जोधपुर से 65 किलोमीटर दूर औसियाँ जैन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। इन मंदिरों का निर्माण क्षत्रिय प्रतिहार शासकों द्वारा करवाया गया था।
अन्य नाम
स्थानीय प्राचीन अभिलेखों से सूचित होता है कि ओसियां के कई नाम मध्य काल तक प्रचलित थे, जो हैं- 'उकेश', 'उपकेश', 'अकेश' आदि। किंवदंती है कि इसको प्राचीन काल में 'मेलपुरपत्तन' तथा 'नवनेरी' भी कहते थे। 'ओसवाल' जैनों का मूल स्थान ओसियां ही है।
राजपूत सम्राट वत्सराज प्रतिहार (778-794 ईस्वी) के समय निर्मित महावीर स्वामी का मंदिर स्थापत्य का उत्कृष्ट नमूना है, इसके अतिरिक्त सच्चिया माता का मंदिर, सूर्य मंदिर, हरीहर मंदिर इत्यादि प्रतिहार कालीन स्थापत्य कला के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। ये मंदिर प्रतिहार शैली में निर्मित है।
वत्सराज ने औसियां के मंदिरों का निर्माण करवाया। औसियां सूर्य व जैन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। इसके समय उद्योतन सूरी ने "कुवलयमाला" की रचना 778 में जालौर में की। औसियां के मंदिर महामारू शैली में बने है। लेकिन औसियां का हरिहर मंदिर पंचायतन शैली में बना है।
-औसियां राजस्थान में प्रतिहारों का प्रमुख केन्द्र था।
-औसिंया (जोधपुर)के मंदिर प्रतिहार कालीन है।
-औसियां को राजस्थान को भुवनेष्वर कहा जाता है।
-औसियां में औसिया माता या सच्चिया माता (ओसवाल जैनों की देवी)ओर सांखला राजपूतों की कुलदेवी का मंदिर है जिसमें महिसासुर मर्दनी की प्रतिमा है।
ओसियां (Osiyan) एक प्राचीन पश्चिमी भारत में राजस्थान के जोधपुर जिले राज्य में स्थित शहर है। यह थार रेगिस्तान में नखलिस्तान की है, और अपने मंदिरों के लिए "राजस्थान का खजुराहो" के रूप में जाना जाता रहा है। शहर में एक पंचायत गांव और ओसियां तहसील का मुख्यालय भी है। यह जोधपुर में जिला मुख्यालय के उत्तर में सड़क मार्ग से 69 किमी (43 मील) निहित है, मुख्य जोधपुर से दूर एक मोड़ पर - बीकानेर राजमार्ग।
ओसियां को प्रतिहार शैली के 8वी से 11 वीं सदी के टूटे मंदिरों के घर के रूप में प्रसिद्ध है। शहर प्रतिहार राजवंश के दौरान मारवाड़ के राज्य का एक प्रमुख धार्मिक केंद्र था। समूह में 18 मंदिरों में से,
* सूर्य मंदिर
* काली मंदिर,
* सच्चियाय माता मंदिर
* और मुख्य जैन महावीर को समर्पित एक मंदिर उनकी कृपा और वास्तुकला में बाहर खड़ा है।
राजपूत सम्राट वत्सराज प्रतिहार के समय से ही जैनत्व के काफी निकट रहे हैं ओसिया के महावीर मंदिर हम सच्चियाय माता मंदिर एवं सूर्य मंदिर इसके प्रत्यक्ष प्रमाण है उसके पश्चात महेंद्र पाल प्रतिहार के पुत्र रत्नपाल प्रतिहार हुए जिन्हें रत्न सुरी के नाम से जाना जाता है उन्होंने ओसिया नगरी के 140000 नागरिकों को जैन धर्म में दीक्षित किया था(बहुत से प्रतिहार राजपूतों ने जैन धर्म अपनाया था) तत्पश्चात राज्यपाल की युद्ध नहीं करने की नीति के चलते उसकी हत्या कर दी गई उनके वंशजों की रक्षा की खातिर वे लोग सभी रावल शाखा के सानिध्य में आकर अपने जैन धर्म को अनुसरण करते हुए आगे बढ़ने लगे यहां तक कि उन्होंने अपना गोत्र भी बदल दिया एवं नए वंश की स्थापना करी जिसे ओसिया से निकलने के कारण ओसवाल वंश कहा जाता है
प्रतिहार राजपूतों के बारे में ओसिया के महावीर मंदिर का लेख जो विक्रम संवत 1013(ईस्वी 956) का है तथा संस्कृत और देवनागरी लिपि में है,उसमे उल्लेख किया गया है कि-
तस्या कार्षात्कल प्रेम्णालक्ष्मण: प्रतिहारताम ततो अभवत प्रतिहार वंशो राम समुव:।।६।।
तदुंदभशे सबशी वशीकृत रिपु: श्री वत्स राजोडsभवत।
अर्थात लक्ष्मण ने प्रेमपूर्वक उनके प्रतिहारी का कार्य किया,अनन्तर श्री राम से प्रतिहार वंश की उत्पत्ति हुई। उस प्रतिहार वंश में वत्सराज हुआ। जिसने मन्दिरो का निर्माण करवाया।(प्रतिहार राजपूत वंश एक शुद्ध सूर्यवंशी रघुवंशी क्षत्रिय राजपूत वंश है )
ये शहर के एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र था। इस स्थिति को बनाए रखा, सैकड़ों साल के लिए हिंदू धर्म और जैन धर्म का प्रमुख केंद्र रहा। यह शहर अचानक खत्म हो गया जब 1195 में गौर के मोहम्मद की सेनाओं द्वारा हमला किया गया था।
सौजन्य:- श्री गाजण माता यूथ ब्रिगेड राजस्थान
जय मां चामुण्डा।।
जय मिहिरभोज।।
जय वत्सराज।।
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