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"श्री गाजणमाता यूथ ब्रिगेड भारत आपका हार्दिक स्वागत करता है ."

chalati patti

"श्री गाजण माता यूथ ब्रिगेड भारत (राष्ट्रीय युवा एकीकृत संगठन भारत) ."

रविवार, 13 सितंबर 2020

7वीं शताब्दी में हुआ सुंदेलाव तालाब का निर्माण, राजपूत सम्राट नागभट्ट प्रतिहार अपनी मां की याद में बनाया था sundelav jalore

 







7वीं शताब्दी में हुआ सुंदेलाव तालाब का निर्माण, 147.4 बीघा है भराव क्षेत्र
1300 साल पहले सातवीं शताब्दी में प्रतिहार राजा नागभट्ट ने अपनी माता सुंदरादेवी की याद में इस तालाब का निर्माण करवाया था। उस समय राजा-महाराजा समेत शहरवासियों के पेयजल के लिए इस तालाब के पानी का उपयोग किया जाता था। तालाब 196.25 बीघा क्षेत्र में फैला था, लेकिन तालाब के आसपास कॉलोनियां आबाद हाेने के चलते अब इस तालाब का भराव क्षेत्र 147.4 बीघा क्षेत्र ही रह गया है।
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सौजन्य:- श्री गाजण माता यूथ ब्रिगेड राजस्थान @ जालौर दुर्ग


शुक्रवार, 26 जून 2020

ठा. हमीरसिंह पुत्र मंगलसिंह पड़िहार की जानकारी / Tha Information about Hamir Singh's son Mangalsingh Parihar


                         

ठा. हमीरसिंह पुत्र मंगलसिंह पड़िहार की जानकारी

अपने पूर्वजों की ही तरह आपकी वफादारी एवं निष्ठाएं 'बीकानेर राज' के प्रति सदैव ही असंदिग्ध रही है आपकी योग्यता को देखते हुए श्री डूंगर लान्सर में दिनांक 23.07.1877 को कैप्टिन के पद पर प्रथम नियुक्ति हुई ऐसा विवरण सन् 1916 के बीकानेर राजपत्र में प्रकाशित अर्द्धवार्षिक सूचीपत्र में देखने को मिलता है

इसी डूंगर लांसर में पदोन्नति पाते हुए आप सन् 1933 को मेजर पद से सेवानिवृत्त हुए क्योंकि आप महाराजा गंगासिंह के बहुत ही विश्वसनीय व्यक्ति थे सो सेवा निवृत्ति उपरांत भी आपको 1933 से 1935 तक वाल्टर नोबल्स हाई स्कूल बीकानेर में हाउस मास्टर के एक अहम पद पर नियुक्ति प्रदान की थी (वर्तमान में इस स्कूल का नाम सादुल पब्लिक स्पोर्ट्स स्कूल है) 
उपरोक्त विशेषताओं के अलावा आप एक अच्छे वेद भी थे। तथा देसी जड़ी - बूटियों से लोगों का निशुल्क उपचार भी करते थे। जिससे आमजन में आप बहुत ही लोकप्रिय थे। 
बेलासर गांव स्थित अपनी हवेली निर्माण से पूर्व आपने हनुमानजी का मंदिर निर्माण करवाकर प्राणप्रतिष्ठा करवाई।

सौजन्य:- श्री गाजण माता यूथ ब्रिगेड राजस्थान

जय मां गाजण।
जय मां चामुण्डा।।
जय मिहिरभोज।।

गुजराती भाषा में👇
થા હમીરસિંહના પુત્ર મંગલસિંહ પરિહાર વિશે માહિતી

તમારા પૂર્વજોની જેમ, 'બિકાનેર રાજ' પ્રત્યેની તમારી નિષ્ઠા અને નિષ્ઠા હંમેશાં નિર્વિવાદ રહી છે, તમારી ક્ષમતાને જોતા, શ્રી ડુંગર લanceન્સરને 23.07.1877 ના રોજ કેપ્ટન પદ માટે પ્રથમ નિમણૂક મળી, જે વિગતો બિકાનેર ગેઝેટમાં 1916 માં પ્રકાશિત થઈ હતી. અર્ધવાર્ષિક સૂચિમાં જોયું

તે જ ડુંગર લેન્સરમાં બedતી મળતી વખતે, તમે 1933 માં મેજર પદ પરથી નિવૃત્ત થઈ ગયા કારણ કે તમે મહારાજા ગંગાસિંઘના ખૂબ વિશ્વાસપાત્ર વ્યક્તિ હતા, તેથી નિવૃત્તિ પછી પણ તમારી 1915 થી 1935 દરમિયાન વterલ્ટર નોબલ્સ હાઈસ્કૂલ બીકાનેરમાં હાઉસ માસ્ટરના મહત્વના પદ પર નિમણૂક થઈ. (હાલમાં આ શાળાનું નામ સાદુલ પબ્લિક સ્પોર્ટસ સ્કૂલ છે)
ઉપરોક્ત લાક્ષણિકતાઓ સિવાય તમે સારા વેદ પણ હતા. અને સ્વદેશી herષધિઓવાળા લોકોની મફત સારવાર પણ કરતા. જેના કારણે તમે સામાન્ય લોકોમાં ખૂબ પ્રખ્યાત હતા.
બેલાસર ગામમાં હવેલી બાંધતા પહેલા તેમણે હનુમાનજીનું મંદિર બનાવ્યું અને તેમનું જીવન પવિત્ર બનાવ્યું.

સૌજન્ય: - શ્રી ગજણ માતા યુથ બ્રિગેડ રાજસ્થાન

જય મા ગજન.
જય મા ચામુંડા.
જય મિહિરભોજ.

English translation

Tha Information about Hamir Singh's son Mangalsingh Parihar

Like your ancestors, your loyalty and devotion to 'Bikaner Raj' has always been unquestionable, given your ability, Mr. Dungar Lancer got the first appointment to the post of Captain on 23.07.1877, the details published in the Bikaner Gazette of 1916. Seen in the half yearly catalog

While getting promoted in the same Dungar Lancer, you retired from the post of Major in 1933 because you were a very reliable person of Maharaja Gangasingh, so even after retirement, you were appointed to an important post of House Master at Walter Nobles High School Bikaner from 1933 to 1935. (Presently the name of this school is Sadul Public Sports School)
Apart from the above characteristics you were also a good Veda. And also used to treat people with indigenous herbs for free. Due to which you were very popular among the general public.
Before constructing his mansion in Belasar village, he got Hanumanji's temple constructed and got his life consecrated.

Courtesy: - Shri Gajan Mata Youth Brigade Rajasthan

Jai Maa Gajan.
Jai Maa Chamunda.
Jai Mihirbhoj.

बुधवार, 13 मई 2020




== प्रतिहार कालीन तेली मंदिर का इतिहास ==

इस मंदिर का निर्माण क्षत्रिय प्रतिहार वंश के सबसे प्रतापी शासक " सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार " के शासन काल मे हुआ था। ग्‍वालियर किले पर स्थित समस्‍त स्‍मारकों में यह मंदिर सबसे उंचा है। इसकी उंचाई करीब 30 मीटर है। मंदिर की भवन योजना में गर्भग्रह तथा अंतराज प्रमुख हैं। इसमें प्रवेश के लिए पूर्व पूर्व की ओर से सीढियां हैं। मंदिर की एक विशेषता इसकी गजपृष्‍टाकार छत है, जोकि द्रविड शैली में बनी हुई है।

उत्‍तर भारत में यह भवन निर्माण कला विरले ही देखने को मिलती है। मंदिर की साज सज्‍जा विभिन्‍न उत्‍तर भारतीय मंदिरों की साज सज्‍जा के समान है। इसकी बाहरी दीवारें विभिन्‍न प्रकार की मूर्तिकला से सुसज्ज्जित हैं। अत: इस मंदिर में उत्‍तर भारतीय एवं दक्षिण भारतीय वास्‍तुकला का सम्मिश्रण देखने को मिलता है। मंदिर के पूर्वी भाग में निर्मित दो मंडपकाएं एवं प्रवेश द्वार सन 1881 में अंग्रेजों के शासन काल में मेजर कीथ द्वारा बनवाए गए थे।

समूचे उत्तर भारत में द्रविड़ आर्य स्थापत्य शैली का समन्वय यहीं ग्वालियर किले पर तेली मंदिर के रूप में देखने को मिलता है । लगभग सौ फुट की ऊंचाई लिये किले का यह सर्वाधिक ऊंचाई वाला प्राचीन मंदिर है। गंगोलाताल के समीप बना यह मंदिर विशाल जगती पर स्थापित है । शिखर ऊपर की संकरा एवं बेलन की तरह गोलाई लिये हुये है । मंदिर का प्रवेश द्वार पूर्व की ओर है । भीतर आयताकार गर्भगृह में छोटा मंडप है । निचले भाग में 113 लघु देव प्रकोष्ठ हैं जिनमें देवी-देवताओं की मान्य प्रतिमाएॅ थीं ।

मंदिर के चारों ओर की बाह्य दिवारों पर विभिन्न आकार प्रकार के पशु-पक्षी, फूल-पत्ते, देवी-देवताओं की अलंकृत आकृतियां हैं । कहीं-कहीं आसुरी शक्तियों वाली आकृतियां एवं प्रणय मुद्रा में प्रतिमाएॅ भी अंकित हैं । प्रवेश द्वार के एक तरफ कछुए पर यमुना व दूसरी तरफ मकर पर विराजमान गंगा की मानवाकृतियां हैं । आर्य द्रविड़ शैली युक्त इस मंदिर का वास्तुशिल्प अद्वितीय है । मंदिर के शिखर के दोनों ओर चैत्य गवाक्ष बने हैं तथा मंदिर के अग्रभाग में ऊपर की ओर मध्य में गरूढ़ नाग की पूंछ पकड़े अंकित है ।

उत्तर भारतीय अलंकरण से युक्त इस मंदिर का स्थापत्य दक्षिण द्रविड़ शैली का है । वर्तमान में इस मंदिर में कोई मूर्ति नहीं है । पर दरअसल यह एक विष्णु मंदिर था । कुछ इतिहासकार इसे शिव मंदिर मानते हैं । सन 1231 में यवन आक्रमणकारी इल्तुमिश द्वारा मंदिर के अधिकांश हिस्से को ध्वस्त कर दिया गया था । तब 1881–1883 ई. के बीच अंग्रेज हुकमरानों ने मंदिर के पुरातात्विक महत्व को समझते हुये मेजर कीथ के निर्देशन में किले पर स्थित अन्य मंदिरों, मान महल(मंदिर)के साथ-साथ तेली का मंदिर का भी सरंक्षण करवाया था ।

मेजर कीथ ने इधर-उधर पड़े भग्नावशेषों को संजोकर तेली मंदिर के समक्ष विशाल आकर्षक द्वार भी बनवा दिया । द्वार के निचले हिस्से में लगे दो आंग्ल भाषी शिलालेखों में संरक्षण कार्य पर होने वाले खर्च का भी उल्लेख किया है । वर्तमान में मंदिर का केवल पूर्वी प्रवेश द्वार है। मूल मंदिर को दिल्ली के सुलतानों के शासन काल में ध्वस्त कर दिया गया था । हालांकि बाद में ब्रिटिश काल में हुये मरम्मत से मंदिर का मूल स्वरूप नष्ट हो गया है, फिर भी मेजर कीथ मंदिरों के संरक्षण कार्य का बीड़ा उठाने के लिये प्रसंशा के पात्र हैं ।

सौजन्य:- श्री गाजण माता यूथ ब्रिगेड भारत

जय मिहिरभोज।।
जय क्षात्र धर्म।।
जय चामुण्डा।।

#telimandir #teli #ग्वालियर #Pratiharas 

गुरुवार, 7 मई 2020

सूर्यवंशी प्रतिहार राजपूतों की लोहियानागढ रियासत का इतिहास

सूर्यवंशी प्रतिहार राजपूतों की लोहियानागढ रियासत

आज का जसवंतपुरा (भीनमाल)
एक जमाने में लोहियाना गढ़ के नाम से जाना जाता था यहां के तत्कालीन ठाकुर प्रतिहारों की देवल शाखा से थे
 जिनका नाम राणा धागजी प्रतिहार था उनका इकलौता पुत्र नरपालदे देवल अपनी आन  बान शान के लिए जाना जाता था 

 चंद्रावती नगर के सेठ के पुत्र की सगाई उदयपुर हुई यह सगाई भी ठाकुर साहब के कारण ही हुई थी बारात उदयपुर लेकर जाना था और बीच में लुटेरों का कहर था इसलिए सेठ ने राणा साहब को न्योता दिया राणा साहब अस्वस्थ एवं वृद्धावस्था में होने के कारण नहीं जा सके
इसलिए राणा  साहब ने अपने प्रिय साथी एवं वीर योद्धा धूडजी राजपूत को बारात के साथ भेजा जैसे ही बारात बीस के रास्तों झाड़ी जंगलों में पहुंची और लूटेरे आभूषण वगैरह लूटने लगे धूरजी न लुटेरों  को समझाया  और अपना परिचय दिया और लूटेरे डर गए और बारात को जाने दीया बारात उदयपुर पहुंची और धूमधाम से शादी संपन्न हुई और जब बारात वापस लौट रही थी तो लुटेरे पहले से तैयार थे और रास्ता रोक लिया और धूडजी ने लुटेरों को बहुत समझाया पर लुटेरे नहीं माने भीषण युद्ध हुआ और एक एक लुटेरे मरने लगे और खून की नदियां बहने लगी। तब एक लुटेरे ने पीछे से आकर धूडजी पर वार कर दिया इनका सिर धड़ से अलग हो गया बहुत लुटेरे मारे गए और आधे भाग गए अपनी तलवार अंग रखे से पूसी और ठाकुर साहब को अभिवंदन दिया। धुडजी का शरीर नीचे गिर गया और उनकी आत्मा स्वर्ग पहुंच गई। सेठ गढ़ पहुंचा ठाकुर साहब को सारी बात बताई उसी सभा में राणा धागा का 20 वर्षीय युवराज नरपालदे देवल प्रतिहार बैठा था सेठ ने धूडजी की द्वारा तलवार पोसने एवं म्यान में रखने की बात की तब नरपालदे ने टिप्पणी की  धूडजी ने कार्य तो उत्तम किया है पर मरते समय जब जमीन पर गिरे तो तुम कहते हो उस से पहले अपनी तलवार जो आततायियों के रक्त से रंजीत थी जो अपनी अंग रखी के पल्ले से निर्मल कर उसे म्यान की मुझे तो तुम यह बतलाओ की तलवार अंग रखी पल्ले के बाहरी अंश से स्वच्छ की अथवा भीतरवाले भाग से चमकाई अगर अंदर से मांझी थी तब तो निसंदेह वह महान पुरुष था और अगर यदि बार के पहले से रेगड़ी थी तो वह योद्धा ना था नरपालदे का ऐसा कटास करना ठाकुर साहब को अच्छा लगा उन्होंने झुंझला करके कहा ऐसा तो वही करके दिखाएगा कुंवर नरपाल देव ने जोर देखकर दृढ़तापूर्वक कह दिया कि वह ऐसा करके अवश्य दिखाएगा राणा साहब ने भी आवेश में आकर ताना कसा कि वह तो वृद्धावस्था में है कल को मर जाएंगे इस पर उस वीर कुंवर ने कहा कि वह अपने 30 वे वर्ष तक ऐसा करके बता देगा ऐसी विकट स्थिति में राणा साहब ने विचार किया कि कुंवर सत्यवादी है और अपने वचन के अनुसार ही करेगा कोई उपाय करके उसकी जिद को छुड़ाना चाहिए अपने पुत्र को शाबाशी देते हुए राणा साहब ने कहा मैं जानता हूं  तुम एक पराक्रमी नवयुवक हो और जैसा कहा वैसा करके दिखा सकते हो लेकिन मेरे मुंह से अवंती बात निकल गई थी तुम अभी 20 बरस के हो और एक अनोखा निश्चय कर बैठे हो इससे छोड़ दो तथा प्रजा की सेवा करो राजा की मंडली भी समझा-बुझाकर थक गई मगर राजकुमार अपनी बात से टस से मस न हुआ नरपालदे प्रतिहार की एक सहेती बहन थी राणा साहब ने अंत पुर में जाकर अपनी पुत्री को बताया कि वह अपने भाई से कंचुकी के नाम से पास बरस की वर्दी करवा ले इस पर बहन ने भाई को रनिवास में बुलाया दोनों के बीच तनाव व्यस्त वातावरण में सवांद होने लगा
लद
भईया मैं कुछ मांगू देंगे
 हां अवश्य दूंगा
मेरी ताई कांसली समझ भेंट सवरूप आप 5 बरस जीवनकाल बढ़ा दो 35 साल जीवित रहो

इस पर भाई ने हंसकर का बहन मेरी राजपूत अपना वचन तोड़ता नहीं तुमने कांसली के बदले 5 बरस मांगे सो मैंने 30 में से 5 बरस तुझको दिए अब मेरी आयु अधिकतम 25 वर्ष तक की रहेगी अब वही मिले जो करता कि उसने तो 30 से ऊपर 5 वर्ष की अवधि बढ़ाने को कहा था
 नरपालदे ने समझाया 
 बढ़ाने पर तो कांसली का क्या दिया वृद्धि से तो लेना हो गया वह तो ले लिया कहां आएगा सो ऐसा पापी नरपाल दे नहीं हो सकता अपने अधिकार में जो कुछ हो उसी में से दिया जाता है सोडा हुआ वह दिया हुआ का उल्लंघन करो या सुवासिनी का दान लेऊ यह दोनों कार्य नरक में ले जाने वाले हैं इन्हें मैं कभी नहीं करूंगा मैं प्रण में बंधा हूं संकल्प भंग करके अपने कुल को कलंकित नहीं करना चाहता हूं 
राजपुत के हाथ से छुटा बाण और मुंह से निकला शब्द वापस नहीं जाते ।
नरपालदे ने अपने परके हुए 140 सैनिकों को साथ लिए और आस-पड़ोस नहीं बल्कि दूर-दराज तक वीरों को ललकारा पर कोई भी अंशिता संकट मोल लेकर सामना करना नहीं चाहते थे अब कुल कुंवर किसी संघर्षशील प्रतिनिधि की प्रतिमा में मारा मारा फिरता था उस की कामना थी कि कोई उसके सामने संघर्ष करें सर कटे धड़ लड़े मडे गैहगढ

दूसरी तरफ अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने गुजरात तथा काठियावाड़ विजय किया और सोमनाथ के मंदिर को भी नष्ट किया लौटते समय विजय वाहिनी के जालौर की ओर प्राण करने का समाचार मिला तो नरपालदे को चिर परीक्षित अभिलाषा पूर्ण करने का असर मिला 
जीरावल जिला सिरोही पाटन मुख्य मार्ग पर स्थित था इसलिए नरपाल दे ने जीरावल की सीमांत गांव निंबंज के वन में डेरा डाला 
वही से होकर मुसलमान फौज को गुजरना था राजपूतो वीरों के मनो में अधोलिखित भाव हिल रहे थे

मरदां मरणौ हकक है मगर पचीचा माय
गौखा रौवे गौरडी मरद हथाया मायं

जब मुसलमान साहि फौज गांवों को लूटती जनता को बंदी बनाती स्त्रियों का अपहरण करती ब्राह्मणों  पर अत्याचार करती गायों का वध करती जीरावल के पड़ोसी गांव गढ़ में पहुंची तो राजपूतों की टुकड़ियों ने मिथ्या विवाद लड़ने के लिए आग्रह किया उनसे युद्ध लड़ना ही पड़ेगा नहीं तो आगे बढ़ने नहीं दिया जाएगा इन्हीं प्रसंग में दोनों समूह मैं जंग छिड़ गई दूसरी तरफ नरपालदे ने अपने साथी गांगसी से कहा कि वह दूर खड़ा रह कर संग्राम को देखें और उनका पूरा वर्णन राणा साहब को सबके सामने करें तब गांगसी जरा सा हट के एक उच्ची जगह पर खड़ा हो गया 
उधर दोनों दलों के बीच मारकाट आरंभ हो गई प्रत्येक राजपूत को अगणय खिलजी सिपाहियों ने घेर लिया क्षत्रिय रणबांकुरों ने ऐसी मार काट मसाई की दुश्मनों के छक्के छूट गए परंतु एक विशाल सेना के सामने मुट्ठी भर राजपूत कब तक ठहर पाते
 अब एक-एक करके धराशाई होने लगे नरपालदे ने भी बिचो बोरियों को मौत के घाट उतारा इसी बीच एक विरोधी के झटके से नरपालदे का सिर धड़ से अलग हो गया सिर कटा होने पर उसने विकराल रुप धारण कर लिया और दोनों हाथों में तलवार ले भयंकर युद्ध करने लगा उसने ना केवल उस शत्रु का एक आगत से सिर उड़ा दिया अब अपितु उसके पश्चात प्रहारों की ऐसी जड़ी लगाई की जिधर से निकलता वही रणभूमि निर्जन हो जाती अंत में जब विपक्षी दल तितर-बितर हो गया तो अपनी अंगी के अंदर के पल्लू से तलवार को अकलुषित की और फिर  बैकुठ सिधार गया
गांगसी के लोहियानागढ़ पहुंचने का समाचार आग की तरह सब जगह फैल गया 
उसने ठाकुर साहब सहित पूरे जन समुदाय को नरपाल दे की तलवार का अवलोकन कराते हुए आंखों देखी घटना का विस्तार से विवरण सुनाया और तीर की तरह वहां से निकलकर दुराचारियों से जा भिड़ा तथा  अनेकानेक आतंकवादियों को मार कर रास्ते रवाना किया अतः उसने भी देव लोक की राह पकड़ी 
नरपाल दे की  पत्नी सहित 140 क्षत्रियानिया इनके पीछे केसुआ मैं सती हो गई ।

ठाकुर साहब ने केसुआ के गढ़ गांव में नरपाल दे सहित 140  वीरों की स्मृति में छतरी और रायपुर वडवज निंबज के बीच एक सबूतरा बनाया जो गोगरा के मामा जी के नाम से प्रसिद्ध है स्थानीय भाषा में लोग जुझार बावसी कहते हैं

पातो लड़यों पातशाह सु जाजल हुयो झुंझार ।
सोनगढ साको कियो पोहु मोटा पढीयार।
कट पडीया रायपुर अपचर वरीया अंग।
रिया संग नरपाल रे उण रजपुतो ने गणो रंग।
(श्री गाजण माता यूथ ब्रिगेड सभी देवल भाईयो से निवदेन करती है..की आप प्रतिहार लिखे या देवल प्रतिहार लिखे जिससे सभी को पता चल सके कि देवल प्रतिहार राजपूतों की शाखा है थोड़ा इस बात पर गौर करें)

सौजन्य:- श्री गाजण माता यूथ ब्रिगेड भारत

जय राणा नरपालदे प्रतिहार।।
जय मिहिरभोज प्रतिहार।।
जय मां चामुण्डा।।
जय लोहियानगढ।।

#Pratiharas #Parihar #Dewalpratihar #Lohiyanagarh #jasvantpura #Padhiyar #Bhinmal #Jagthamb #Narpalde #Rana

गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

बुंदेलखण्ड और जूझौति के प्रतिहार

----- > बुंदेलखण्ड और जूझौति के प्रतिहार < -----

प्रतिहार क्षत्रियों के कई राज्य दक्षिणी बुंदेलखण्ड मे थे। दमोह जिले के दक्षिणी भाग में सिंगोरगढ का किला गजसिंह प्रतिहार ने बनवाया था। इन्हे कलचुरियों की मदद रहती थी। कलचुरियों के कमजोर पडने पर इन्होने चंदेलों का आधिपत्य स्वीकार कर लिया।

ग्वालियर के शासक महीपक्षदेव प्रतिहार (वि.सं. 1186) के दो पुत्र थे। बडे पुत्र कीर्तिदेव तो ग्वालियर की गद्दी पर रहे तथा छोटे पुत्र जुझारदेव को आधा राज्य मऊ सहानियां की गद्दी मिली। इन्होने नए राज्य का गठन किया जो जुझौति प्रदेश कहलाया।

इसी प्रदेश के उसर पुनीत , दर्षाण , जेजाकभुक्ति और बुंदेलखंड आदि नाम हुए। जुझारदेव के बडे पुत्र अमरदेव का कन्नौज के गहरवार शासक जयचंद की भतीजी तथा हरिशचंद्र की पुत्री से विवाह हुआ। जुझारदेव के बाद विं.सं. 1219 मे अमरदेव जुझौति के शासक हुए। इन्होने सूर्य पूजा का प्रचार किया और सरसेठ मे सूर्य मंदिर तथा शिवालय का निर्माण करवाया। जुझारदेव के छोटे पुत्र ध्रांगचंद्र को बडागांव की जागीर मिली, तत्पश्चात इनके वंशज अलीपुरा गये।

अमरदेव के प्रतापी पुत्र रामदेवजू ने विं.सं.  1238  में चैत्र रामनवमी को रामगढ़ दुर्ग (जिला हमीरपुर उ. प्र.) का निर्माण करवाया। अमरदेव के छोटे पुत्र भुजबलदेव के वंशज उत्तर प्रदेश की हंडिया तहसील के फूलपुर , बीबीपुर , कुमौना , नसरतपुर आदि स्थानों में है, जहां पर भुजबलदेव प्रतिहार ने भर क्षत्रियों को परास्त कर वहाँ के क्षेत्र पर अधिकार कर लिया था। विं.सं. 1254 में रामदेव के पुत्र माधवदेव रामगढ़ शासक हुए, इनके चार पुत्र थे। बडे पुत्र शारंगदेव को ग्वालियर के प्रतिहार शासक कर्णदेव ने गोद लिया। जो ग्वालियर के शासक बने। द्वितीय पुत्र राघवदेव विं. सं. 1286 मे रामगढ़ की गद्दी पर बैठे। तृतीय पुत्र रायदेव ग्वालियर के सेनानायक बने, जिन्हे सिंदोश की जागीर मिली। चतुर्थ पुत्र गुलरदेव को घसाननदी के उस पार डुमरई की जागीर मिली, इनके वंशज परिशचंदपुर (इटावा) के आठ गांवों में आबाद है। इन्हीं में से एक भाई के वंशज अलीराजपुर के राय हुए तथा अन्य वंशज मौहदा तथा पाटनपुर आदि गांवो मे निवास करते है।
 राघवदेव प्रतिहार के बाद रामगढ़ शासकों मे क्रमशः जंगजीत विं.सं. 1323 , शिवचंद्र वि.सं. 1355 , गोविंदजू वि.सं. 1422 आदि रामगढ़ के अधिपति बने। गोविंदजू ने भोजपुर विजय किया। वि.सं. 1452 में रामगढ शासक भारतीचंद ने खंगार क्षत्रियों को परास्त किया। वि. सं. 1496 में पृथ्वीराज रामगढ़ के स्वामी हुए। इनके बाद वि. सं. 1542 में हरिचंद , वि. सं. 1573 ताराचंद , वि. सं. 1599 मे रुपचंद तथा इनके पश्चात कनकसिंह रामगढ़ की गद्दी पर बैठे। वि. सं. 1643 में बसंतराय , वि. सं. 1691 में विक्रमाजीत तथा वि. सं. 1711 मे जिंदमणि एवं इनके पश्चात हंसराज सिंह , खांडेराव और रुद्रप्रताप आदि प्रतिहार शासक रामगढ़ के स्वामी हुए। वि. सं. 1801 मे महासिंह रामगढ़ के नरेश हुए। इनके छोटे भाई संभासिंह कैलोखर के दीवान बने।

पन्ना के बुंदेला शासक हिन्दूपति ने मराठों के सहयोग से वि. सं. 1811 में अचानक रात मे रामगढ़ पर आक्रमण कर दिया और रामगढ़ दुर्ग को ध्वस्त करवा दिया और महासिंह युद्ध मे लडते हुए वीरगति को प्राप्त हुए, इनका परिवार आज भी यही आबाद है और आस पास के क्षेत्रों मे कुल मिलाकर 15, 000 हजार से उपर प्रतिहार राजपूत आज भी आवासित है।
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प्रतिहार/परिहार/पडिहार राजपूत वंश।।

जय मां चामुण्डा
जय नागभट्ट।।
जय मिहिरभोज।।

सौजन्य :- श्री गाजण माता यूथ ब्रिगेड भारत

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शनिवार, 18 अप्रैल 2020

सिंध के प्रतिहार राजपूत

                   -- > सिंध के प्रतिहार < ---------
सिंध मे बसने के कारण ही ये सिंध परिहार कहलाते है। जैसलमेर के यदुवंशी भाटी क्षत्रियों ने इन्हे जाम की पदवी से विभूषित किया था। वर्तमान में ये राजस्थान मे कहीं - कहीं तथा सिंध (पाकिस्तान) और जूनागढ (गुजरात) आदि स्थानों पर निवास करते है एवं ये लगभग दो हजार की संख्या मे आबाद है।

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प्रतिहार/परिहार/पडिहार क्षत्रिय वंश।।
जय नागभट्ट।।
जय मिहिरभोज

सौजन्य - श्री गाजण माता यूथ ब्रिगेड भारत</strong>

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सोमवार, 16 मार्च 2020

क्षत्रिय परिहार/प्रतिहार/पड़िहार/पढ़ियार वंश की कुलदेवी के बारे मे जानकारी देंगें


मित्रो आज आपको क्षत्रिय परिहार/प्रतिहार/पड़िहार/पढ़ियार वंश की कुलदेवी के बारे मे जानकारी देंगें 

प्रतिहार वंश की कुलदेवी मां चामुण्डा जी (गाजणा माता) जी है गाजण माता का पौराणिक ऐतिहासिकता दसवी सदी का प्रख्यात मंदिर राजस्थान के मारवाड के पाली जिले मे है पाली जिले के मुख्यालय से 10किलौमीटर दुरी धर्मधारी गाव मे पहाडी की गुफा मे विराजमान है यहां पर पुरे हिन्दुस्तान से क्षत्रिय प्रतिहार राजपूत आते है।।

धर्मधारी गाव (चौटीला)-इस गाव का इतिहास भी परिहारों से जुडा हुआ है इस गाव की नींव स्थापना सन् 1010 वी  मे मारवाड के महाराव नाहडराव जी प्रतिहार ने की थी नाहडराव जी चामुंडा जी के परमभक्त थे उसके बाद ये गांव माताजी की सेवा के लिये राजपुरोहितो को दान मे दिया परिहारों ने व आज भी इन्ही राजपुरोहितो के वंशज मंदिर की देखरेख व पूजा अर्चना करते है वर्तमान में पुजारी भवरसिंह जी राजपुरोहित है।। 

इस मंदिर के पास हजारो बीघा जमीन है जो माताजी की औरण है व बहुत ही सुन्दर रमणीय क्षेत्र है 
ओम बन्ना भी इसी गाव चौटीला के थे जो मात़ाजी के परमभक्त थे 

प्रसिद किवदन्ती मंदिर के बारे में -  इस मंदिर के बारे मे कहा जाता है कि जब मारवाड (वर्तमान मे जोधपुर ,पाली,नागौर,जालौर,मेडतां,बाडमेर,)के प्रतिहार /पडिहार राजा नाहडराव जी बारात लेकर जा रहे थे तब मंडोर मे विराजमान चामुंडा जी से आग्रह किया कि हे माँ आप भी हमारे साथ बारात मे चले, चामुंडा जी ने कहा कि मुझे कही रुकने का कह दिया तो मैं आगे नही बढुगीं इन्ही वचनों के साथ मां चामुंडा रवाना हुये।।

नाहड़राव जी की बारात जब पाली चोटीला के पास धर्मधारी गाव से होकर गुजर रही थी ढोल, नगाडो, रथों के,विशाल फौज के साथ तब बाडमेर जिले के रमणीया गाव से करपालजी पुरोहित अपने गायों का डेरा डालकर पर्वत के पास गाय चरा रहे थे तब शोर शराबा राव जी के विशाल बारात को देखकर गाये ईधर उधर भागने लगी तब करपालजी ने गायों को रोकने के लिये जैसे ही रुक जा माई रुक जा कहा तो आकाश मे भयंकर गर्जना होने लगी आंधी तुफान आने लगे इतने मे मां चामुंडा जी भयकंर गर्जना के साथ पास की पहाडी को चिरकर गुफा में विराजमान हो गई और नाहडराव जी अनहोनी को स्वीकार करके आगे बढे।।

*चामुंडा-भयंकर गर्जना के साथ विराजमान होने के कारण गाजण माता जी (गाजण मां)नाम से प्रतिहार /परिहार क्षत्रियों की कुलदेवी प्रसिद हुई 

2 दूसरा मंदिर *-गाजण माता जी का दूसरा मंदिर,-  जोधपुर जिले के बेलवा गाव मे पहाडी पे है जो एक चमत्कारिक मंदिर माना जाता है यह मंदिर भी यहा के ईंदा प्रतिहार ठाकुर सा को माताजी ने दर्शन दिये थे।।

3 चामुंडा जी का तीसरा मंदिर-गाजण मा (चामुंडा) का तीसरा मंदिर मेहरानगढ जोधपुर किले मे है। प्रतिहारों के द्वारा राव चूंडा राठौड को मंडोर दहेज देने के बाद राठौड लोग मां चामुंडा को इष्टदेवी के रुप में पूजने लगे। और जब जोधपुर किले का निर्माण हुआ तो इन्हे भी मंडोर से जोधपुर किले में स्थापित किया गया। व साथ मे एक परिहार राजपूत व हडबुजी साथ थे। जोधपुर में मां चामुंडा का यह मंदिर बहुत प्रसिद है। मारवाड की इस देवी ने अपने चमत्कारों से मारवाड के दुशमनों से इस क्षेत्र की रक्षा की है। यहां के सभी वर्गों में माता के प्रति अटूट श्रद्धा है।

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जय चामुंडा।।
जय गाजणा।।
जय मिहिरभोज।।

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