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गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

बुंदेलखण्ड और जूझौति के प्रतिहार

----- > बुंदेलखण्ड और जूझौति के प्रतिहार < -----

प्रतिहार क्षत्रियों के कई राज्य दक्षिणी बुंदेलखण्ड मे थे। दमोह जिले के दक्षिणी भाग में सिंगोरगढ का किला गजसिंह प्रतिहार ने बनवाया था। इन्हे कलचुरियों की मदद रहती थी। कलचुरियों के कमजोर पडने पर इन्होने चंदेलों का आधिपत्य स्वीकार कर लिया।

ग्वालियर के शासक महीपक्षदेव प्रतिहार (वि.सं. 1186) के दो पुत्र थे। बडे पुत्र कीर्तिदेव तो ग्वालियर की गद्दी पर रहे तथा छोटे पुत्र जुझारदेव को आधा राज्य मऊ सहानियां की गद्दी मिली। इन्होने नए राज्य का गठन किया जो जुझौति प्रदेश कहलाया।

इसी प्रदेश के उसर पुनीत , दर्षाण , जेजाकभुक्ति और बुंदेलखंड आदि नाम हुए। जुझारदेव के बडे पुत्र अमरदेव का कन्नौज के गहरवार शासक जयचंद की भतीजी तथा हरिशचंद्र की पुत्री से विवाह हुआ। जुझारदेव के बाद विं.सं. 1219 मे अमरदेव जुझौति के शासक हुए। इन्होने सूर्य पूजा का प्रचार किया और सरसेठ मे सूर्य मंदिर तथा शिवालय का निर्माण करवाया। जुझारदेव के छोटे पुत्र ध्रांगचंद्र को बडागांव की जागीर मिली, तत्पश्चात इनके वंशज अलीपुरा गये।

अमरदेव के प्रतापी पुत्र रामदेवजू ने विं.सं.  1238  में चैत्र रामनवमी को रामगढ़ दुर्ग (जिला हमीरपुर उ. प्र.) का निर्माण करवाया। अमरदेव के छोटे पुत्र भुजबलदेव के वंशज उत्तर प्रदेश की हंडिया तहसील के फूलपुर , बीबीपुर , कुमौना , नसरतपुर आदि स्थानों में है, जहां पर भुजबलदेव प्रतिहार ने भर क्षत्रियों को परास्त कर वहाँ के क्षेत्र पर अधिकार कर लिया था। विं.सं. 1254 में रामदेव के पुत्र माधवदेव रामगढ़ शासक हुए, इनके चार पुत्र थे। बडे पुत्र शारंगदेव को ग्वालियर के प्रतिहार शासक कर्णदेव ने गोद लिया। जो ग्वालियर के शासक बने। द्वितीय पुत्र राघवदेव विं. सं. 1286 मे रामगढ़ की गद्दी पर बैठे। तृतीय पुत्र रायदेव ग्वालियर के सेनानायक बने, जिन्हे सिंदोश की जागीर मिली। चतुर्थ पुत्र गुलरदेव को घसाननदी के उस पार डुमरई की जागीर मिली, इनके वंशज परिशचंदपुर (इटावा) के आठ गांवों में आबाद है। इन्हीं में से एक भाई के वंशज अलीराजपुर के राय हुए तथा अन्य वंशज मौहदा तथा पाटनपुर आदि गांवो मे निवास करते है।
 राघवदेव प्रतिहार के बाद रामगढ़ शासकों मे क्रमशः जंगजीत विं.सं. 1323 , शिवचंद्र वि.सं. 1355 , गोविंदजू वि.सं. 1422 आदि रामगढ़ के अधिपति बने। गोविंदजू ने भोजपुर विजय किया। वि.सं. 1452 में रामगढ शासक भारतीचंद ने खंगार क्षत्रियों को परास्त किया। वि. सं. 1496 में पृथ्वीराज रामगढ़ के स्वामी हुए। इनके बाद वि. सं. 1542 में हरिचंद , वि. सं. 1573 ताराचंद , वि. सं. 1599 मे रुपचंद तथा इनके पश्चात कनकसिंह रामगढ़ की गद्दी पर बैठे। वि. सं. 1643 में बसंतराय , वि. सं. 1691 में विक्रमाजीत तथा वि. सं. 1711 मे जिंदमणि एवं इनके पश्चात हंसराज सिंह , खांडेराव और रुद्रप्रताप आदि प्रतिहार शासक रामगढ़ के स्वामी हुए। वि. सं. 1801 मे महासिंह रामगढ़ के नरेश हुए। इनके छोटे भाई संभासिंह कैलोखर के दीवान बने।

पन्ना के बुंदेला शासक हिन्दूपति ने मराठों के सहयोग से वि. सं. 1811 में अचानक रात मे रामगढ़ पर आक्रमण कर दिया और रामगढ़ दुर्ग को ध्वस्त करवा दिया और महासिंह युद्ध मे लडते हुए वीरगति को प्राप्त हुए, इनका परिवार आज भी यही आबाद है और आस पास के क्षेत्रों मे कुल मिलाकर 15, 000 हजार से उपर प्रतिहार राजपूत आज भी आवासित है।
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प्रतिहार/परिहार/पडिहार राजपूत वंश।।

जय मां चामुण्डा
जय नागभट्ट।।
जय मिहिरभोज।।

सौजन्य :- श्री गाजण माता यूथ ब्रिगेड भारत

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