Davendra Pratap Singh Ji, married to Baisa Sarla Kumari, daughter of Anand Singh, Jamindar of Dadhiya Padkhuri and had issues.

Kunwar Atal Singh Ji, married to Baisa Anuradha Kumari ji, daughter of Jamindar of Tetera and has issues.

Baisa Arpana Kumari ji, married to Thakur Satendra Singh, Jamindar of Barha and has issues.

Baisa Annya Kumari ji

Baisa Gudeya Kumari ji

Kunwar Aditya Singh Ji

Kunwar Jagendra Pratap Singh Ji, married to Baisa Nirmala Kumari ji, daughter of Thakur Rambhuwan Singh, Jamindar of Shukulgawan and has issues.

Kunwar Akhand Singh Ji

Kunwar Anirudh Singh Ji

Kunwar Anand Singh Ji

Kunwar Ambrish Singh Ji

Kunwar Brajeendra Pratap Singh Ji, married to Baisa Nilam Kumari ji, daughter of Uma Pratap Singh, Jamindar of Mauhar of Shohawal state and has issues.

Kunwar Amrandra Singh Ji

Kunwar Abi Singh Ji

Kunwar Shaylendra Pratap Singh Ji, married 1stly to Late. Baisa Sadhana Kumari ji, daughter of Thakur Narendra Singh ji, Jamindar of Gadri, married 2ndly to Baisa Monu Kumari, daughter of Jay Singh Ji, Jamindar of Dhankhyar Dewan family of Sohawal state and has issues.

Kunwar Krishnendra Singh Ji (from first wife)

Baisa Krishna Rajay

Baisa Rajnandani Kumari

Kunwar Davraj Singh Ji, married to Baisa Vineta Kumari ji, daughter of Thakur Danendra Singh (TI in Indian Police), Jamindar of Barahana, Kothi state and has issues.

Kunwar Divyaraj Singh Ji

Baisa Divyaarajay Kumari Ji

Baisa Archana Kumari Ji, married to Thakur Lal Raviraj Singh ji Sahab of Nayna Kothi (Jamindar) in Kothi State and has issues.

Baisa Rashmi Kumari ji

Baisa Kabya Kumari ji

Shri Thakur Lal Sahab Maharaj Kumar Mahendra Pratap Singh Parihar Ji, born in 1964, completed his studies from APS University, Rewa; completed B.A., B.Sc., M.A. LLB; married to Thakurain Saheba Shanti Kumari ji, daughter of Jagirdar Gopal Singh ji Sahab, company cammander of 29 Battalion in Dateya of Garhi Baraoli and had issues.

Kunwar Balvendra Pratap Singh Parihar (qv)

Bhawar Lal Mrigendra Pratap Singh Parihar

(A) Baisa Namrata Kumari ji, married to Raja Rana Aditya Pratap Singh ji Sahab of Jagir Garhi Kuwa (Estate) of Rewa State and has issue.

Baisa Shri Kumari

Shri Thakur Lal Sahab Maharaj Kumar Balvendra Pratap Singh Parihar Ji, present Thakur Sahab of Thikana Tikuri

गुरुवार, 8 अगस्त 2019




श्री गाजण माता मंदिर बेलवा में उमड़ा जनसैलाब।
प्रतिहार वंश की कुलदेवी गाजण माता के मेले का दृश्य विधायक राठौड़ द्वारा महिला विश्राम घर की घोषणा की गई। शेरगढ़ विधायक मोहदय का बहुत बहुत आभार🙏🙏🙏🙏

#Gaajanmata #Pratihar #parihar #inda #dewal #Kuldevi #rajput #belwa #Chamunda #Sundhamata #Fair #gajnamatamela #mela #Gajan

शनिवार, 3 अगस्त 2019

चौसठ_योगिनी_मंदिर, #मुरैना (शिवालय) प्रतिहार/परिहार राजपूत



#चौसठ_योगिनी_मंदिर, #मुरैना (शिवालय)
#इसकी_प्रतिकृति_है_संसद_भवन
यह मंदिर कहलाता था तांत्रिक विश्वविद्यालय, होते थे तांत्रिक अनुष्ठान
भारत में चार प्रमुख चौसठ-योगिनी मंदिर हैं। दो ओडिशा में तथा दो मध्य प्रदेश में। लेकिन इन सब में मध्य प्रदेश के मुरैना स्तिथ चौसठ योगिनी मंदिर का विशेष महत्तव है। इस मंदिर को गुजरे ज़माने में तांत्रिक विश्वविद्यालय कहा जाता था। उस दौर में इस मंदिर में तांत्रिक अनुष्ठान करके तांत्रिक सिद्धियाँ हासिल करने के लिए तांत्रिकों का जमवाड़ लगा रहता था। मौजूदा समय में भी यहां कुछ लोग तांत्रिक सिद्धियां हासिल करने के लिए यज्ञ करते हैं।
#चौसठ_योगिनी_मंदिर, #मुरैना
ग्राम पंचायत मितावली, थाना रिठौराकलां, ज़िला मुरैना (मध्य प्रदेश) में यह प्राचीन चौंसठ योगिनी शिव मंदिर है। इसे ‘इकंतेश्वर महादेव मंदिर’ के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर की ऊंचाई भूमि तल से 300 फीट है। इसका निर्माण तत्कालीन प्रतिहार क्षत्रिय राजाओं ने किया था। यह मंदिर गोलाकार है। इसी गोलाई में बने चौंसठ कमरों में हर एक में एक शिवलिंग स्थापित है। इसके मुख्य परिसर में एक विशाल शिव मंदिर है। भारतीय पुरातत्व विभाग के मुताबिक़, इस मंदिर को नवीं सदी में बनवाया गया था। कभी हर कमरे में भगवान शिव के साथ देवी योगिनी की मूर्तियां भी थीं, इसलिए इसे चौंसठ योगिनी शिवमंदिर भी कहा जाता है। देवी की कुछ मूर्तियां चोरी हो चुकी हैं। कुछ मूर्तियां देश के विभिन्न संग्रहालयों में भेजी गई हैं। तक़रीबन 200 सीढ़ियां चढ़ने के बाद यहां पहुंचा जा सकता है। यह सौ से ज़्यादा पत्थर के खंभों पर टिका है। किसी ज़माने में इस मंदिर में तांत्रिक अनुष्ठान किया जाता था।
#एडविन_ने_इसी_तर्ज_पर_बनाया_संसद_भवन
यह स्थान ग्वालियर से करीब 40 कि.मी. दूर है। इस स्थान पर पहुंचने के लिए ग्वालियर से मुरैना रोड पर जाना पड़ेगा। मुरैना से पहले करह बाबा से या फिर मालनपुर रोड से पढ़ावली पहुंचा जा सकता है। पढ़ावली ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। यही वह शिवमंदिर है, जिसको आधार मानकर ब्रिटिश वास्तुविद् सर एडविन लुटियंस ने संसद भवन बनाया।

#चौंसठ_योगिनी_मंदिर_एक_दृष्टि_में-
निर्माण काल : नवीं सदी
स्थान : मितावली, मुरैना (मध्य प्रदेश)
निर्माता : प्रतिहार क्षत्रिय राजा
ख़ासियत : प्राचीन समय में यहां तांत्रिक अनुष्ठान होते थे
आकार : गोलाकार, 101 खंभे कतारबद्ध हैं। यहां 64 कमरे हैं, जहां शिवलिंग स्थापित है।
ऊंचाई : भूमि तल से 300 फीट

मंगलवार, 2 जुलाई 2019

Kshatriya Pratihar Dynasty



By the 10th Century Muslims had overrun entire Persian civilization, taken over half of the erstwhile Roman empire, reached all the way to the borders of France and raiding Rome itself. Meanwhile in India they never managed to penetrate beyond Sindh. Ever wondered why?

The answer lies in the formidable empire of Rajput Pratīhāras dynasty in Northern India who hold the Jihadis at the border of India for more than 300 years while half of the world was overrun by Arabs.

The Pratīhāra empire, which continued in full glory for nearly a century, was the last great empire in Northern India before the Muslim conquest. The great Rajput king of Pratiharas clan saved India from the Arab aggression. Rajput Pratiharas were called the Gurjara Naresh. The word Gurjar used to denote the geographic area consisted of current day southern Rajasthan and northern Gujarat. The Rajput Pratihara dynasty traced their origin to the Bhagavān Lakshmana of the Ramayana of the Ikshvaku dynasty.

The ascendancy of the Pratihara power began with Nagabhatta I. The greatest achievement of Nagabhatta was his victory against the Arabs. Nagabhata I defeated the Arab army under Junaid and Tamin during the Caliphate campaigns in India. Under Nagabhata II, the Rajput Pratiharas became the most powerful dynasty in northern India. He is best known for rebuilding the Somnath Temple in 815 AD. The temple was destroyed by Arab Armies of Junayad in 725 AD. He was succeeded by his son Ramabhadra, who ruled briefly before being succeeded by his son, Mihira Bhoja. He was a great empire builder. He annexed the territories of Gujarat, Madhya Pradesh and Rajasthan after fighting a series of victorious battles. He assumed the title of Adivaraha and built the Teli Mandir at the Gwalior. Under Bhoja and his successor Mahendrapala I, the Pratihara Empire reached its peak of prosperity and power.

During this period, Imperial Pratīhāras took the title of Maharajadhiraja of Āryāvarta (Great King of Kings of India).

Source :- The Age Of Imperial Kanauj by Dr. K. M. Munshi, Page No. 39

शनिवार, 29 जून 2019

Kshatriya smraat Mihirbhoj pratihar || क्षत्रिय राजपूत सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार


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शुक्रवार, 28 जून 2019

पंजाब के परिहार/प्रतिहार राजपूत || pratihar rajput of Punjab

पंजाब के परिहार/प्रतिहार राजपूत





वंश - सूर्यवंशी लक्ष्मणवंशी प्रतिहार / परिहार
गोत्र - कौशल
शाखा - मध परिहार राजपूत

पंजाब में परिहार राजपूतों के दो गाँव हैं। इन गांवों की स्थापना मियां संसार चंद परिहार ने की थी जो वर्तमान हिमाचल प्रदेश में अंब रियासत से आए थे। WWI और WWII मेंइन दोनों गांवों के बहुत से परिहार राजपूत थे।

 इस गांव के प्रसिद्ध सरदार जरनैल सिंह परिहार "जेला डाकू" के नाम से भी प्रसिद्ध थे, जिन्होंने मुख्य रूप से ब्रिटिश भारत में गायों के कसाई को मार डाला था। उनके पोते अब शिरोमणि अकाली दल के सदस्य हैं जिनका नाम जत्थेदार जीवन सिंह परिहार है।

 ब्रिटिश भारत के दौरान इन गांवों से कुछ पुलिस अधिकारी और सफैद पॉश थे। परिहार राजपूतों के इन गाँवों के आसपास के गाँवों में जाटों और गुर्जरों का निवास था, जो उनकी मरौसी का काम करते थे। यह आज तक जालंधर भूमि के रिकॉर्ड में उनके रिवाज-ए-आम और वजीब-यूल-अर्ज़ में पाया जा सकता है। भूमि सुधारों तथा लैंड टू टिलर एक्ट के कारण आसपास के गाँवों का कब्ज़ा इन परिहार राजपूतों के हाथों से जाटों और गुर्जरों तक गिर गया।

स्वतंत्रता के बाद ये परिहार राजपूत अधिकांश भारत और विदेशों के बड़े शहरों में चले गए और अपनी हवेलियों को पीछे छोड़ दिया।

कालरा का परिहार राजपूत वंशावली

मियां संसार चंद परिहार
I
मियां विरदी जी
I
मियां चंद जी
I
मियां पोपल जी
I
मियाँ अमानु जी
I
मियां हलो जी
I
मियां घुघ जी
I
मियां गालब जी
I
मियां साहिब सरूप जी (कालरा किला)
I
मियां महमान जी
I
मियां गोपीचंद जी
I
मियां गंगा जी
I
मियां जसिया जी
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सरदार सुख सिंह
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सरदार बसवा सिंह
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सरदार तोखा सिंह
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सरदार केसर सिंह
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सरदार जीवा सिंह
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सरदार मेहन सिंह
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सरदार उजागर सिंह
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संत जगजीत सिंह जी (वेदांत आचार्य)

मियां एक उपाधि है जिसका उपयोग पहाड़ी राज्यों के राजपूतों द्वारा किया जाता है। अन्य स्थानों में ठाकुर, रजा, राओ का उपयोग अन्यत्र किया जाता है I

ठाकुर देवी सिंह मंडवा ने परिहार / प्रतिहार राजपूतों पर अपनी पुस्तक में लिखा है। उन्होंने अपनी पुस्तक में परिहार राजपूतों की कई शाख या शाखाएँ दी हैं। इंदा, मल्हनजी, कल्हस, ताखी, मध परिहार राजपूत जिनके बीच उल्लेखनीय हैं। पंजाब के परिहार राजपूत मध परिहार शाखा के हैंI नीचे परिहार राजपूतों पर ठाकुर देवी सिंह मंडावा की पुस्तक का एक स्क्रीनशॉट है जिसमें उन्होंने पंजाब के कलरा गाँव के मध परिहार राजपूतों के बारे में बताया हैI

स्रोत -
ठाकुर देवी सिंह मंडIवा - परिहार राजपूत वंश, पृष्ठ संख्या page ९

सुहेल प्रकाश - संत जगजीत सिंह जी, page १६

सोमवार, 17 जून 2019

राजपूत सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार जीवन परिचय


       मिहिरभोज प्रतिहार जीवन परिचय 
                    जीवन परिचय 
                  सनातन धर्म रक्षक
             सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार

(1) सम्राट मिहिरभोज का जन्म विक्रम संवत 873 (816 ईस्वी) को हुआ था। आपको कई नाम से जाना जाता है जैसे भोजराज, भोजदेव , मिहिर , आदिवराह एवं प्रभास।

(2) आपका राज्याभिषेक विक्रम संवत 893 यानी 18 अक्टूबर दिन बुधवार 836 ईस्वी में 20 वर्ष की आयु में हुआ था। और इसी दिन 18 अक्टूबर को ही हर वर्ष भारत में आपकी जयंती मनाई जाती है।

(3) इनके दादा का नाम नागभट्ट द्वितीय था उनका स्वर्गवास विक्रम संवत 890 (833 ईस्वी) भादो मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को हुआ। इनके पिता का नाम रामभद्र और माता का नाम अप्पादेवी था। माता पिता ने सूर्य की उपासना की थी जिसके फलस्वरूप उन्हें मिहिरभोज के रुप मे पुत्र की प्राप्ति हुई थी।

(4) सम्राट मिहिरभोज की पत्नी का नाम चंद्रभट्टारिका देवी था। जो भाटी राजपूत वंश की थी। इनके पुत्र का नाम महेन्द्रपाल प्रतिहार था जो सम्राट मिहिरभोज के स्वर्गवास उपरांत कन्नौज की गद्दी पर बैठे।

(5) विक्रम संवत 945 (888 ईस्वी) 72 वर्ष की आयु में सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार का स्वर्गवास हुआ।

   -------- > साम्राज्य < --------

(1) सम्राट मिहिरभोज के साम्राज्य का विस्तार आज के मुल्तान से पश्चिम बंगाल और कश्मीर से उत्तर महाराष्ट्र तक था।

(2) सम्राट मिहिरभोज गुणी बलवान , न्यायप्रिय , सनातन धर्म रक्षक , प्रजा हितैषी एवं राष्ट्र रक्षक थे।

(3) सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार शिव शक्ति के उपासक थे। और उन्होंने मलेच्छों (अरब, मुगल, कुषाण, हूण) से पृथ्वी की रक्षा की थी। उन्हें वराह यानी भगवान विष्णु का अवतार भी बताया गया है। उनके द्वारा चलाये गये सिक्कों पर वराह की आकृति बनी हुई है।

(4) अरब यात्री सुलेमान ने अपनी पुस्तक सिलसिला - उत - तारिका 851 ईस्वी में लिखी। वह लिखता है की सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार (परिहार) के पास उंटो, घोडों व हाथियों की बडी विशाल एवं सर्वश्रेष्ठ सेना है। उनके राज्य में व्यापार सोने व चांदी के सिक्कों से होता है। उनके राज्य में सोने व चांदी की खाने भी है। इनके राज्य में चोरों डाकुओं का भय नही है। भारत वर्ष में मिहिरभोज प्रतिहार से बडा इस्लाम का अन्य कोई शत्रु नहीं है। मिहिरभोज के राज्य की सीमाएं दक्षिण के राष्ट्रकूटों के राज्य , पूर्व में बंगाल के शासक पालवंश और पश्चिम में मुल्तान के मुस्लिम शासकों से मिली हुई है।

  ------> मिहिरभोज की सेना < -------

(1) सम्राट मिहिरभोज के पूर्वज नागभट्ट प्रथम (730 - 760 ईस्वी) ने स्थाई सेना संगठित कर उसको नगद वेतन देने की जो प्रथा जो सर्व प्रथम चलाई , वो मिहिरभोज के समय और पक्की होई गई थी।

(2) विक्रम संवत 972 (915 ईस्वी) में भारत भ्रमण आये बगदाद के इतिहासकार अलमसूदी ने अपनी किताब मिराजुल - जहाब में इस महाशक्तिशाली , महापराक्रमी सेना का विवरण किया है। उसने इस सेना की संख्या लाखों में बताई है। जो चारो दिशाओं में लाखो की संख्या में रहती है।

(3) प्रसिद्ध इतिहासकार के. एम. मुंशी ने सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार की तुलना गुप्तवंशीय सम्राट समुद्रगुप्त और मौर्यवंशीय सम्राट चंद्रगुप्त से इस प्रकार की है। वे लिखते हैं कि सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार इन सभी से बहुत महान थे। क्योंकि तत्कालीन भारतीय धर्म एवं संस्कृति के लिए जो चुनौती अरब के इस्लामिक विजेताओं की फौजों द्वारा प्रस्तुत की गई। वह समुद्रगुप्त , चंद्रगुप्त आदि के समय पेश नही हुई थी और न ही उनका मुकाबला अरबों जैसे अत्यंत प्रबल शत्रुओं से हुआ था।

(4) भारत के इतिहास में मिहिरभोज से बडा आज तक कोई भी सनातन धर्म रक्षक एवं राष्ट्र रक्षक नही हुआ।

एक ऐसा हिंदू क्षत्रिय योद्धा , अरबों का सबसे बडा दुश्मन जिसने लगभग 40 युद्घ कर अरबों को भारत से पलायन करने पर मजबूर कर दिया एवं सनातन धर्म की रक्षा की, ऐसे थे महान चक्रवर्ती सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार जिसने भारत पर 50 वर्ष शासन किया। 

=====  वृहद इतिहास =====

एक ऐसा राजा जिसने अरब तुर्क आक्रमणकारियों को भागने पर विवश कर दिया और जिसके युग में भारत सोने की चिड़िया कहलाया। मित्रों परिहार क्षत्रिय  वंश के नवमीं शताब्दी में सम्राट मिहिरभोज भारत का सबसे महान शासक था। उसका साम्राज्य आकार, व्यवस्था , प्रशासन और नागरिको की धार्मिक स्वतंत्रता के लिए चक्रवर्ती गुप्त सम्राटो के समकक्ष सर्वोत्कृष्ट था।

भारतीय संस्कृति के शत्रु म्लेछो यानि मुस्लिम तुर्को -अरबो को पराजित ही नहीं किया अपितु उन्हें इतना भयाक्रांत कर दिया था की वे आगे आने वाली एक शताब्दी तक भारत की और आँख उठाकर देखने का भी साहस नहीं कर सके।

चुम्बकीय व्यक्तित्व संपन्न सम्राट मिहिर भोज की बड़ी बड़ी भुजाये एवं विशाल नेत्र लोगों में सहज ही प्रभाव एवं आकर्षण पैदा करते थे। वह महान धार्मिक , प्रबल पराक्रमी , प्रतापी , राजनीति निपुण , महान कूटनीतिज्ञ , उच्च संगठक सुयोग्य प्रशासक , लोककल्याणरंजक तथा भारतीय संस्कृति का निष्ठावान शासक था।

ऐसा राजा जिसका साम्राज्य संसार में सबसे शक्तिशाली था। इनके साम्राज्य में चोर डाकुओ का कोई भय नहीं था। सुदृढ़ व्यवस्था व आर्थिक सम्पन्नता इतनी थी कि विदेशियो ने भारत को सोने की चिड़िया कहा।

यह जानकर अफ़सोस होता है की ऐसे अतुलित शक्ति , शौर्य एवं समानता के धनी मिहिरभोज को भारतीय इतिहास की किताबो में स्थान नहीं मिला।
सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार के शासनकाल में सर्वाधिक अरबी मुस्लिम लेखक भारत भ्रमण के लिए आये और लौटकर उन्होंने भारतीय संस्कृति सभ्यता आध्यात्मिक-दार्शनिक ज्ञान विज्ञानं , आयुर्वेद , सहिष्णु , सार्वभौमिक समरस जीवन दर्शन को अरब जगत सहित यूनान और यूरोप तक प्रचारित किया।

क्या आप जानते हे की सम्राट मिहिरभोज ऐसा शासक था जिसने आधे से अधिक विश्व को अपनी तलवार के जोर पर अधिकृत कर लेने वाले ऐसे अरब तुर्क मुस्लिम आक्रमणकारियों को भारत की धरती पर पाँव नहीं रखने दिया , उनके सम्मुख सुदृढ़ दीवार बनकर खड़े हो गए। उसकी शक्ति और प्रतिरोध से इतने भयाक्रांत हो गए की उन्हें छिपाने के लिए जगह ढूंढना कठिन हो गया था। ऐसा किसी भारतीय लेखक ने नहीं बल्कि मुस्लिम इतिहासकारो बिलादुरी सलमान एवं अलमसूदी ने लिखा है। ऐसे महान सम्राट मिहिरभोज ने 836 ई से 885 ई तक लगभग 50 वर्षो के सुदीर्घ काल तक शासन किया। 

सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार जी का जन्म सूर्यवंशी क्षत्रिय कुल में रामभद्र प्रतिहार की महारानी अप्पा देवी के द्वारा सूर्यदेव की उपासना के प्रतिफल के रूप में हुआ माना जाता है। मिहिरभोज के बारे में इतिहास की पुस्तकों के अलावा बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। इनके शासन काल की हमे जानकारी वराह ताम्रशासन पत्र से मालूम पडती है जिसकी तिथि (कार्तिक सुदि 5, वि.सं. 893 बुधवार) 18 अक्टूबर 836 ईस्वी है। इसी दिन इनका राजतिलक हुआ था।

मिहिरभोज के साम्राज्य का विस्तार आज के मुलतान से पश्चिम बंगाल तक ओर कश्मीर से कर्नाटक तक था। सम्राट मिहिरभोज बलवान, न्यायप्रिय और धर्म रक्षक थे। मिहिरभोज शिव शक्ति एवं भगवती के उपासक थे। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में भगवान शिव के प्रभास क्षेत्र में स्थित शिवालयों व पीठों का उल्लेख है।

प्रतिहार साम्राज्य के काल में सोमनाथ को भारतवर्ष के प्रमुख तीर्थ स्थानों में माना जाता था। प्रभास क्षेत्र की प्रतिष्ठा काशी विश्वनाथ के समान थी। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में सम्राट मिहिर भोज के जीवन के बारे में विवरण मिलता है। मिहिर भोज के संबंध में कहा जाता है कि वे सोमनाथ के परम भक्त थे उनका विवाह भी सौराष्ट्र में ही हुआ था उन्होंने मलेच्छों से पृथ्वी की रक्षा की।

50 वर्ष तक राज्य करने के पश्चात वे अपने बेटे महेंद्रपाल प्रतिहार को राज सिंहासन सौंपकर सन्यासवृति के लिए वन में चले गए थे। सम्राट मिहिरभोज का सिक्का जो की मुद्रा थी उसको सम्राट मिहिर भोज ने 836 ईस्वीं में कन्नौज को देश की राजधानी बनाने पर चलाया था। सम्राट मिहिरभोज महान के सिक्के पर वाराह भगवान जिन्हें कि भगवान विष्णु के अवतार के तौर पर जाना जाता है। वाराह भगवान ने हिरण्याक्ष राक्षस को मारकर पृथ्वी को पाताल से निकालकर उसकी रक्षा की थी।

सम्राट मिहिरभोज का नाम आदिवाराह भी है। जिस प्रकार वाराह (विष्णु) भगवान ने पृथ्वी की रक्षा की थी और हिरण्याक्ष का वध किया था ठीक उसी प्रकार मिहिरभोज मलेच्छों(अरबों, हूणों, कुषाणों)को मारकर अपनी मातृभूमि की रक्षा की एवं सनातन धर्म के रक्षक बने।

सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार की जयंती हर वर्ष 18 अक्टूबर को मनाई जाती है जिन स्थानों पर परिहारों, पडिहारों, इंदा, राघव, लूलावत, देवल, रामावत,मडाडो अन्य शाखाओं को सम्राट मिहिरभोज के जन्मदिवस का पता है वे इस जयंती को बड़े धूमधाम से मनाते हैं। जिन भाईयों को इसकी जानकारी नहीं है आप उन लोगों के इसकी जानकारी दें और सम्राट मिहिरभोज का जन्मदिन बड़े धूमधाम से मनाने की प्रथा चालू करें।

अरब यात्रियों ने किया सम्राट मिहिरभोज का यशोगान अरब यात्री सुलेमान ने अपनी पुस्तक सिलसिलीउत तुआरीख 851 ईस्वीं में लिखी जब वह भारत भ्रमण पर आया था। सुलेमान सम्राट मिहिर भोज के बारे में लिखता है कि प्रतिहार सम्राट की बड़ी भारी सेना है। उसके समान किसी राजा के पास उतनी बड़ी सेना नहीं है। सुलेमान ने यह भी लिखा है कि भारत में सम्राट मिहिर भोज से बड़ा इस्लाम का कोई शत्रु नहीं है। मिहिर भोज के पास ऊंटों, हाथियों और घुडसवारों की सर्वश्रेष्ठ सेना है। इसके राज्य में व्यापार, सोना चांदी के सिक्कों से होता है। यह भी कहा जाता है कि उसके राज्य में सोने और चांदी की खाने भी हैं।यह राज्य भारतवर्ष का सबसे सुरक्षित क्षेत्र है। इसमें डाकू और चोरों का भय नहीं है।

मिहिर भोज राज्य की सीमाएं दक्षिण में राष्ट्रकूटों के राज्य, पूर्व में बंगाल के पाल शासक और पश्चिम में मुलतान के शासकों की सीमाओं को छूती है। शत्रु उनकी क्रोध अग्नि में आने के उपरांत ठहर नहीं पाते थे। धर्मात्मा, साहित्यकार व विद्वान उनकी सभा में सम्मान पाते थे। उनके दरबार में राजशेखर कवि ने कई प्रसिद्ध ग्रंथों की रचना की।

कश्मीर के राज्य कवि कल्हण ने अपनी पुस्तक राज तरंगणी में सम्राट मिहिरभोज का उल्लेख किया है। उनका विशाल साम्राज्य बहुत से राज्य मंडलों आदि में विभक्त था। उन पर अंकुश रखने के लिए दंडनायक स्वयं सम्राट द्वारा नियुक्त किए जाते थे। योग्य सामंतों के सुशासन के कारण समस्त साम्राज्य में पूर्ण शांति व्याप्त थी। सामंतों पर सम्राट का दंडनायकों द्वारा पूर्ण नियंत्रण था।

किसी की आज्ञा का उल्लंघन करने व सिर उठाने की हिम्मत नहीं होती थी। उनके पूर्वज सम्राट नागभट्ट प्रतिहार ने स्थाई सेना संगठित कर उसको नगद वेतन देने की जो प्रथा चलाई वह इस समय में और भी पक्की हो गई और प्रतिहार राजपूत साम्राज्य की महान सेना खड़ी हो गई। यह भारतीय इतिहास का पहला उदाहरण है, जब किसी सेना को नगद वेतन दिया जाता था।।

* आइये जानते है हिन्दू क्षत्रिय शौर्य और बहादुरी से जुड़े सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार" के रोचक पहलू *

== काव्यों एवं इतिहास मे इन विशेषणो से वर्णित किया ====

क्षत्रिय सम्राट,भोजदेव, भोजराज, वाराहवतार, परमभट्टारक, महाराजाधिराज, परमेश्वर, महानतम भोज, मिहिर महान।

==== शासनकाल ====

सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार ने 18 अक्टूबर 836 ईस्वीं से 885 ईस्वीं तक 50 साल तक राज किया। मिहिर भोज के साम्राज्य का विस्तार आज के मुलतान से पश्चिम बंगाल तक और कश्मीर से कर्नाटक तक था।

==== साम्राज्य ====

परिहार वंश ने अरबों से 300 वर्ष तक लगभग 200 से ज्यादा युद्ध किये जिसका परिणाम है कि हम आज यहां सुरक्षित है। प्रतिहारों ने अपने वीरता, शौर्य , कला का प्रदर्शन कर सभी को आश्चर्यचकित किया है। भारत देश हमेशा ही प्रतिहारो का रिणी रहेगा उनके अदभुत शौर्य और पराक्रम का जो उनहोंने अपनी मातृभूमि के लिए न्यौछावर किया है। जिसे सभी विद्वानों ने भी माना है। प्रतिहार साम्राज्य ने दस्युओं, डकैतों, अरबों, हूणों, से देश को बचाए रखा और देश की स्वतंत्रता पर आँच नहीं आई।

इनका राजशाही निशान वराह है। ठीक उसी समय मुश्लिम धर्म का जन्म हुआ और इनके प्रतिरोध के कारण ही उन्हे हिंदुश्तान मे अपना राज कायम करने मे 300 साल लग गए। और इनके राजशाही निशान " वराह " विष्णु का अवतार माना है प्रतिहार मुश्लमानो के कट्टर शत्रु थे । इसलिए वो इनके राजशाही निशान 'बराह' से आजतक नफरत करते है।

==== शासन व्यवस्था==

सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार वीरता, शौर्य और पराक्रम के प्रतीक हैं। उन्होंने विदेशी साम्राज्यो के खिलाफ लड़ाई लड़ी और अपनी पूरी जिन्दगी अपनी मलेच्छो से पृथ्वी की रक्षा करने मे बिता दी। सम्राट मिहिरभोज बलवान, न्यायप्रिय और धर्म रक्षक सम्राट थे। सिंहासन पर बैठते ही मिहिरभोज ने सर्वप्रथम कन्नौज राज्य की व्यवस्था को चुस्त-दुरूस्त किया, प्रजा पर अत्याचार करने वाले सामंतों और रिश्वत खाने वाले कामचोर कर्मचारियों को कठोर रूप से दण्डित किया। व्यापार और कृषि कार्य को इतनी सुविधाएं प्रदान की गई कि सारा साम्राज्य धनधान्य से लहलहा उठा। मिहिरभोज ने प्रतिहार राजपूत साम्राज्य को धन, वैभव से चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया। अपने उत्कर्ष काल में उसे 'सम्राट' मिहिरभोज प्रतिहार की उपाधि मिली थी। अनेक काव्यों एवं इतिहास में उसे कई महान विशेषणों से वर्णित किया गया है।

==== वराह उपाधी ====

सम्राट मिहिर भोज के महान के सिक्के पर वाराह भगवान जिन्हें कि भगवान विष्णु के अवतार के तौर पर जाना जाता है। वाराह भगवान ने हिरण्याक्ष राक्षस को मारकर पृथ्वी को पाताल से निकालकर उसकी रक्षा की थी। सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार का नाम आदिवाराह भी है। ऐसा होने के पीछे यह मुख्य कारण हैं

1. जिस प्रकार वाराह (विष्णु जी) भगवान ने
पृथ्वी की रक्षा की थी और हिरण्याक्ष का वध किया था ठीक उसी प्रकार मिहिरभोज ने मलेच्छों को मारकर अपनी मातृभूमि की रक्षा की। इसीलिए इनहे आदिवाराह की उपाधि दी गई है।

==== उपासक ====

सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार शिव शक्ति के उपासक थे। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में भगवान शिव के प्रभास क्षेत्र में स्थित शिवालयों व पीठों का उल्लेख है। प्रतिहार साम्राज्य के काल में सोमनाथ को भारतवर्ष के प्रमुख तीर्थ स्थानों में माना जाता था। प्रभास क्षेत्र की प्रतिष्ठा काशी विश्वनाथ के समान थी। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार के जीवन के बारे में विवरण मिलता है। मिहिरभोज के संबंध में कहा जाता है कि वे सोमनाथ के परम भक्त थे उनका विवाह भी सौराष्ट्र में ही हुआ था। उन्होंने मलेच्छों से पृथ्वी की रक्षा की। 50 वर्ष तक राज करने के पश्चात वे अपने बेटे महेंद्रपाल प्रतिहार को राज सिंहासन सौंपकर सन्यासवृति के लिए वन में चले गए थे। सम्राट मिहिरभोज का सिक्का जो कन्नौज की मुद्रा था उसको सम्राट मिहिरभोज ने 836 ईस्वीं में कन्नौज को देश की राजधानी बनाने पर चलाया था। 

==== धन व्यवस्था ====

सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार महान के सिक्के पर वाराह भगवान जिन्हें कि भगवान विष्णु के अवतार के तौर पर जाना जाता है। इनके पूर्वज सम्राट नागभट्ट प्रथम ने स्थाई सेना संगठित कर उसको नगद वेतन देने की जो प्रथा चलाई वह इस समय में और भी पक्की हो गई और प्रतिहार साम्राज्य की महान सेना खड़ी हो गई। यह भारतीय इतिहास का पहला उदाहरण है, जब किसी सेना को नगद वेतन दिया जाता हो।

मिहिर भोज के पास ऊंटों, हाथियों और घुडसवारों की दूनिया कि सर्वश्रेष्ठ सेना थी । इनके राज्य में व्यापार,सोना चांदी के सिक्कों से होता है। यइनके राज्य में सोने और चांदी की खाने भी थी। भोज ने सर्वप्रथम कन्नौज राज्य की व्यवस्था को चुस्त-दुरूस्त किया, प्रजा पर अत्याचार करने वाले सामंतों और रिश्वत खाने वाले कामचोर कर्मचारियों को कठोर रूप से दण्डित किया। व्यापार और कृषि कार्य को इतनी सुविधाएं प्रदान की गई कि सारा साम्राज्य धनधान्य से लहलहा उठा। मिहिरभोज ने प्रतिहार साम्राज्य को धन, वैभव से चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया।

==== विश्व की सुगठित और विशालतम सेना ====

मिहिरभोज प्रतिहार की सैना में 8,00,000 से ज्यादा पैदल करीब 90,000 घुडसवार,, हजारों हाथी और हजारों रथ थे। मिहिरभोज के राज्य में सोना और चांदी सड़कों पर विखरा था-किन्तु चोरी-डकैती का भय किसी को नहीं था। जरा हर्षवर्धन बैस के राज्यकाल से तुलना करिए। हर्षवर्धन के राज्य में लोग घरों में ताले नहीं लगाते थे,पर मिहिरभोज के राज्य में खुली जगहों में भी चोरी की आशंका नहीं रहती थी।

==== बचपन से ही बहादुर और निडरता ====

मिहिरभोज प्रतिहार बचपन से ही वीर बहादुर माने जाते थे।एक बालक होने के बावजूद, देश के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को महसूस करते हुए उन्होंने युद्धकला और शस्त्रविधा में कठिन प्रशिक्षण लिया। राजकुमारों में सबसे प्रतापी प्रतिभाशाली और मजबूत होने के कारण, पूरा राजवंश और विदेशी आक्रमणो के समय देश के अन्य राजवंश भी उनसे बहुत उम्मीद रखते थे और देश के बाकी वंशवह उस भरोसे पर खरे उतरने वाले थे।

==== वह वैध उत्तराधिकारी साबित हुए ====

मिहिरभोज प्रतिहार राजपूत साम्राज्य के सबसे प्रतापी सम्राट हुए उनके राजगद्दी पर बैठते ही जैसे देश की हवा ही बदल गई । मिहिरभोज की वीरता के किस्से पूरी दूनीया मे मशूहर हुए।विदेशी आक्रमणो के समय भी लोग अपने काम मे निडर लगे रहते है। गद्दी पर बैठते ही उन्होने देश के लुटेरे,शोषण करने वाले, गरीबो को सताने वालो का चुन चुनकर सफाया कर दिया। उनके समय मे खुले घरो मे भी चोरी नही होती थी।

==== अरबी लेखो मे मिहिरभोज का है यशोगान ====

* अरब यात्री सुलेमान - पुस्तक सिलसिलीउत तुआरीख 851 ईस्वीं :
जब वह भारत भ्रमण पर आया था। सुलेमान सम्राट मिहिरभोज के बारे में लिखता है कि इस सम्राट की बड़ी भारी सेना है। उसके समान किसी राजा के पास उतनी बड़ी सेना नहीं है। सुलेमान ने यह भी लिखा है कि भारत में सम्राट मिहिरभोज से बड़ा इस्लाम का कोई शत्रु नहीं था । मिहिरभोज के पास ऊंटों, हाथियों और घुडसवारों की सर्वश्रेष्ठ सेना है। इसके राज्य में व्यापार,सोना चांदी के सिक्कों से होता है। ये भी कहा जाता है।कि उसके राज्य में सोने और चांदी की खाने भी थी।

* बगदाद का निवासी अल मसूदी 915ई.-916ई *

वह कहता है कि (जुज्र) प्रतिहार  साम्राज्य में 1,80,000 गांव, नगर तथा ग्रामीण क्षेत्र थे तथा यह दो किलोमीटर लंबा और दो हजार किलोमीटर चौड़ा था। राजा की सेना के चार अंग थे और प्रत्येक में सात लाख से नौ लाख सैनिक थे। उत्तर की सेना लेकर वह मुलतान के बादशाह और दूसरे मुसलमानों के विरूद्घ युद्घ लड़ता है। उसकी घुड़सवार सेना देश भर में प्रसिद्घ थी।जिस समय अल मसूदी भारत आया था उस समय मिहिरभोज तो स्वर्ग सिधार चुके थे परंतु प्रतिहार शक्ति के विषय में अल मसूदी का उपरोक्त विवरण मिहिरभोज के प्रताप से खड़े साम्राज्य की ओर संकेत करते हुए अंतत: स्वतंत्रता संघर्ष के इसी स्मारक पर फूल चढ़ाता सा प्रतीत होता है। समकालीन अरब यात्री सुलेमान ने सम्राट मिहिरभोज को भारत में इस्लाम का सबसे बड़ा दुश्मन करार दिया था,क्योंकि प्रतिहार राजपूत राजाओं ने 11 वीं सदी तक इस्लाम को भारत में घुसने नहीं दिया था। मिहिरभोज के पौत्र महिपाल को आर्यवर्त का महान सम्राट कहा जाता था।

जय श्रीराम।।
जय मा भवानी।।
Jai Rajputana
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गुरुवार, 14 मार्च 2019

सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार गुज्जर या राजपूत ??



EXPOSE GUJARS :- सम्राट मिहिर भोज प्रतिहार गुर्जर या राजपूत? आईये इसके ऊपर विश्लेषण करते हैं। .
जीवन परिचय सनातन धर्म रक्षक सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार (1) सम्राट मिहिरभोज का जन्म विक्रम संवत 873 (816 ईस्वी) को हुआ था। आपको कई नाम से जाना जाता है जैसे भोजराज, भोजदेव , मिहिर , आदिवराह एवं प्रभास। (2) आपका राज्याभिषेक विक्रम संवत 893 यानी 18 अक्टूबर दिन बुधवार 836 ईस्वी में 20 वर्ष की आयु में हुआ था। और इसी दिन 18 अक्टूबर को ही हर वर्ष भारत में आपकी जयंती मनाई जाती है। (3) इनके दादा का नाम नागभट्ट द्वितीय था उनका स्वर्गवास विक्रम संवत 890 (833 ईस्वी) भादो मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को हुआ। इनके पिता का नाम रामभद्र और माता का नाम अप्पादेवी था। माता पिता ने सूर्य की उपासना की थी जिसके फलस्वरूप उन्हें मिहिरभोज के रुप मे पुत्र की प्राप्ति हुई थी। (4) सम्राट मिहिरभोज की पत्नी का नाम चंद्रभट्टारिका देवी था। जो भाटी राजपूत वंश की थी। इनके पुत्र का नाम महेन्द्रपाल प्रतिहार था जो सम्राट मिहिरभोज के स्वर्गवास उपरांत कन्नौज की गद्दी पर बैठे। (5) विक्रम संवत 945 (888 ईस्वी) 72 वर्ष की आयु में सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार का स्वर्गवास हुआ।
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सम्राट मिहिर भोज प्रतिहार अथवा परिहार/पड़िहार वंश के क्षत्रिय थे। मनुस्मृति में प्रतिहार, पड़िहार, पढ़ियार, परिहार शब्दों का प्रयोग हुआ हैं। परिहार एक तरह से क्षत्रिय शब्द का पर्यायवाची है। क्षत्रिय वंश की इस शाखा के मूल पुरूष भगवान राम के भाई लक्ष्मण माने जाते हैं। लक्ष्मण का उपनाम, प्रतिहार, होने के कारण उनके वंशज प्रतिहार, कालांतर में परिहार/पड़िहार कहलाएं। कुछ जगहों पर इन्हें अग्निवंशी बताया गया है, पर ये मूलतः सूर्यवंशी हैं। पृथ्वीराज विजय, हरकेलि नाटक, ललित विग्रह नाटक, हम्मीर महाकाव्य पर्व (एक) मिहिर भोज की ग्वालियर प्रशस्ति में परिहार वंश को सूर्यवंशी ही लिखा गया है। लक्ष्मण के पुत्र अंगद जो कि कारापथ (राजस्थान एवं पंजाब) के शासक थे, उन्ही के वंशज परिहार/पड़िहार है।
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इस वंश की उत्पत्ति के संबंध में प्राचीन साहित्य,ग्रन्थ और शिलालेख आदि क्या कहते है इसपर भी प्रकाश डालते है।
१) सोमदेव सूरी ने सन ९५९ में यशस्तिलक चम्पू में गुर्जर देश का वर्णन किया है। वह लिखता है कि न केवल प्रतिहार बल्कि चावड़ा,चालुक्य,आदि वंश भी इस देश पर राज करने के कारण गुर्जर कहलाये।
२) विद्व शाल मंजिका,सर्ग १,श्लोक ६ में राजशेखर ने कन्नौज के प्रतिहार राजा भोजदेव के पुत्र महेंद्र को रघुकुल तिलक अर्थात सूर्यवंशी क्षत्रिय बताया है।

३)कुमारपाल प्रबंध के पृष्ठ १११ पर भी गुर्जर देश का वर्णन है...
कर्णाटे,गुर्जरे लाटे सौराष्ट्रे कच्छ सैन्धवे।
उच्चाया चैव चमेयां मारवे मालवे तथा।।
४) महाराज कक्कूड का घटियाला शिलालेख भी इसे लक्ष्मण का वंश प्रमाणित करता है....अर्थात रघुवंशी
रहुतिलओ पड़ीहारो आसी सिरि लक्खणोत्रि रामस्य।
तेण पड़िहार वन्सो समुणई एत्थ सम्प्तो।।
५) बाउक प्रतिहार के जोधपुर लेख से भी इनका रघुवंशी होना प्रमाणित होता है।(९ वी शताब्दी)
स्वभ्राता राम भद्रस्य प्रतिहार्य कृतं सतः।
श्री प्रतिहारवड शोयमत श्रोन्नतिमाप्युयात।
इस शिलालेख के अनुसार इस वंश का शासनकाल गुजरात में प्रकाश में आया था।
६) चीनी यात्री हुएन्त त्सांग ने गुर्जर राज्य की राजधानी पीलोमोलो,भीनमाल या बाड़मेर कहा है।
कुक्कुस्थ(त्स्थ) मूल पृथवः क्ष्मापल कल्पद्रुमाः।
तेषां वंशे सुजन्मा क्रमनिहतपदे धाम्नि वज्रैशु घोरं,
राम: पौलस्त्य हिन्श्रं क्षतविहित समित्कर्म्म चक्रें पलाशे:।
श्लाध्यास्त्स्यानुजो सौ मधवमदमुषो मेघनादस्य संख्ये,
सौमित्रिस्तिव्रदंड: प्रतिहरण विर्धर्य: प्रतिहार आसी।
तवुन्शे प्रतिहार केतन भृति त्रैलौक्य रक्षा स्पदे
देवो नागभट: पुरातन मुने मुर्तिर्ब्बमूवाभदुतम।
अर्थात-सुर्यवंश में मनु,इश्वाकू,कक्कुस्थ आदि राजा हुए,उनके वंश में पौलस्त्य(रावण) को मारने वाले राम हुए,जिनका प्रतिहार उनका छोटा भाई सौमित्र(सुमित्रा नंदन लक्ष्मण) था,उसके वंश में नागभट हुआ। इसी प्रशस्ति के सातवे श्लोक में वत्सराज के लिए लिखा है क़ि उस क्षत्रिय पुंगव(विद्वान्) ने बलपूर्वक भड़ीकुल का साम्राज्य छिनकर इश्वाकू कुल की उन्नति की।
८) देवो यस्य महेन्द्रपालनृपति: शिष्यों रघुग्रामणी:(बालभारत,१/११)
तेन(महिपालदेवेन)च रघुवंश
मुक्तामणिना(बालभारत)
बालभारत में भी महिपालदेव को रघुवंशी कहा है।
९)ओसिया के महावीर मंदिर का लेख जो विक्रम संवत १०१३(ईस्वी ९५६) का है तथा संस्कृत और देवनागरी लिपि में है,उसमे उल्लेख किया गया है कि-
तस्या कार्षात्कल प्रेम्णालक्ष्मण: प्रतिहारताम ततो अभवत प्रतिहार वंशो राम समुव:।।६।।
तदुंदभशे सबशी वशीकृत रिपु: श्री वत्स राजोडsभवत।
अर्थात लक्ष्मण ने प्रेमपूर्वक उनके प्रतिहारी का कार्य किया,अनन्तर श्री राम से प्रतिहार वंश की उत्पत्ति हुई। उस प्रतिहार वंश में वत्सराज हुआ।
१०) गौडेंद्रवंगपतिनिर्ज्जयदुर्व्विदग्धसदगुर्ज्जरेश्वरदिगर्ग्गलतां च यस्य।
नीत्वा भुजं विहतमालवरक्षणार्त्थ स्वामी तथान्यमपि राज्यछ(फ) लानि भुंक्ते।।
-बडोदे का दानपत्र,Indian Antiquary,Vol 12,Page 160

उक्त ताम्रपत्र के 'गुजरेश्वर' एद का अर्थ 'गुर्जर देश(गुजरात) का राजा' स्पष्ट है,जिसे खिंच तानकर गुर्जर जाती या वंश का राजा मानना सर्वथा असंगत है। संस्कृत साहित्य में कई ऐसे उदाहरण मिलते है।
ये लेख गुजरेश्वर,गुर्जरात्र,गुज्जुर इन संज्ञाओ का सही मायने में अर्थ कर इसे जाती सूचक नहीं स्थान सूचक सिद्ध करता है जिससे भगवान्लाल इन्द्रजी,देवदत्त रामकृष्ण भंडारकर,जैक्सन तथा अन्य सभी विद्वानों के मतों को खारिज करता है जो इस सज्ञा के उपयोग से प्रतिहारो को गुर्जर मानते है।
११) कुशनवंशी राजा कनिष्क के समय में गुर्जरों का भारतवर्ष में आना प्रमाणशून्य बात है,जिसे स्वयं डॉ.भगवानलाल इन्द्रजी ने स्वीकार किया है,और गुप्तवंशियों के समय में गुजरो को राजपूताना,गुजरात और मालवे में जागीर मिलने के विषय में कोई प्रमाण नहीं दिया है। न तो गुप्त राजाओं के लेखो और भडौच से मिले दानपत्रों में इसका कही उल्लेख है।
१२)३६ राजवंशो की किसी भी सूची में इस वंश के साथ "गुर्जर" एद का प्रयोग नहीं किया गया है। यह तथ्य भी गुर्जर एद को स्थानसूचक सिद्धकर सम्बंधित एद का कोइ विशेष महत्व नही दर्शाता।
१३)ब्राह्मण उत्पत्ति के विषय में इस वंश के साथ द्विज,विप्र यह दो संज्ञाए प्रयुक्त की गई है,तो द्विज का अर्थ ब्राह्मण न होकर द्विजातिय(जनेउ) संस्कार से है न की ब्राह्मण से। ठीक इसी तरह विप्र का अर्थ भी विद्वान पंडित अर्थात "जिसने विद्वत्ता में पांडित्य हासिल किया हो" ही है।
१४) कुशनवंशी राजा कनिष्क के समय में गुर्जरों का भारतवर्ष में आना प्रमाणशून्य बात है,जिसे स्वयं डॉ.भगवानलाल इन्द्रजी ने स्वीकार किया है,और गुप्तवंशियों के समय में गुजरो को राजपूताना,गुजरात और मालवे में जागीर मिलने के विषय में कोई प्रमाण नहीं दिया है। न तो गुप्त राजाओं के लेखो और भडौच से मिले दानपत्रों में इसका कही उल्लेख है।
--प्रतिहार राजपूतो की वर्तमान स्थिति---
भले ही यह विशाल प्रतिहार राजपूत साम्राज्य बाद में खण्डित हो गया हो लेकिन इस वंश के वंशज राजपूत आज भी इसी साम्राज्य की परिधि में मिलते हैँ।
उत्तरी गुजरात और दक्षिणी राजस्थान में भीनमाल के पास जहाँ प्रतिहार वंश की शुरुआत हुई, आज भी वहॉ प्रतिहार राजपूत पड़िहार आदि नामो से अच्छी संख्या में मिलते हैँ।
प्रतिहारों की द्वितीय राजधानी मारवाड़ में मंडोर रही। जहाँ आज भी प्रतिहार राजपूतो की इन्दा, लुलावत,रामावत शाखाएं बड़ी संख्या में मिलती है। राठोड़ो के मारवाड़ आगमन से पहले इस क्षेत्र पर प्रतिहारों की इसी शाखा का शासन था जिनसे राठोड़ो ने जीत कर जोधपुर को अपनी राजधानी बनाया।

17वीं सदी में भी जब कुछ समय के लिये मुगलो से लड़ते हुए राठोड़ो को जोधपुर छोड़ना पड़ गया था तो स्थानीय इन्दा प्रतिहार राजपूतो ने अपनी पुरातन राजधानी मंडोर पर कब्जा कर लिया था।
इसके अलावा प्रतिहारों की अन्य राजधानी ग्वालियर और कन्नौज के बीच में प्रतिहार राजपूत परिहार के नाम से बड़ी संख्या में मिलते हैँ।
बुन्देल खंड में भी परिहारों की अच्छी संख्या है। यहाँ परिहारों का एक राज्य नागौद भी है जो मिहिरभोज के सीधे वंशज हैँ।
प्रतिहारों की एक शाखा राघवो का राज्य वर्तमान में उत्तर राजस्थान के अलवर, सीकर, दौसा में था जिन्हें कछवाहों ने हराया। आज भी इस क्षेत्र में राघवो की खडाड शाखा के राजपूत अच्छी संख्या में हैँ। इन्ही की एक शाखा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर, अलीगढ़, रोहिलखण्ड और दक्षिणी हरियाणा के गुडगाँव आदि क्षेत्र में बहुसंख्या में है। एक और शाखा मढाढ के नाम से उत्तर हरियाणा में मिलती है। व
उत्तर प्रदेश में सरयूपारीण क्षेत्र में भी प्रतिहार राजपूतो की विशाल कलहंस शाखा मिलती है। इनके अलावा संपूर्ण मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तरी महाराष्ट्र आदि में(जहाँ जहाँ प्रतिहार साम्राज्य फैला था) अच्छी संख्या में प्रतिहार/परिहार राजपूत मिलते हैँ।

प्रतिहार गुज्जर कैसे ??
-प्रतिहारो के गल्लका के लेख में स्पष्ट लिखा है के प्रतिहार सम्राट नागभट्ट जिन्हें गुर्जरा प्रतिहार वंश का संस्थापक भी माना जाता है ने गुर्जरा राज्य पर हमला कर गुज्जरों को गुर्जरा देश से बाहर खदेड़ा व अपना राज्य स्थापित किया... अगर प्रतिहार गुज्जर थे तो खुद को ही अपने देश में हराकर बाहर क्यों खड़ेंगे ?? मिहिर भोज के पिता प्रतिहार क्षत्रिय और पुत्र गुज्जर कैसे ??
- हरश्चरित्र में गुजरादेश का जिक्र बाण भट्ट ने एक राज्य एक भू भाग के रूप में किया है यही बात पंचतंत्र और कई विदेशी सैलानियों के रिकार्ड्स में भी पुख्ता होती है। इस गुर्जरा देस में गुज्जरों को खदेड़ने के बाद जिस भी वंश ने राज्य किया गुर्जरा नरपति या गुर्जर नरेश कहलाया। यदि गुज्जर विदेशी जाती है तो दक्षिण से आये हुए सोलंकी/चालुक्य जैसे वंश भी गुर्जरा पर फ़तेह पाने के बाद गुर्जरा नरेश या गुर्जरेश्वर क्यों कहलाये ?
- प्रतिहार राजा हरिश्चंद्र को मंडोर के शीलालेखों में द्विज लिखा है , जिनकी ब्राह्मण और क्षत्रिय पत्नियां थी । यह मिहिर भोज के भी पूर्वज थे। रिग वेद और मनुस्मृति के अनुसार द्विज केवल आर्य क्षत्रिय और ब्राह्मण जातियाँ ही हो सकती थीं। अगर हरिशन्द्र आर्य क्षत्रिय थे तो उनके वंशज गुज्जर कैसे ??
- अवंती के प्रतिहार राजा, वत्सराज के ताम्रपत्रों और शिलालेखों से यह पता चलता है के वत्सराज प्रतिहार ने नंदपुरी की पहली और आखिरी गुज्जर बस्ती को उखाड़ फेंका नेस्तेनाबूत कर दिया और भत्रवर्ध चौहान को जयभट्ट गुज्जर के स्थान पर जागीर दी। इस शिलालेखों से भी प्रतिहार और गुज्जरों के अलग होने के सबूत मिलते हैं तो प्रतिहार और गुज्जर एक कैसे ???
- देवनारायण जी की कथा के अनुसार भी उनके पिता चौहान क्षत्रिय और माता गुजरी थी जिससे गूजरों की बगड़ावत वंश निकला यही उधारण राणा हर राय देव से कलस्यां गोत्र के गुज्जरों को उतपत्ति ( करनाल और मुज़्ज़फरगर ब्रिटिश गजट पढ़ें या सदियों पुराने राजपूतों के भाट रिकॉर्ड पढ़ें।) , ग्वालियर के राजा मान सिंह तंवर की गुजरी रानी मृगनयनी से तोंगर या तंवर गुज्जरों की उत्पत्ति के प्रमाण मिलतें हैं तो प्रीतिहार राजपूत वंश गुज्जरों से कैसे उतपन्न हुआ ? क्षत्रिय से शुद्र तो बना जा सकता है पर शुद्र से क्षत्रिय कैसे बना जा सकता है।

- जहाँ जहाँ प्रतिहार वंश का राज रहा है वहाँ आज भी प्रतिहार राजपूतों की बस्ती है और यह बस्तियाँ हजारों साल पुरानी है पर यहाँ गुज्जर प्रतिहार नहीं पाये जाते।
मंडोर के इलाके में इन्दा, लुलावत,रामावत व देवल प्रतिहार कन्नौज में कलहंस और मूल प्रतिहार , मध्य प्रदेश में प्रतिहारों को नागोद रियासत व गुजरात में प्रतिहार राजपूतों के आज भी 3 रियासत व् 200 से अधिक गाँव। न कन्नौज में गुज्जर है ना नागोद में ना गुजरात में। और सारे रजवाड़े भी क्षत्रिय व राजपूत प्रतिहार माने जाते है जबकि गुज्जरों में तो प्रतिहार गोत्र व खाप ही नहीं है तो प्रतिहार गुज्जर कैसे ??
- मिहिर भोज नागभट्ट हरिश्चंद्र प्रतिहारों के शिलालेखों और ताम्रपत्रों में इन तीनों को सूर्य वंशी रघु वंशी और लक्षमण के वंश में लिखा है ; गुज्जर है तो ये सब खुद को आर्य क्षत्रिय क्यों बता के गए ??!
- राजोरगढ़ के आलावा ग्वालियर कन्नोज मंडोर गल्लका अवंती उज्जैन के शिलालेखों और ताम्रपत्रों में प्रतिहारों के लिये किसी भी पंक्ति व लेख में गुर्जर गू जर गू गुर्जरा या कोई भी मिलता जुलता शब्द या उपाधि नहीं मिलती है साफ है सिर्फ राजोरगढ़ में गुर्जरा देस से आई हुई खाप को गुर्जरा नरेश को उपाधि मिली !! जब बाकि देश के प्रतिहार गुज्जर नहीं तो राजोरगढ़ के प्रतिहार गुज्जर कैसे ??

बुधवार, 23 जनवरी 2019

प्रतिहार राजपूतों के सिंबल या लोगो | मंडोर नागौद अलीपुर बेलासर


मित्रों यह उपर के तीन चित्रों में पहला मंडोर के पडिहारों/प्रतिहारो का सिंबल जो आपको मंडौर जोधपुर
बीकानेर,जैसलमेर,नागौर राजस्थान, में ज्यादा संख्या में मिलेंगे। दूसरा अलीपुरा राज्य का सिंबल है यह राज्य आपको मध्य प्रदेश के ग्वालियर में मौजूद है। तीसरा खनेती राज्य जो वर्तमान में हिमाचल प्रदेश में है। बीच में परिहारों/प्रतिहारो का सबसे बड़ा राज्य नागौद रियासत जो मध्य प्रदेश के सतना जिला मे वर्तमान में है।जिसमें बीच में राज्य का सिंबल ओर दोनों साइड रियासत के आखिरी महाराजा महेन्द्र सिंह जू देव जी है। फिर चौथा सिंबल बेलासर के पडिहार/प्रतिहार राजपूतों का है जो उन्हें बीकानेर रियासत द्वारा मिला है। पांचवे में सूर्य का चित्र है क्योंकि हम सूर्यवंशी क्षत्रिय है।छठे मे हमारे वंश के कुल भूषण महान वीर शासक आदिवाराह परमेश्वर सम्राट मिहिर भोज प्रतिहार जी का चित्र है। इन सब की जानकारी आपको इंटरनेट पर भी उपलब्ध मिलेगी। यह अफवाह जो है कि हम अग्निवंशी क्षत्रिय है। यह सरासर कपोकाल्पनिक है। प्रतिहार वंश का निकास श्रीराम जी के अनुज लक्ष्मण जी से है जो वह प्रतिहार(प्रहरी) के रूप मे थे इसलिए आंगे चलकर इसे प्रतिहार वंश के नाम से जाना जाता है जो शिलालेखों ओर इतिहास में पूर्णतः माना गया है प्रतिहार वंश का हद से ज्यादा शोध होने पर ही आज यह दुर्गति है। कहीं अग्निवंशी तो कहीं गुर्जर जाति से जोडा गया है। मित्रों आज मैं आपको बताना चाहता हूं कि प्रतिहार राजपूतों के साथ गुर्जारा शब्द क्यों जुड गया है। प्राचीन गुर्जररात्र के बाहर निवास करने वाली अनेक जातिया गुर्जर नाम से जानी जाती हैँ। इनमे सौराष्ट्र और कच्छ में मिलने वाली गुर्जर ब्राह्मण, गुर्जर मिस्त्री, गुर्जर लोहार, गुर्जर बढ़ई आदि अनेक जाती हैँ जिन्हें सिर्फ प्राचीन गुर्जरात्र से आने की वजह से गुर्जर कहा जाता है। बाकी इनमे कोई racial similarity नही हैँ। इसी तरह उत्तर महाराष्ट्र में एक ही जगह डोरे गुर्जर, लेवा गुर्जर और कडवा गुर्जर नाम की अलग अलग जातिया मिलती हैँ। इनमे से डोरे गुर्जर अपने को राजपूत कहते हैँ और प्राचीन गुर्जरात्र से आया बताते हैँ। इनमे प्राचीन गुजरात में मिलने वाले राजपूत वंश ही मिलते हैँ। हालांकि नॉन राजपूतो में शादी करने से इनका स्टेटस low हो गया है, इसीलिए local राजपूत इनको हेय दृष्टि से देखते हैँ। लेवा गुर्जर अपने को गुजरात से आए लेवा कुनबी बताते हैँ जो अब वहा पाटीदार या पटेल के नाम से भी जाने जाते हैँ। कडवा गुर्जर गुजरात से आए कडवा कुनबी हैँ। इन तीनो जातियो में कोई racial similarity नही हैँ।
इसी तरह नार्थ वेस्ट इंडिया में मिलने वाली एक गुर्जर चरवाहा जाती जो अपने को तथाकथित प्राचीन गुर्जर जाती का वंशज बताती है, वो भी गुजरात से आने के कारण ही गुर्जर कहलाई है। इसके कोई प्रमाण नही है की अगर कोई गुर्जर जाती थी भी तो यह जाती उसकी वंशज है। गौरतलब है की इस जाती में तथाकथित गुर्जर बताए जाने वाले प्रतिहार, सोलंकी आदि वंश बिलकुल नही मिलते। गौरतलब है की जहाँ प्राचीन गुर्जरात्र की सीमाए थी वहॉ कोई गुर्जर नाम की जाती नही मिलती। सभी गुर्जर नाम की जातिया इस क्षेत्र के बाहर ही मिलती हैँ इससे यह साबित होता है कि गुर्जर शब्द एक geographical expression को denote करता है। गुर्जर शब्द भी एक शिलालेख पर अब तक मिला ओर प्रतिहारों के अब तक के किसी भी ताम्रपत्र ओर शिलालेख मे इस शब्द ओर जाति का वर्णन नहीं मिला जिससे यह प्रमाणित है कि प्रतिहार परिहार,पडिहार ओर उनकी अन्य शाखाऐं शुद्ध क्षत्रिय राजपूत वंश है। इतिहास हमारे साथ है यह केवल कुछ नीच जातियाँ खुद को क्षत्रिय साबित होने का पड़यंत्र कर रही है। खासकर जाट ओर गुज्जर इनमें प्रमुख है।ओर आजकल तो दिल्ली के कुछ इलाकों का नामकरण भी इन गुज्जरो ने गुर्जर सम्राट मिहिर भोज जी के नाम से रखा है।ओर तो दिल्ली का ही बहुत ही फेमस मंदिर अक्षरधाम आप सभी ने देखा ओर सुना होगा वहां भी मिहिर भोज परिहार जी की मूर्ति स्थापित कर उस पर गुर्जर सम्राट बताया ओर प्रदर्शित किया जा रहा है। मित्रों आप सभी हमारा साथ दीजिए इस भ्रम को दूर करने में इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर करके।।।

जय माँ भवानी।
जय मिहिरभोज प्रतिहार
प्रतिहार एकता जिंदाबाद
श्री गाजण माता युथ ब्रिगेड राजस्थान

क्या बडगूजर राजपूत प्रतिहार राजपूत वंश की शाखा है? | बडगुजर राजपूत | Bad...








क्या बडगूजर राजपूत प्रतिहार राजपूत वंश की शाखा है??---

--,  (Badgujar rajputs and pratihar rajput
dynasty)

श्रीमाल जी का नाम बडगूजर राजपूतों की वंशावली में आता है  पर इसका अर्थ सांकेतिक है, इसको समझिये।  राजस्थान में जालौर जिले में स्थित भीनमाल प्राचीन गुर्जरदेश (गुर्जरात्रा) की राजधानी थी, जिसका वास्तविक नाम "श्रीमाल" था,जो बाद में भिल्लमाल और फिर भीनमाल हुआ।  गल्लका लेख के अनुसार अवन्ति के राजा नागभट्ट प्रतिहार ने 7 वी सदी में गुर्जरो को मार भगाया और गुर्जरदेश पर कब्जा किया, गुर्जरदेश पर अधिपत्य करने के कारण ही नागभट्ट प्रतिहार गुरजेश्वर कहलाए जैसे रावण लंकेश कहलाता था।  यही से इनकी एक शाखा दौसा,अलवर के पास राजौरगढ़ पहुंची, राजौरगढ़ में स्थित एक शिलालेख में वहां के शासक मथनदेव पुत्र सावट को गुर्जर प्रतिहार लिखा हुआ है जिसका अर्थ है गुर्जरदेश से आए हुए प्रतिहार शासक।।  इन्ही मथंनदेव के वंशज 12 वी सदी से बडगूजर कहलाए जाने लगे क्योंकि राजौरगढ़ क्षेत्र में पशुपालक गुर्जर/गुज्जर समुदाय भी मौजूद था जिससे श्रेष्ठता दिखाने और अंतर स्पष्ट करने को ही गुर्जर प्रतिहार राजपूत बाद में बडगूजर कहलाने लगे।  पशुपालक शूद्र गुर्जर/गुज्जर समुदाय का राजवंशी बडगूजर क्षत्रियो से कोई सम्बन्ध नही था।पशुपालक गुज्जर/गुर्जर दरअसल बडगूजर (गुर्जर प्रतिहार) राजपूतो के राज्य में निवास करते थे।  राजा रघु के वंशज (क्योंकि श्रीराम और लक्ष्मण जी दोनों रघु के वंशज थे) होने के कारण ही इन्होंने राघव/रघुवंशी पदवी धारण की, इनकी वंशावली में एक अन्य शासक रघुदेव के होने के कारण भी इनके द्वारा राघव टाइटल लिखा जाना बताया जाता है।  इस प्रकार बडगूजर राजपूत वंशावली में श्रीमाल (गुर्जरदेश की राजधानी भीनमाल का प्राचीन नाम) का होना तथा राजौरगढ़ शिलालेख में बड़गुजरो के पूर्वज मथनदेव को गुर्जर प्रतिहार सम्बोधित किया जाना आधुनिक बडगूजर राजपूत वंश को प्रतिहार राजपूत वंश की ही शाखा होना सिद्ध करता है।  श्रीमाल (भीनमाल) के निवासी या वहां से अन्य स्थानों पर जाकर बसे ब्राह्मण श्रीमाली ब्राह्मण कहलाए जो गौड़ ब्राह्मण गुर्जरदेश में बसे, वो गुर्जर गौड़ ब्राह्मण कहलाए।।

सोमवार, 21 जनवरी 2019

सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार काल के तांबे के सिक्के


सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार काल के तांबे के सिक्के

सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार के शासनकाल के समय चलाये गये तांबे के सिक्के जो नवमीं शताब्दी में राज्य मुद्रा के रुप मे चलते थे।

प्रतिहार/परिहार/पढ़ियार क्षत्रिय वंश।।
लक्ष्मणवंशी प्रतिहार राजपूत।।
सम्राट मिहिर भोज।।
जय माँ चामुण्डा।।
जय क्षात्र धर्म।।

रविवार, 20 जनवरी 2019

प्रतिहार कालीन पुष्कर तीर्थ का इतिहास | History of Pushkar teerh Rajasthan India

History of Pushkar teerh Rajasthan India




* प्रतिहार कालीन पुष्कर तीर्थ का इतिहास *

मित्रों आज की इस पोस्ट के माध्यम से हम आपको प्रतिहार कालीन राजस्थान के पुष्कर तीर्थ एवं भारत में एक मात्र ब्रम्हा जी के मंदिर के इतिहास की जानकारी देंगे।।

अजोरगढ महेश्वर (नर्मदा तट) मे प्रतिहार राजा अजराणा ने दुर्ग का निर्माण करवाया था। उसके पुत्र को एक बालयोगी अमर करना चाहता था, बालयोगी ने प्रतिहार राजा के पुत्र नाहड़राव को अमरतेल के कडाहे पर कूदने को कहा जिससे राजा यह सुनकर बहुत ही क्रोधित हो गए। पुत्र मोह के कारण राजा ने योगी को कपटी समझा और उसकी हत्या कर दी। जिसके फलस्वरूप उन्हें कुष्ठ रोग हो गया। इस कुष्ठ रोग के दिन प्रतिदिन बढने से राजा बहुत ही दुखित था।

उस कुष्ठ रोग का निवारण करने के लिए एक किवंदती प्रचलित है कि --

एक दिन प्रतिहार राजा शिकार करने के लिए जंगल की ओर गये और काफी देर जंगल में शिकार की तलास में भटकते रहे काफी देर बाद उन्हें एक जंगली सुअर (वाराह) दिखा। उस जंगली सुअर का पीछा करते हुए राजा अपने सैनिकों से पिछड गये और जंगल में भटक गये। 

आंगे चलकर अजमेर नदी के तीन कोस उत्तर में वह जंगली सुअर अचानक से गायब हो गया। राजा काफी देर से पीछा करने से थक चुके थे और उन्हें बहुत प्यास भी लगी थी, थके हारे राजा परेशान हो गये प्यास से व्याकुल राजा नदी की ओर बढ चले कुछ दूरी पर उन्हे एक गड्ढा मिला जिसमे जंगली सुअर के खुर के निशान थे। उस गड्ढे को राजा ने अपनी तलवार से और गहरा किया और प्यास बुझाई। पानी पीते ही राजा वहीं पर बेहोश हो गये।।

अचेतावस्था में पुष्कर तीर्थ ने राजा को दर्शन दिये और बताया कि मैने वाराह के रुप में तुम्हारे प्राणों की रक्षा की, साथ ही तुम्हारे कुष्ठ रोग का निवारण भी किया।।

होश आने पर प्रतिहार राजा ने देखा की वह कुष्ठ रोग से मुक्त हो गया। इससे खुश होकर राजा ने अपने राजधानी आकर " ऐरा " के वन में एक सरोवर का निर्माण एवं धातु की सीढियाँ भी बनवाई जिसे हम आज पुष्कर तीर्थ एवं पुष्कर ताल के नाम से जानते है तथा भारत में एक मात्र चतुर्मुखी ब्रम्हा जी के मंदिर का निर्माण करवाया जो अपने आप में अद्धितीय मंदिर है। राजा ने जंगली सुअर (वाराह)का शिकार करने पर कडा प्रतिबंध लगा दिया तथा उसके मांस भक्षण पर भी रोक लगा दिया।

इसी घटना के बाद से प्रतिहारों ने वाराह का मांस खाना बंद कर दिया और वाराह को पूजने लगे। और वाराह जयंती भी मनाने लगे। इस विशेष दिन का और महत्व प्रतिहारों मे जब बढा जब इस क्षत्रिय प्रतिहार वंश मे वाराह जयंती के ही दिन कुल दीपक सम्राट मिहिर भोज का जन्म हुआ जो बचपन से ही अदम्य साहसी और शस्त्र/शास्त्र में निपुण थे। 

प्रतिहार राजपूत युद्ध के लिए प्रस्थान करने के पहले यहां चतुर्मुखी ब्रम्हा जी के मंदिर में पूजा अर्चना के लिए जरुर आते थे।

इन सब घटनाओं की जानकारी पुष्कर तालाब की सीढियों पर अंकित कुछ प्रतिहार राजाओं के नाम से हुई जिनमे अजराणा प्रतिहार एवं नाहड़राव प्रतिहार मुख्य रुप से है और यहां के कई शिलालेखों एवं ताम्रपत्रों में भी इसका प्रतिहार राजाओं से जिक्र किया गया है ।

कालीदास ने भी कई जगह पुष्कर तीर्थ का वर्णन किया है --

वह लिखते है - " प्रतिहार नाहड़राव मण्डौरगढ़ करवायों पुष्कर बधायो "

सम्राट पृथ्वीराज चौहान एवं नाहड़राव प्रतिहार समकालीन थे। पृथ्वीराज रासौ, नैणसी विख्यात बांकी दास कई ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है।

प्रतिहार राजा अजराणा का पुत्र नाहड़राव बहुत ही वीर था कुछ समय के लिए परमारो ने 11वीं शताब्दी में प्रतिहारों से उनका प्राचीन राज्य मण्डौर छीन लिया था। जिससे नाहड़राव प्रतिहार ने अपनी वीरता एवं योग्यता से परमारो पर हमला कर पुनः छीन लिया था।

Pratihara / Pratihar / Parihar Rulers of india

Refrence : -
(1) विंध्य क्षेत्र के प्रतिहार वंश का ऐतिहासिक अनुशीलन - लेखक डाॅ अनुपम सिंह
( 2) प्रतिहारों का मूल इतिहास लेखक - देवी सिंह मंडावा
(3) भारत के प्रहरी - प्रतिहार लेखक - डॉ विंध्यराज सिंह चौहान
(4) पृथ्वीराज रासौ ग्रन्थ
(5)कालीदास - रघुवंश 151-154
(6) राजपूतो का इतिहास - लेखक गौरीशंकर हरिचंद्र ओझा
(7) परिहार वंश का प्रकाश लेखक - मुंशी प्रेमचंद देवी
(8) वीरभानुदय काव्य - राजकवि
(9) प्राचीन भारत का इतिहास लेखक - बी.एल. शर्मा
(10) राजशेखर - काव्यभीमांस और मजूमदार एनसीयंट इंडिया पेज 225/ क्षत्रिय वंश वैभव

जय माँ चामुण्डा।।
जय क्षात्र धर्म।।
नागौद रियासत।।
श्री गाजण माता युथ ब्रिगेड राजस्थान

शुक्रवार, 11 जनवरी 2019


हिन्दू राजपूत शौर्य और बहादुरी से जुड़े “क्षत्रिय सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार” के रोचक पहलू जो उन्हे महान बनाते है।             




                                                                   



























== काव्यों एवं इतिहास मे इन विशेषणो से वर्णित किया====
क्षत्रिय सम्राट,भोजदेव, भोजराज, वाराहवतार, परम भट्टारक, महाराजाधिराज, परमेश्वर , प्रभास, महानतम भोज, मिहिर महान।
==== शासनकाल ====
सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार ने 18 अक्टूबर 836 ईस्वीं से 885 ईस्वीं तक 50 साल तक राज किया। मिहिर भोज के साम्राज्य का विस्तार आज के मुलतान से पश्चिम बंगाल तक और कश्मीर से कर्नाटक तक था।
==== प्रतिहार साम्राज्य ====
प्रतिहार साम्राज्य ने अपने शुरूआती शासनकाल मे ही पूरी दूनिया को अपनी ताकत से हिला दिया था। इनके साम्राज्य का क्षेत्रफल लगभग 20 लाख किलोमीटर स्क्वायर माइल्स था। इनका शासनकाल 6ठी शताब्दी से 10वी शताब्दी तक रहा। प्रतिहारों ने अरबों से 300 वर्ष तक लगभग 200 से ज्यादा युद्ध किये जिसका परिणाम है कि हम आज यहां सुरक्षित है। प्रतिहारों ने अपने वीरता, शौर्य , कला का प्रदर्शन कर सभी को आश्चर्यचकित किया है। भारत देश हमेशा ही प्रतिहारो का रिणी रहेगा उनके अदभुत शौर्य और पराक्रम का जो उनहोंने अपनी मातृभूमि के लिए न्यौछावर किया है। जिसे सभी विद्वानों ने भी माना है। प्रतिहार साम्राज्य ने दस्युओं, डकैतों, अरबों, हूणों, कुषाणों, खजरों, इराकी,मंगोलो,तुर्कों, से देश को बचाए रखा और देश की स्वतंत्रता पर आँच नहीं आई।
इनका राजशाही निशान वराह है। ठीक उसी समय मुश्लिम धर्म का जन्म हुआ और इनके प्रतिरोध के कारण ही उन्हे हिंदुश्तान मे अपना राज कायम करने मे 300 साल लग गए। प्रतिहार राजपूत ही भारतीय संस्कृति के रक्षक बने। और इनके राजशाही निशान ” वराह ” विष्णु का अवतार माना है प्रतिहार मुश्लमानो के कट्टर शत्रु थे । इसलिए वो इनके राजशाही निशान ‘वराह’ से आजतक नफरत करते है।
==== शासन व्यवस्था ====
सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार वीरता, शौर्य और पराक्रम के प्रतीक हैं। उन्होंने विदेशी साम्राज्यो के खिलाफ लड़ाई लड़ी और अपनी पूरी जिन्दगी अपनी मलेच्छो से पृथ्वी की रक्षा करने मे बिता दी। सम्राट मिहिरभोज बलवान, न्यायप्रिय और धर्म रक्षक सम्राट थे। सिंहासन पर बैठते ही मिहिरभोज ने सर्वप्रथम कन्नौज राज्य की व्यवस्था को चुस्त-दुरूस्त किया, प्रजा पर अत्याचार करने वाले सामंतों और रिश्वत खाने वाले कामचोर कर्मचारियों को कठोर रूप से दण्डित किया। व्यापार और कृषि कार्य को इतनी सुविधाएं प्रदान की गई कि सारा साम्राज्य धनधान्य से लहलहा उठा। मिहिरभोज ने प्रतिहार राजपूत साम्राज्य को धन, वैभव से चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया। अपने उत्कर्ष काल में उसे ‘सम्राट’ मिहिरभोज प्रतिहार की उपाधि मिली थी। अनेक काव्यों एवं इतिहास में उसे कई महान विशेषणों से वर्णित किया गया है।
==== वराह उपाधी ====
सम्राट मिहिर भोज के महान के सिक्के पर वाराह भगवान जिन्हें कि भगवान विष्णु के अवतार के तौर पर जाना जाता है। वाराह भगवान ने हिरण्याक्ष राक्षस को मारकर पृथ्वी को पाताल से निकालकर उसकी रक्षा की थी। सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार का नाम आदिवाराह भी है। ऐसा होने के पीछे यह मुख्य कारण हैं
=)) जिस प्रकार वाराह (विष्णु जी) भगवान ने पृथ्वी की रक्षा की थी और हिरण्याक्ष का वध किया था ठीक उसी प्रकार मिहिरभोज ने मलेच्छों को मारकर अपनी मातृभूमि की रक्षा की। इसीलिए इनहे आदिवाराह की उपाधि दी गई है।
==== उपासक ====
सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार शिव शक्ति के उपासक थे। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में भगवान शिव के प्रभास क्षेत्र में स्थित शिवालयों व पीठों का उल्लेख है। प्रतिहार साम्राज्य के काल में सोमनाथ को भारतवर्ष के प्रमुख तीर्थ स्थानों में माना जाता था। प्रभास क्षेत्र की प्रतिष्ठा काशी विश्वनाथ के समान थी। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार के जीवन के बारे में विवरण मिलता है। मिहिरभोज के संबंध में कहा जाता है कि वे सोमनाथ के परम भक्त थे उनका विवाह भी सौराष्ट्र में ही हुआ था। उन्होंने मलेच्छों से पृथ्वी की रक्षा की। 50 वर्ष तक राज करने के पश्चात वे अपने बेटे महेंद्रपाल प्रतिहार को राज सिंहासन सौंपकर सन्यासवृति के लिए वन में चले गए थे। सम्राट मिहिरभोज का सिक्का जो कन्नौज की मुद्रा था उसको सम्राट मिहिरभोज ने 836 ईस्वीं में कन्नौज को देश की राजधानी बनाने पर चलाया था।
==== धन व्यवस्था ====
सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार महान के सिक्के पर वाराह भगवान जिन्हें कि भगवान विष्णु के अवतार के तौर पर जाना जाता है। इनके पूर्वज सम्राट नागभट्ट प्रथम ने स्थाई सेना संगठित कर उसको नगद वेतन देने की जो प्रथा चलाई वह इस समय में और भी पक्की हो गई और प्रतिहार साम्राज्य की महान सेना खड़ी हो गई। यह भारतीय इतिहास का पहला उदाहरण है, जब किसी सेना को नगद वेतन दिया जाता हो।
मिहिर भोज के पास ऊंटों, हाथियों और घुडसवारों की दूनिया कि सर्वश्रेष्ठ सेना थी । इनके राज्य में व्यापार,सोना चांदी के सिक्कों से होता है। यइनके राज्य में सोने और चांदी की खाने भी थी। भोज ने सर्वप्रथम कन्नौज राज्य की व्यवस्था को चुस्त-दुरूस्त किया, प्रजा पर अत्याचार करने वाले सामंतों और रिश्वत खाने वाले कामचोर कर्मचारियों को कठोर रूप से दण्डित किया। व्यापार और कृषि कार्य को इतनी सुविधाएं प्रदान की गई कि सारा साम्राज्य धनधान्य से लहलहा उठा। मिहिरभोज ने प्रतिहार साम्राज्य को धन, वैभव से चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया।
==== विश्व की सुगठित और विशालतम सेना ====
मिहिरभोज प्रतिहार की सैना में 4,00,000 से ज्यादा पैदल करीब 30,000 घुडसवार,, हजारों हाथी और हजारों रथ थे। मिहिरभोज के राज्य में सोना और चांदी सड़कों पर विखरा था-किन्तु चोरी-डकैती का भय किसी को नहीं था। जरा हर्षवर्धन बैस के राज्यकाल से तुलना करिए। हर्षवर्धन के राज्य में लोग घरों में ताले नहीं लगाते थे,पर मिहिरभोज के राज्य में खुली जगहों में भी चोरी की आशंका नहीं रहती थी।
==== बचपन से ही बहादुर और निडरता ====
मिहिरभोज प्रतिहार बचपन से ही वीर बहादुर माने जाते थे।एक बालक होने के बावजूद, देश के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को महसूस करते हुए उन्होंने युद्धकला और शस्त्रविधा में कठिन प्रशिक्षण लिया। राजकुमारों में सबसे प्रतापी प्रतिभाशाली और मजबूत होने के कारण, पूरा राजवंश और विदेशी आक्रमणो के समय देश के अन्य राजवंश भी उनसे बहुत उम्मीद रखते थे और देश के बाकी वंशवह उस भरोसे पर खरे उतरने वाले थे।
==== वह वैध उत्तराधिकारी साबित हुए ====
मिहिरभोज प्रतिहार राजपूत साम्राज्य के सबसे प्रतापी सम्राट हुए उनके राजगद्दी पर बैठते ही जैसे देश की हवा ही बदल गई । मिहिरभोज की वीरता के किस्से पूरी दूनीया मे मशूहर हुए।विदेशी आक्रमणो के समय भी लोग अपने काम मे निडर लगे रहते है। गद्दी पर बैठते ही उन्होने देश के लुटेरे,शोषण करने वाले, गरीबो को सताने वालो का चुन चुनकर सफाया कर दिया। उनके समय मे खुले घरो मे भी चोरी नही होती थी।
==== अरबी लेखो मे मिहिरभोज का है यशोगान====
अरब यात्री सुलेमान – पुस्तक सिलसिलीउत तुआरीख 851 ईस्वीं :
जब वह भारत भ्रमण पर आया था। सुलेमान सम्राट मिहिरभोज के बारे में लिखता है कि इस सम्राट की बड़ी भारी सेना है। उसके समान किसी राजा के पास उतनी बड़ी सेना नहीं है। सुलेमान ने यह भी लिखा है कि भारत में सम्राट मिहिरभोज से बड़ा इस्लाम का कोई शत्रु नहीं था । मिहिरभोज के पास ऊंटों, हाथियों और घुडसवारों की सर्वश्रेष्ठ सेना है। इसके राज्य में व्यापार,सोना चांदी के सिक्कों से होता है। ये भी कहा जाता है।कि उसके राज्य में सोने और चांदी की खाने भी थी।
बगदाद का निवासी अल मसूदी 915ई.-916ई 
वह कहता है कि (जुज्र) प्रतिहार साम्राज्य में 90,000 गांव, नगर तथा ग्रामीण क्षेत्र थे तथा यह दो हजार किलोमीटर लंबा और दो हजार किलोमीटर चौड़ा था। राजा की सेना के चार अंग थे और प्रत्येक में सात लाख से नौ लाख सैनिक थे। उत्तर की सेना लेकर वह मुलतान के बादशाह और दूसरे मुसलमानों के विरूद्घ युद्घ लड़ता है। उसकी घुड़सवार सेना देश भर में प्रसिद्घ थी।जिस समय अल मसूदी भारत आया था उस समय मिहिरभोज तो स्वर्ग सिधार चुके थे परंतु प्रतिहार शक्ति के विषय में अल मसूदी का उपरोक्त विवरण मिहिरभोज के प्रताप से खड़े साम्राज्य की ओर संकेत करते हुए अंतत: स्वतंत्रता संघर्ष के इसी स्मारक पर फूल चढ़ाता सा प्रतीत होता है। समकालीन अरब यात्री सुलेमान ने सम्राट मिहिरभोज को भारत में इस्लाम का सबसे बड़ा दुश्मन करार दिया था,क्योंकि प्रतिहार राजपूत राजाओं ने 11 वीं सदी तक इस्लाम को भारत में घुसने नहीं दिया था। मिहिरभोज के पौत्र महिपाल को आर्यवर्त का महान सम्राट कहा जाता था।
==== प्रतिहार शैली कला ====
भारत मे कोई ऐसा स्थान नही बचा जहां प्रतिहारो ने अपनी तलवार और निर्माण कला का जौहर ना दिखाया हो। प्रतिहारो ने सैकडो मंदिर व किले के निर्माण किए थे जिसमे शास्त्रबहु मंदिर, बटेश्वर मंदिर, मण्डौर किला, जालौर किला, ग्वालियर किला, कुचामल किला, पडावली मंदिर, मिहिर बावडी, चौसठ योगिनी मंदिर आदि इनके अलावा सैकडो इलाके व ठिकाने है जहाँ प्रतिहारो ने अपनी कला का प्रदर्शन किया