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रविवार, 29 सितंबर 2019

आबू पर्वत पर अग्निकुण्ड से कैसे उत्पन्न हुये थे क्षत्रिय ? प्रतिहार,परमार,सोलंकी,चौहान

आबू पर्वत पर अग्निकुण्ड से कैसे उत्पन्न हुये थे क्षत्रिय ?

आबू पर्वत में क्षत्रियों की उत्पत्ति के बारे में अक्सर सुनने पढने को मिलता है कि क्षत्रिय राजस्थान में आबू पर्वत पर आयोजित यज्ञ से उत्पन्न हुये है पर क्या यज्ञ के अग्निकुण्ड से मानव की उत्पत्ति संभव है ? यदि नहीं तो फिर यह कहानी व मान्यता कैसे प्रचलित हुई ? क्षत्रियों की अग्निकुंड से उत्पत्ति के पीछे प्रचलित इस कहानी के पीछे कुछ तो ऐसा होगा जिसकी वजह से यह कहानी प्रचलित हुई और अग्निवंश और अग्निकुंड से क्षत्रियों की उत्पत्ति को मिथ बताने वाले इतिहासकारों व विद्वानों ने भी क्षत्रियों को अग्नि द्वारा शुद्ध करने की बात को मान्यता देते हुए अपनी बात को अपरोक्ष रूप से काट कर इस प्रचलित कहानी को मान्यता दे डाली है|

इतिहासकार और विद्वान ओझा, वैद्य और गांगोली के अलावा सभी विद्वानों ने अग्निवंश की मान्यता को प्रत्यक्ष नहीं तो परोक्ष रूप से स्वीकार किया है| इसी कहानी पर राजस्थान के इतिहासकार श्री देवीसिंह जी मंडावा लिखते है कि – “जब वैदिक धर्म ब्राह्मणों के नियंत्रण में आ गया था और बुद्ध ने इसके विरुद्ध बगावत कर अपना नया बौद्ध धर्म चलाया तो शनै: शनै: क्षत्रिय वर्ग वैदिक धर्म त्यागकर बौद्ध धर्मी बन गया| क्षत्रियों के साथ साथ वैश्यों ने भी बौद्ध धर्म अंगीकार कर लिया|

क्षत्रियों के बौद्ध धर्म ग्रहण करने के पश्चात उनकी वैदिक परम्परायें भी नष्ट हो गई और वैदिक क्षत्रिय जो कि सूर्य व चंद्रवंशी कहलाते थे, उन परम्पराओं के सम्राट हो गये तथा सूर्य व चन्द्रवंशी कहलाने से वंचित हो गये| क्योंकि ये मान्यतायें और परम्परायें तो वैदिक धर्म की थी जिन्हें वे परित्याग कर चुके थे| यही कारण है कि ब्राह्मणों ने पुराणों तक में यह लिख दिया कलियुग में ब्राह्मण व शुद्र ही रह जायेंगे व कलियुग के राजा शुद्र होंगे, बौद्ध के अत्याचारों से पीड़ित होकर ब्राह्मणों ने बुद्ध धर्मावलम्बी क्षत्रिय शासकों को भी शुद्र की संज्ञा दे डाली| दुराग्रह से ग्रसित हो उन्होंने यह भी लिख दिया कि कलियुग में वैश्य और क्षत्रिय दोनों लोप हो जायेंगे|

उस काल में समाज की रक्षा करना व शासन चलाना क्षत्रियों का उतरदायित्व था, चूँकि वे बौद्ध हो गये थे अत: वैदिक धर्म की रक्षा का जटिल प्रश्न ब्राह्मणों के सामने उपस्थित हो गया| इस पर ब्राह्मणों के मुखिया ऋषियों ने अपने अथक प्रयासों से चार क्षत्रिय कुलों को वापस वैदिक धर्म में दीक्षित करने में सफलता प्राप्त कर ली| आबू पर्वत पर यज्ञ करके बौद्ध धर्म से वैदिक धर्म में उनका समावेश किया गया| यही अग्निकुंड का स्वरूप है| वे प्राचीन सूर्यवंशी व चन्द्रवंशी ही थे इसलिए बाद में शिलालेखों में भी तीन वंश अपने प्राचीन वंश का हवाला देते रहे लेकिन परमारवंश ने प्राचीन वंश न लिखकर अपने आपको अग्निवंश लिखना शुरू कर दिया|

कुमारिल भट्ट ई.७०० वि. ७५७ ने बड़ी संख्या में बौद्धों को वापस वैदिक धर्म में लाने का कार्य शुरू किया जिसे आगे चलकर आदि शंकराचार्य ने पूर्ण किया| अत: इन चार क्षत्रिय वंशों को वैदिक धर्म में वापस दीक्षा दिलाने का कार्य उसी युग में होना चाहिए| आबू के यज्ञ में दीक्षा का एक ऐतिहासिक कार्यक्रम था जो ६ठी या ७वीं सदी में हुआ है| यह कोई कपोल कल्पना या मिथ नहीं था बल्कि वैदिक धर्म को वापस सशक्त बनाने का प्रथम कदम था जिसकी स्मृति में बाद में ये वंश अपने आपको अग्निकुंड से उत्पन्न अग्निवंशी कहने लग गये| आज भी आबू पर यह यज्ञ स्थल मौजूद है|”

मुग़ल इतिहासकार अबुलफजल ने भी “आईने अकबरी” में इसी मान्यता का उल्लेख किया है| उसने यज्ञ का समय वि. ८१८ दिया है| वंश भास्कर में भी बौद्धों के उत्पात मचाने से उनका दमन करने हेतु अग्निकुल वालों को उत्पन्न किया जाना माना गया है| अबुलफजल के समय किन्हीं प्राचीन ग्रंथों अथवा मान्यताओं से विदित होता है कि ये चारों (प्रतिहार, सोलंकी, परमार और चौहान) वंश बौद्ध धर्म का परित्याग कर वापस अपने पूर्व वैदिक धर्म में लौट आये थे|

चूँकि बौद्ध धर्म अपना चुके क्षत्रियों का वापस धर्म परिवर्तन करने व वैदिक धर्म में दीक्षित करने हेतु यज्ञ कर शुद्धिकरण करने को क्षत्रियों को यज्ञ के अग्निकुंड से उत्पन्न माना जाने की मान्यता प्रचलित हो गयी और धीरे धीरे कहानियां बन गई कि – क्षत्रिय आबू पर्वत पर अग्निकुंड से पैदा हुए थे| जबकि इसी धरा पर मौजूद बौद्ध धर्म में दीक्षित चार क्षत्रिय वंश (प्रतिहार, सोलंकी, परमार और चौहान) यज्ञ के अग्निकुंड के पास बैठ वापस वैदिक धर्म में दीक्षित हुये|

जय मिहिरभोज।।
जय राजपूताना।।

गुरुवार, 12 सितंबर 2019

लक्ष्मणवंशी प्रतिहारों का शिलालेख **अग्निवंश

** लक्ष्मणवंशी प्रतिहारों का शिलालेख **अग्निवंश

मित्रों यह वो शिलालेख है जिसमे राजा मिहिरभोज प्रतिहार , राजा वत्सराज प्रतिहार, राजा बाउक प्रतिहार एवं राजा ककुक्क प्रतिहार को इच्छवाकु कुल का एवं सुमित्रा नंदन लक्ष्मण जी का वंशज बताया है। प्रतिहार इच्छवाकु कुल के सूर्यवंशी क्षत्रिय है और यह प्रमाणित है।।

कुछ विदेशी हठधर्मी है जो इन्हें बदनाम करने की साजिस कर रहे है। प्रतिहार क्षत्रियों ने अपने को कही भी और कभी भी गुर्जर मूल का नही माना है। यह केवल प्रतिहारो के दुश्मनों की सोची समझी चाल थी बदनाम करने की अगर कही भी लिखा मिला है

उसकी वजह है कि वह गुर्जरात्रा प्रदेष पर शासन किया और वहां के राजाओं को गुर्जराज और गुर्जरेश्वर की उपाधि मिली जैसे महाराष्ट्र में रहना वाला हर व्यक्ति मराठा नही है , बंगाल में रहने वाले हर व्यक्ति बंगाली नही होते। वैसे ही गुर्जरात्रा प्रदेष पर अनेक क्षत्रियों ने शासन किया जिसमे चावडा, सोलंकी, राठौड़,परमार, गोहिल, प्रतिहार तो क्या ये गुर्जर मूल के थे।सभी क्षत्रिय अलग अलग वंश के थे जिसमे प्रतिहार लक्ष्मणवंशी  अर्थात सूर्यवंशी क्षत्रिय थे।।

जिसको अब भी समझ नही आ रहा हो की प्रतिहार गुर्जर मूल के है वह उज्जैन सिंहस्थ  जाकर डूब कर मर जाये। मनुस्मृति में प्रतिहार ,परिहार एक ही शब्द है जिनका अर्थ होता है "रक्षक"  प्रतिहार के ही पर्यायवाची है परिहार, पडिहार है। चूतिये थोडा और पढ लेता तो सत्य का ज्ञान हो जाता तुझे और तेरे गाडर समाज को

मिहिरभोज प्रतिहार को भगवान मानने वालो उनकी जयंती मनाओ पर गुर्जर बताकर नही सच्चाई बताकर और वह तुम लोग करोगे नहीं क्योंकि तुम लोगो ने अपने समाज को इतना गुमराह कर दिया है। जिससे वह मिहिरभोज को तो जानते है पर उनके इतिहास और उनके वर्तमान वंशज नागौद राज्य के प्रतिहार राजपूतों को नही जानते हैं।

नागौद रियासत की नींव सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार के वंशज महाराजाधिराज वीरराजदेव प्रतिहार ने डाली थी। कन्नौज पर 1036 ईस्वीं  में मोहम्मद गजनवी ने आक्रमण किया था उस समय यहां पर प्रतिहार नरेश त्रिलोचनपाल शासन कर रहे थे। गजनवी की लाखो सेना और प्रतिहार राजपूतों की हजारो सेना का मुकाबला हुआ जिसमे हावी रहे जिससे प्रतिहारों को कन्नौज छोड़ना पडा।।

कन्नौज को छोडने के बाद प्रतिहार दल बुंदेलखण्ड की ओर पलायन कर गये कुछ वर्ष पश्चात यहां की व्यारमा नदी पर शिव का मंदिर बनवाया और एक नये राज्य की स्थापना की जिसका नाम वरमै राज्य रखा। यहीं की एक ज्येष्ठ शाखा में वीरराजदेव प्रतिहार पुत्र विशालदेव प्रतिहार हुए जो बहुत ही पराक्रमी शासक थे। उनहोंने स्वयं का राज्य स्थापित करने की ठानी और चुने हुए साथियों के साथ निकल पडे।

सिंगोरगढ़ जो जबलपुर के पास है यह प्रतिहारों का छोटा सा राज्य था जहां के प्रतिहार राजा कोतपाल देव ने वीरराजदेव की बुद्धिमता वीरता और पराक्रम को देखकर अपनी सेना में सेनापति का पद दिया। कोतपाल वृद्ध थे और निःसंतान थे। लिहाजा उनहोंने अपने राज्य का उत्तराधिकारी वीरराजदेव प्रतिहार को घोषित कर दिया।।

लगभग दस वर्ष के शासनकाल में वीरराजदेव प्रतिहार ने यहां के किले के परकोटे को और मजबूत किया कई गढिया , बावली का भी निर्माण किया। उस समय देश मे तुगलक वंश बहुत ही हावी था मोहम्मद तुगलक की नजर सिंगोरगढ़ पर पढी और उसने यहां अचानक हमला कर दिया। अचानक हमले से प्रतिहार लोग संभल नही पाये और यह सिंगोरगढ़ राज्य छोडना पडा।

वीरराजदेव प्रतिहार और उनका प्रतिहार दल  सिंगोरगढ़ को छोड कैमोर की पहाडी होते हुए उच्चकल्प (उचेहरा) आये यहीं एक गढी मे तेली लोग डेरा डाले हुए थे और प्रजा के साथ लूटपाट कर उनहें आतंकित कर रखा था। वीरराजदेव प्रतिहार को यह जानकारी मिलते ही उनहोंने तेली लोगो पर हमला कर दिया।

तेली लोग अचानक हमले से कुछ समझ नही पाये और कुछ मारे गये और कुछ भाग गये।
प्रतिहार दल को गढी में काफी धन संपदा मिली जिससे यही पर रुककर राज्य स्थापित करने का निर्णय कर स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। कई वर्षों तक प्रतिहार राजपूतों की मुख्य राजधानी उंचेहरा थी राज्य का विस्तार हो रहा था तो मध्य मे एक ओर किले की जरुरत महसूस हुई

नागबध जो आज नागौद के नाम से जाना जाता है। उचेहरा से 40 किलोमीटर दूर है उचेहरा के महाराज चैन सिंह ने 1720 ईस्वीं में अमरन नदी के तट पर एक भव्य किले की नीव रखकर प्रतिहारो की राजधानी उचेहरा से उठाकर नागौद ले आये और राज्य की शासन व्यवस्था यही से देखी जाने लगी।। नागौद की राजगद्दी बरमै गद्दी के नाम से ही जानी जाती है।।


नागौद के प्रतिहारों के पूर्वज कन्नौज से थे तो उसी वजह से यहां के लोग इनहे कन्नौजिया प्रतिहार भी कहते है। नागौद रियासत भारत में प्रतिहार राजपूतों की सबसे बडी रियासत है। यहां अन्य जगहों से ज्यादा प्रतिहार लोग निवास करते है आज भी नागौद राज्य से बंटवारो से उचेहरा, सतना, रीवा, शहडोल, उमरिया,  मैहर, अमरपाटन, रामपुर बाघेलान मे निकलकर लगभग 200 गांवो मे लगभग 20 हजार प्रतिहार राजपूत लोग निवास करते है।

नागौद राज्य प्रतिहार राजपूतों की शान का प्रतीक है यहां से कई प्रतिहार प्रतिभाये देश विदेश जाकर अपना और समाज का नाम किया है। यहीं नागौद राजपरिवार के पूर्व स्वर्गीय महाराजा महेन्द्र सिंह जी के पुत्र महाराज कुमार नागेन्द्र सिंह जी जो पूर्व मंत्री (P.W.D.) एवं वर्तमान खजुराहो (म.प्र.) लोकसभा से सांसद है और खजुराहो लोकसभा से दो लाख पचास हजार वोटों से अपने प्रतिदंद्वी को हराया था। नागेन्द्र सिंह जी प्रतिहार ही नही समस्त क्षत्रिय समाज के गौरव है। नमन है ऐसे राजनीतिक योद्धा को जिसने बेदाग छवि के साथ सर्वसमाज के हित के लिए कार्य किये और करते आ रहे है।

लक्ष्मणवंशी प्रतिहार।।
सूर्यवंशी क्षत्रिय।।
इच्छवाकु कुल।।
जय क्षात्र धर्म।।