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शुक्रवार, 23 नवंबर 2018

जालौर किले का इतिहास :- क्षत्रिय राजपूत सम्राट नागभट्ट प्रतिहार द्वारा निर्मित

 जालौर किले का इतिहास #









मित्रों आज की इस पोस्ट के द्वारा हम आपको प्रतिहार कालीन सवर्णगिरी पर्वत पर बना जालौर किले के इतिहास के बारे में जानकारी देंगे।।

जालौर राजस्थान के दक्षिणी - पश्चिम में स्थित पूर्व मध्यकाल का एक महत्वपूर्ण स्थल रहा है। जालौर का किला मारवाड़ के महत्वपूर्ण सुदृढ़ किलों में से एक है। 8 वीं शताब्दी अर्थात प्रतिहार काल में इसका निर्माण किया गया था। यह किला हिन्दू पद्धति से बना है। 

जबालिपुर या जालहुर सूकडी नदी के किनारे बना हुआ गिरी दुर्ग है। सोहनगढ एवं सवर्णगिरी कनकाचल के नाम से जाना जाता है। इस दुर्ग का निर्माण 8 वीं शताब्दी में प्रतिहार क्षत्रिय वंश के सम्राट नागभट्ट प्रथम (730 से 760) द्वारा जालौर को देश की राजधानी बनाकर किया गया था। आज तक किसी भी आक्रमणकारी ने आक्रमण के द्वारा इस दुर्ग के द्वार को खोल नहीं पाया। प्रतिहार राजपूतों के जालौर से पलायन पश्चात इस दुर्ग पर बारी बारी से कई शासकों ने राज किया जिसमें परमार, सोनगरा चौहान, खिलजी आदि। पर मूलतः यह किले प्रतिहार वंश का ही है।

# सम्राट नागभट्ट प्रतिहार #

इतिहासकार के.एम.पन्निकर ने अपनी पुस्तक "सर्वे ऑफ़ इंडियन हिस्ट्री "में लिखा है -"जो शक्ति मोहम्मद साहिब की मृत्यु के सौ साल के अंदर एक तरफ चीन की दिवार तक पंहुच गयी थी ,तथा दूसरीऔर मिश्र को पराजित करते हुए उतरी अफ्रिका को पार कर के स्पेन को पद दलित करते हुए दक्षिणी फ़्रांस तक पंहुच गयी थी ,जिस ताकत के पास अनगिनित सेना थी तथा जिसकी सम्पति का कोई अनुमान नही था ,जिसने रेगिस्तानी प्रदेशों को जीता तथा पहाड़ी व् दुर्लभ प्रांतों को भी फतह किया था। 

इन अरब सेनाओं ने जिन जिन देशों व् साम्राज्यों को विजय किया ,वंहा कितनी भी सम्पन्न संस्कृति थी उसे समाप्त किया तथा वंहा के निवासियों को अपना धर्म छोड़ कर इस्लाम स्वीकार करना पड़ा। ईरान , मिश्र आदि मुल्कों की संस्कृति जो बड़ी प्राचीन व विकसित थी ,वह इतिहास की वस्तु बन कर रह गयी। अगर अरब हिंदुस्तान को भी विजय कर लेते तो यहां की वैदिक संस्कृति व धर्म भी उन्ही देशों की तरह एक भूतकालीन संस्कृति के रूप में ही शेष रहता। इस सबसे बचाने का भारत में कार्य नागभट्ट प्रतिहार ने किया। उसने खलीफाओं की महान आंधी को देश में घुसने से रोका और इस प्रकार इस देश की प्राचीन संस्कृति व धर्म को अक्षुण रखा। देश के लिए यह उसकी महान देन है। प्रतिहार/परिहार वंश में वैसे तो कई महान राजा हुए पर सबसे ज्यादा शक्तिशाली नागभट्ट प्रथम एवं मिहिर भोज जी थे जिन्होने अपने जीवन मे कभी भी मुगल और अरबों को भारत पर पैर जमाने का मौका नहीं दिया । इसीलिए आप सभी मित्रों ने कई प्रसिद्ध ऐतिहासिक किताबो पर भी पढा होगा की प्रतिहारों को इस्लाम का सबसे बड़ा दुश्मन बताया गया है।।

इस किले में प्रतिहार कालीन वास्तु शैली, परमार कालीन कीर्ती स्तंभ, कान्हणदेव की बावणी, वीरमदेव की चौकी, जैन मंदिर एवं मल्लिकाशाह की दरगाह आदि वास्तु शिल्प के मुख्य नमूने है।

1311 वीं शताब्दी में अलाउद्दीन खिलजी ने यहां के शासक कान्हणदेव चौहान से बडा ही भयावह युद्ध किया और बडे ही मुश्किल से उन्हें परास्त किया और इस दुर्ग को अपने अधिकार में ले सका। 

दुर्ग में प्रवेश के लिए दो द्वार है मुख्य द्वार को सूरज पोल एवं द्वितीय पिछले द्वार को ध्रुव पोल के नाम से जाना जाता है।


प्रतिहारों का मूल प्रदेश आबू पर्वत अर्थात माउंट आबू था। किवदंती अनुसार इस स्थान से रिषी जी के यज्ञोपवीत संस्कार हुआ तभी प्रतिहार सूर्यवंशी से अग्निवंशी कहलाने लगे। और आंगे के इतिहासकारों ने भी बिना किसी शोध के आंख मूदकर प्रतिहार राजपूतों को हर जगह अग्निवंशी ही बता डाला जिससे समाज में प्रतिहारों के अग्निवंशी होने पर हास्य हुआ। कहा जाता है कि भारत भ्रमण करने से पहले ही यह क्षेत्र गुजरात्रा नाम से जाना जाता था। प्रतिहार सत्ता का विस्तार मण्डौर मेढ़ता से हुआ, जो उन दिनों "मारुमण्ड" कहलाता था जब प्रतिहारों की एक शाखा अर्थात ज्येष्ठ शाखा मण्डौर से जालौर आई तब प्रतिहारों को उनके समकालीन लोग गुर्जर कहने लगे और यही लोग जब स्थांनातरित होकर कन्नौज आये तब गुर्जर - प्रतिहार नाम से विख्यात हुए। 

गुर्जर शब्द गुजरात्रा क्षेत्र से आये हुए लोगो के लिए है न कि किसी जाति से संबंधित है। और न ही प्रतिहार गुज्जर/गुर्जर मूल के है। गुर्जर जाति आजकल प्रतिहारों को शोसल मीडिया पर गुज्जर जाति का बता रही है। प्रतिहार सूर्यवंशी क्षत्रिय है। प्रतिहारों ने अपने नाम के साथ कभी भी गुर्जर शब्द प्रयोग नहीं किया यह केवल कुछ मूर्ख इतिहासकारों की ही उपज है। जिससे यह शुद्ध क्षत्रिय वंश बार बार अपमानित हुआ।

प्रतिहारों के पतन के पश्चात गुजरात्रा क्षेत्र मे जब चालुक्य शक्तिमान हुए तब यही गुर्जर शब्द उनके लिए अगली तीन शताब्दियों तक प्रयुक्त होता रहा। गुर्जरात्रा की सीमा पर स्थित "अणहिल पाटक" गुर्जरपुर और गुर्जर नगर कहा गया है। शनैः शनैः गुर्जर शब्द चालुक्यों द्वारा शासित समूचे भू - भाग के लिए प्रयुक्त होने लगा। प्राकृत में उसी को गुजरात कहा जाने लगा। जालौर में विभिन्न राजाओं का शासनकाल इस प्रकार रहा --

सम्राट नागभट्ट प्रतिहार (730 से 760)
सम्राट ककुक्क प्रतिहार
सम्राट देवराज प्रतिहार
सम्राट वत्सराज प्रतिहार

इस तरह जालौर पर प्रतिहार वंश के चार सम्राटों ने शासन किया एवं संपूर्ण भारत वर्ष पर खलीफाओं (अरब) की आंधी को घुसने से रोका। यही से निकलकर कुछ प्रतिहार शाखा कन्नौज, उज्जैन, ग्वालियर, नागौद के लिए प्रस्थान कर गई और यहाँ कई सौ वर्षों तक शासन किया । जिसमें नागौद प्रतिहार बरमै राज्य मुख्य है जिसने 800 सौ वर्षों तक शासन किया है।

Pratihara / Pratihar / Parihar Rulers of india

Refrence : -
(1) प्रतिहार राजपूतो का इतिहास - लेखक रामलखन सिंह
(2) विंध्य क्षेत्र के प्रतिहार वंश का ऐतिहासिक अनुशीलन - लेखक डॉ अनुपम सिंह
(3) प्रतिहारों का मूल इतिहास - लेखक देवी सिंह मंडावा
(4) ग्वालियर प्रशस्ति - मिहिर भोज
(5) राजपूताने का इतिहास पृष्ठ संख्या 161
(6) राजस्थान का इतिहास पृष्ठ संख्या 954
(7) प्राचीन भारत का इतिहास 1 - 8
(8) राजस्थान थ्रू एजेज पृष्ठ संख्या 339/440 - 441
(9) राजोरगढ़ प्रस्तर अभिलेख वि. स. 1016/959 ई. , एपि इंडिया 111, पृष्ठ 263
(10) ग्वालियर प्रशस्ति - आकयॆलाजी इन ग्वालियर, 1934 ग्वालियर

जय माँ चामुण्डा।।
जय क्षात्र धर्म।।
मंडोर रियासत।।

श्री गाजण माता युथ ब्रिगेड राजस्थान

बुधवार, 21 नवंबर 2018

क्षत्रिय प्रतिहार राजपूत वंश का सम्पूर्ण इतिहास

मित्रों आज की इस पोस्ट के द्वारा हम आपको मण्डौर प्रतिहार वंश के संस्थापक राजा हरिश्चंद्र प्रतिहार जी के बारे में जानकारी देंगे।।

मण्डौर वर्तमान में राजस्थान के जोधपुर जिले मे है यहाँ राठौड़ राजपूतों के आगमन के पहले यह स्थान कभी प्रतिहार राजपूतों के अधीन था और यह प्रतिहारों का सबसे प्राचीन राज्य भी था यही से प्रतिहार/परिहार राजपूत वंशजो की शाखाएँ निकलकर विस्तृत हुई जिनमे जालौर, कन्नौज, उज्जैन, ग्वालियर नागौद, अलीपुरा मुख्य रुप से है यहां आज भी प्रतिहार राजपूत अच्छी संख्या में आबाद है।

550 ईस्वीं के लगभग जोधपुर अंचल में हरिश्चन्द्र प्रतिहार द्वारा स्थापित यहां प्रतिहारों की शाखा है। इसकी राजधानी माण्डव्यपुर थी। भीनमाल जोधपुर तथा घटियाला अभिलेखों द्वारा इस शाखा के ग्यारह शासकों की जानकारी मिली है। राजा विप्र हरिश्चंद्र वेदशास्त्र पारंगत प्रतिहार/परिहार वंश के गुरु अर्थात पूर्वज थे। राजशेखर महेन्द्रपाल को 'रघुकुलतिलक' और रघुग्रामणी तथा महिपाल रघुवंशमुक्तामणि जैसे विशेषण देता है। श्री ए.के. व्यास का कथन है कि "विप्र" शब्द क्षत्रिय राजाओं के लिए रीषि अर्थ में प्रयोग किया गया है। यह क्षत्रिय वर्ण का था इसी वंश का इतिहास बाद के अभिलेखों में बाउक के जोधपुर अभिलेख और ककुक्क के अभिलेखों से प्राप्त होता है। इनमें दी गई वंशावलियों में अंतिम राजाओं में अवश्य अंतर है, परंतु वंशावली समान है

राजा हरिश्चंद्र बहुत ही योग्य और वीर शासक था इसने लगभग 550 ईस्वीं के लगभग राजपूताना जोधपुर के पास के क्षेत्र पर अपना अधिकार स्थापित किया और मण्डौर को अपनी राजधानी बनाया। बाउक के जोधपुर अभिलेख के अनुसार राजा हरिश्चंद्र ने मण्डौर नामक स्थान पर शत्रुओं को आतंकित करने वाला दुर्ग भी बनवाया। राजा हरिश्चंद्र की दो पत्नियां थी पहली बडी पत्नी से सहचरी देवी से चार पुत्र भोजभट्ट, कक्क, रज्जिल, दद्द उतपन्न हुए। इन क्षत्रिय कुमारों ने मण्डौर का दुर्ग जीतकर उसकी प्राचीरों को ऊँचा किया।

घटियाला अभिलेख से ज्ञात होता है कि प्रतिहार वंश की परंपरा तीसरे भाई रज्जिल प्रतिहार से प्रारंभ हुई। इस प्रकार प्रतिहार सत्ता का प्रारम्भ "मण्डौर - मेढ़ता " से हुआ। संभवतः रज्जिल के बाद नगभट्ट प्रतिहार (600 - 625) हुआ।

नगभट्ट प्रतिहार ने मेदांतपुर को अपनी राजधानी बनाया।उसके पुत्र तट और भोज दोनो क्रमशः 675 ईस्वीं तक राज्य किया। तट के पराक्रमी पुत्र यशोवर्धन ने शालवंशी प्रथुवर्धन को पराजित किया जिससे वह पूर्व में हार गया था।।

यशोवर्धन के बाद कंदुक गद्दी पर बैठा। कंदुक ने उतराधिकारी शीलुक ने भट्टी देवराज को परास्त किया। शीलुक के ही शासनकाल में अरब आक्रमणकारी जुनैद आया था। उसके पश्चात (750 - 825) ईस्वीं के मध्य क्रमशः जोट भिलदित्य और कक्क इस वंश में हुए। कक्क ने कन्नौज मालवा शाखा के शासक नागभट्ट द्वितीय के साथ मिलकर गौड़ नरेश को पराजित किया। 837 ईस्वीं के जोधपुर अभिलेख में प्रतिहार वंश से संबंधित विस्तृत जानकारी प्राप्त हुई।  प्रतिहार के बाद उसका सौतेला भाई कक्कुक गद्दी पर बैठा। प्रतिहार राजपूतों के उत्तर भारत में कई राज्य थे। जिनमें अलग अलग प्रतिहार नरेश शासन करत थे। लेकिन वह सभी मण्डौर से ही संबंधित थे। प्रतिहारों की भारत में ज्येष्ठ गद्दी एवं प्राचीन राज्य मण्डौर है। क्योंकि जितने भी प्रतिहार राजपूत है भारत में उन सभी के पूर्वज मण्डौर के ही वंशज है। मण्डौर के बाद भारत मे प्रतिहार राजपूतों की सबसे बडी रियासत नागौद बरमै राज्य है जो 1950 तक काबिज रही यहां आज भी 20 से 25 हजार प्रतिहार निवास करते हैं।

प्रतिहार वंश के महान राजा

(1) राजा हरिश्चंद्र प्रतिहार
(2) राजा नागभट्ट प्रतिहार
(3) राजा यशोवर्धन प्रतिहार
(4) राजा वत्सराज प्रतिहार
(5) राजा नागभट्ट द्वितीय प्रतिहार
(6) राजा मिहिर भोज प्रतिहार
(7) राजा महेन्द्रपाल प्रतिहार
(8) राजा महिपाल प्रतिहार
(9) राजा विनायकपाल प्रतिहार
(10) राजा महेन्द्रपाल द्वितीय प्रतिहार
(11) राजा विजयपाल प्रतिहार
(12) राजा राज्यपाल प्रतिहार
(13) राजा त्रिलोचनपाल प्रतिहार
(14) राजा यशपाल प्रतिहार
(15) राजा वीरराजदेव प्रतिहार (नागौद राज्य के संस्थापक )

भारत के शौर्य एवं बलिदान की भावभूमि वाले इतिहास में क्षत्रियों का प्रतिहार वंश मण्डौर, उज्जैन, ग्वालियर, कन्नौज, नागौद आदि को एक के बाद एक अपनी शक्ति का केंद्र बनाकर सदियों तक पूरे उत्तरी भारत पर शासन करता रहा खासकर मारवाड़ मे सीहाजी के पाली प्रवेश से पूर्व तथा प्रवेश के बाद तक मण्डौर पर प्रतिहारों का एकछत्र शासन रहा है। वि. सं. 1300 (ईस्वी सन 1243) पूर्व तक प्रतिहार ही मारवाड़ के शासक थे।
प्रतिहारों का इतिहास व शासन कोई एक - दो शताब्दियों का नहीँ होकर सैकड़ो शताब्दियों का है। अतः इनके इतिहास में अंतराल व भ्रांतियाँ आना स्वाभाविक ही है।

प्रतिहार सूर्यवंशी क्षत्रिय है जो कि अयोध्या के नरोत्तम राजा रामचंद्र के अनुज लक्ष्मण के वंशज है। क्योंकि वनवास के काल में लक्ष्मण ने राम और सीता जी के प्रतिहार (द्वारपाल) का कार्य किया था। अतः उन्हें प्रतिहार की उपाधि से विभूषित किया गया था। यह मत मरुनरेश बाउक प्रतिहार के नौवीं सदी के शिलालेखों में भी वर्णित है।

राजा मिहिर भोज की ग्वालियर प्रशस्ति में वि. सं. 900 में प्रतिहार राजपूतों को सुमित्रा पुत्र लक्ष्मण का वंशज बताया गया है।

सौमित्रिस्तिव्रदंड : प्रतिहरण विधेर्य: प्रतिहार आसीत।।

बाउक प्रतिहार के नौवीं शताब्दी के शिलालेखानुसार --

स्वभ्राता रामभद्रस्य प्रतिहायॆ कृतयत:।।
श्री प्रतिहार बडशोययतशचोतिमानुयात।।

मित्रों ऐसे हजारों शिलालेखों और अभिलेखों मे प्रतिहार राजपूतों को सूर्यवंशी क्षत्रिय बताया है। क्योंकि अग्नि और सूर्य एक समान है जिस कारण ही प्रतिहार/परिहार राजपूत अग्निवंशी भी कहलाते है। पर यह मूलतः सूर्यवंशी क्षत्रिय है।
== प्रतिहार क्षत्रिय वंश की शाखाएँ ==

(1) डाभी
(2) बडगुजर (राघव)
(3) मडाढ और खडाढ
(4) इंदा
(5) लल्लुरा / लूलावत
(6) सूरा
(7) रामेटा / रामावत
(8) बुद्धखेलिया
(9) खुखर
(10) सोधया
(11) चंद्र
(13) माहप
(14) धांधिल
(15) सिंधुका
(16) डोरणा
(17) सुवराण
(18) कलाहँस
(19) देवल
(20) खरल
(21) चौनिया
(22) झांगरा
(23) बोथा
(24) चोहिल
(25) फलू
(26) धांधिया
(27) खखढ
(28) सीधकां
(29) कमाष / जेठवा
(30) सिकरवार

नोट : - (1) प्रतिहारों / परिहारों का दामन हमेशा ही उज्जवल रहा है इस क्षत्रिय कौम ने मुगलों के साथ कभी भी वैवाहिक संबंध नहीं जोडे। अपने बुरे समय में भी आन - मान को कायम रखा। इन्होने अपनी तलवार से मलेच्छों और अरबों को काटा है परंतु शर्मनाक संधियां करके अपनी जाति को मलीन नहीं किया।

(2) मित्रों आज कल एक गंभीर समस्या हम प्रतिहार राजपूतों के सामने आ गई है कुछ शूद्र जातियां जिसमें मुख्य रुप से गुज्जर/गुर्जर आजकल सम्राट मिहिर भोज प्रतिहार जी को गुज्जर घोषित करने मे लगे हैं एवं प्रतिहार वंश को गुज्जर मूल का बता रही है। इन गुज्जरो ने दिल्ली में मिहिर भोज की मूर्तियां स्थापित कर और राष्ट्रीय राजमार्ग का नामकरण कर बेवजह बिना ऐतिहासिक जानकारी इन्हे गुर्जर बता रहे। पर इन्हे ये नही पता है कि मिहिर भोज प्रतिहार के वंशज नागौद राज्य के प्रतिहार राजपूत है मित्रों मिहिर भोज प्रतिहार कन्नौज को देश की राजधानी बनाकर 50 वर्षो तक शासन किया। इनके मृत्यु के बाद कुछ वर्षों तक इनके पुत्र महेन्द्रपाल प्रतिहार ने शासन किया। फिर गजनी के मोहम्मद ने कन्नौज पर आक्रमण कर नगर जलाकर अपने राज्य मिला लिया था महेन्द्रपाल और उनकी छोटी सेना सामना न कर विंध्य क्षेत्र (बुंदेलखण्ड) यहाँ आ गये थे। फिर परिहार दल ने व्यारमा नदी के तट पर भगवान शिव का ध्यान पूजन कर मंदिर का निर्माण किया और एक नये राज्य की स्थापना की जिसका नाम बरमै राज्य रखा। नागौद प्रतिहार वंश की गद्दी आज भी बरमै गद्दी के नाम से जानी जाती है।

(3) मित्रों आज कल प्रतिहार मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ में परिहार के नाम से जाने जाते है एवं राजस्थान के प्रतिहार आजकल पडिहार एवं गुजरात के प्रतिहार लोग पढियार नाम से जाने जाते है।

(4) मित्रों प्रतिहार, परमार, चौहान, सोलंकी ये चारों सूर्यवंशी क्षत्रिय है। अनपढ चारणों और भाटों की वजह से हमे अग्निवंशी बताया गया है।

(5) प्रतिहार वंश शुद्ध क्षत्रिय वंश है। जिसने गुर्जरात्रा प्रदेष में राज्य किया और हूणों के साथ भारत आये गुज्जर चोरों को अपने राज्य से बाहर किया। यही से निकलकर प्रतिहार राजपूतों की ज्येष्ठ शाखा गुर्जर प्रतिहार एवं बडगुजर कहलाई। इसी का फायदा उठाकर गुज्जर आजकल प्रतिहार वंश को गुज्जर मूल का बता रही है। पर इसमें कोई सच्चाई नहीं है। ये बस आरक्षण और थोडी सी समृद्धि मिलने से है। खाली मिहिर भोज मे दाल नही गली तो पूरे प्रतिहार/परिहार वंश को ही गुज्जर घोषित करने मे लगे हैं। खासकर दिल्ली के गुज्जरों को लगता था कि प्रतिहार राजपूत तो अब है नहीं कही क्यों न इनके नाम से ही श्रेष्ठता पाई जाये इन्हें गुज्जर बताकर पर ये मूरख न जाने की उतर और मध्य भारत मे अच्छी संख्या में प्रतिहार और उनकी शाखाएँ निवास करती है।

Pratihara / Pratihar / Parihar Rulers of india

Refrence : -
(1) प्रतिहारों का मूल इतिहास लेखक - देवी सिंह मंडावा
(2) विंध्य क्षेत्र के प्रतिहार वंश का इतिहास लेखक - डा अनुपम सिंह
(3) परिहार वंश का प्रकाश लेखक - मुंशी देवी प्रसाद
(4) नागौद परिचय लेखक - जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी
(5) मण्डौर का इतिहास लेखक - श्री सिंह

जय चामुण्डा देवी।।
जय मां गाजण
जय मिहिरभोज प्रतिहार
जय नागभट ‌‌‌‌‌प्रतिहार
नागौद रियासत


श्री गाजण माता युथ ब्रिगेड राजस्थान

लुलावत पड़िहार (प्रतिहार)

लुलावत पड़िहार (प्रतिहार)

राजस्थान में पड़िहारो के काफी संख्या में गांव है जो कि मूल रूप से लुलावत ही है परंतु समय के साथ-साथ अपने पूर्वजों के नाम से उप शाखाओं में में विभक्त होते गए संघन घनत्व की दृष्टि से अवलोकन किया जाए तो रतनसिंघोत लुलावतो की तादाद सबसे ज्यादा हैं बीकानेर तहसील का बेलासर गांव पूरे राजस्थान में इनका सबसे बड़ा गांव है तथा द्वितीय श्रेणी पर पोकरण तहसील का गांव छायण आता है इन दो गांवों के अतिरिक्त इस गोत्र के पड़िहार बीकानेर, रतनगढ़, हुडेरा, सूरतगढ़, नोहर, दून्कर, गोपालसर, धीऀगधाणिया, जाजीवाल, बावरला, जालेली, घुड़ला, व कोलार (पंजाब) आदि गांवों में आबाद है 
उपरोक्त गांवों के अलावा राजस्थान के बहुत से दूसरे गांवों में लुलावत पड़िहारो की अन्य उपशाखाएं भी आबाद हैं जैसे कि - उदासर (बीकानेर), दुलचासर, सूरतसिंहपुरा, सुरधना पड़िहारान, मेहरासर, खारड़ा, नापासर, नांदड़ा, अमरपुरा भाटियान, इत्यादि एवं डूंगरगढ, सरदारशहर, नोखा, नागौर, ओसिया, शेरगढ़ तहसीलो के कुछ गांवों में भी आबाद है
 उपरोक्त कुछ गांवों में उदयसिंघोत और कुछ गांवों में नादावत व किसी किसी गांव में रामोटा (रामावत) पड़िहार भी आबाद है तथा मूल रूप से अवलोकन किया जाए तो यह सभी लुलावत पड़िहारो से ही निकली हुई उपशाखाएं हैं (सिर्फ रामोटा पड़िहारो को छोड़कर)

श्री गाजण माता युथ ब्रिगेड राजस्थान

कुचामन का किला राजस्थान के नागौर में स्थित है। यह किला राजस्थान के सबसे पुराने किलों में से है। यह किला पर्वत के सबसे ऊपरी हिस्से पर स्थित है जैसे के एक चील का घोंसला होता है । इसका निर्माण गुर्जर प्रतिहार वंश के महान क्षत्रिय राजपूत सम्राट नागभट्ट प्रथम ने 750 ईo में कराया।। 

गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य का संस्थापक "क्षत्रिय राजपूत सम्राट नागभट्ट प्रतिहार" द्वारा निर्मित यह किला राजस्थान में है। गुर्जर प्रतिहार वंश के शासनकाल में ऐसे कई किलो का निर्माण हुआ जिसमे मण्डौर, जालौर, कुचामन, कन्नौज, ग्वालियर के किले गुर्जर प्रतिहार राजाओं के अत्यधिक मात्रा में समृद्धि होने के 

का प्रमाण देते है। छठवीं शताब्दी से लेकर ग्यारहवीं शताब्दी तक इस प्रबल क्षत्रिय प्रतिहार राजवंश ने हिन्दू धर्म को भारत से विलुप्त होने से बचाया है। लेकिन इनके कर्ज का बदला इनके इतिहास को विलुप्त करके दिया हमारे देश मे । 


300 वर्षो तक अगर विदेशी अरबों की आंधी को रोकने का पूर्णतयः श्रेय अगर किसी को जाता है तो वह केवल गुर्जर प्रतिहार राजवंश को है जिसने हरिश्चन्द्र, नागभट्ट, वत्सराज, मिहिरभोज, महेन्द्रपाल, महीपाल, वीरराजदेव जैसे वीर क्षत्रिय  योद्धा दिये। भारत और भारत के वासी सदैव ही इस प्रतिहार राजपूत वंश के रिणी रहेगें। धन्य है ऐसे राजवंश को जिसने देश की रक्षा हेतु अपने प्राण न्यौछावर करदिए । कुचामन का किला अपने प्रखर और भीमकाय परकोटो, 32 दुर्गों, 10 द्वारो और विभिन्न प्रतिरोधक क्षमता वाला किला है। यह एकमात्र अनोखी वास्तुकला वाला किला है। इस किले में जल संरक्षण और प्रबंधन के अच्छे इंतेजाम है।।


किले में कई भूमिगत टैंक आज भी विद्यमान है   कुचामन किले में कई भूमिगत गुप्त ठिकाने, प्राचीन अंधकूप, कारागार हैं जिन्हें आज भी देखा जा सकता है। वर्तमान मे अब ये हेरिटेज होटल में तब्दील हो गया है और यहा बौलीवुड फिल्मो की सूटिंग होती है।

 जय मां भवानी
जय नागभट प्रतिहार

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श्री गाजण माता युथ ब्रिगेड राजस्थान