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गुरुवार, 7 मई 2020

सूर्यवंशी प्रतिहार राजपूतों की लोहियानागढ रियासत का इतिहास

सूर्यवंशी प्रतिहार राजपूतों की लोहियानागढ रियासत

आज का जसवंतपुरा (भीनमाल)
एक जमाने में लोहियाना गढ़ के नाम से जाना जाता था यहां के तत्कालीन ठाकुर प्रतिहारों की देवल शाखा से थे
 जिनका नाम राणा धागजी प्रतिहार था उनका इकलौता पुत्र नरपालदे देवल अपनी आन  बान शान के लिए जाना जाता था 

 चंद्रावती नगर के सेठ के पुत्र की सगाई उदयपुर हुई यह सगाई भी ठाकुर साहब के कारण ही हुई थी बारात उदयपुर लेकर जाना था और बीच में लुटेरों का कहर था इसलिए सेठ ने राणा साहब को न्योता दिया राणा साहब अस्वस्थ एवं वृद्धावस्था में होने के कारण नहीं जा सके
इसलिए राणा  साहब ने अपने प्रिय साथी एवं वीर योद्धा धूडजी राजपूत को बारात के साथ भेजा जैसे ही बारात बीस के रास्तों झाड़ी जंगलों में पहुंची और लूटेरे आभूषण वगैरह लूटने लगे धूरजी न लुटेरों  को समझाया  और अपना परिचय दिया और लूटेरे डर गए और बारात को जाने दीया बारात उदयपुर पहुंची और धूमधाम से शादी संपन्न हुई और जब बारात वापस लौट रही थी तो लुटेरे पहले से तैयार थे और रास्ता रोक लिया और धूडजी ने लुटेरों को बहुत समझाया पर लुटेरे नहीं माने भीषण युद्ध हुआ और एक एक लुटेरे मरने लगे और खून की नदियां बहने लगी। तब एक लुटेरे ने पीछे से आकर धूडजी पर वार कर दिया इनका सिर धड़ से अलग हो गया बहुत लुटेरे मारे गए और आधे भाग गए अपनी तलवार अंग रखे से पूसी और ठाकुर साहब को अभिवंदन दिया। धुडजी का शरीर नीचे गिर गया और उनकी आत्मा स्वर्ग पहुंच गई। सेठ गढ़ पहुंचा ठाकुर साहब को सारी बात बताई उसी सभा में राणा धागा का 20 वर्षीय युवराज नरपालदे देवल प्रतिहार बैठा था सेठ ने धूडजी की द्वारा तलवार पोसने एवं म्यान में रखने की बात की तब नरपालदे ने टिप्पणी की  धूडजी ने कार्य तो उत्तम किया है पर मरते समय जब जमीन पर गिरे तो तुम कहते हो उस से पहले अपनी तलवार जो आततायियों के रक्त से रंजीत थी जो अपनी अंग रखी के पल्ले से निर्मल कर उसे म्यान की मुझे तो तुम यह बतलाओ की तलवार अंग रखी पल्ले के बाहरी अंश से स्वच्छ की अथवा भीतरवाले भाग से चमकाई अगर अंदर से मांझी थी तब तो निसंदेह वह महान पुरुष था और अगर यदि बार के पहले से रेगड़ी थी तो वह योद्धा ना था नरपालदे का ऐसा कटास करना ठाकुर साहब को अच्छा लगा उन्होंने झुंझला करके कहा ऐसा तो वही करके दिखाएगा कुंवर नरपाल देव ने जोर देखकर दृढ़तापूर्वक कह दिया कि वह ऐसा करके अवश्य दिखाएगा राणा साहब ने भी आवेश में आकर ताना कसा कि वह तो वृद्धावस्था में है कल को मर जाएंगे इस पर उस वीर कुंवर ने कहा कि वह अपने 30 वे वर्ष तक ऐसा करके बता देगा ऐसी विकट स्थिति में राणा साहब ने विचार किया कि कुंवर सत्यवादी है और अपने वचन के अनुसार ही करेगा कोई उपाय करके उसकी जिद को छुड़ाना चाहिए अपने पुत्र को शाबाशी देते हुए राणा साहब ने कहा मैं जानता हूं  तुम एक पराक्रमी नवयुवक हो और जैसा कहा वैसा करके दिखा सकते हो लेकिन मेरे मुंह से अवंती बात निकल गई थी तुम अभी 20 बरस के हो और एक अनोखा निश्चय कर बैठे हो इससे छोड़ दो तथा प्रजा की सेवा करो राजा की मंडली भी समझा-बुझाकर थक गई मगर राजकुमार अपनी बात से टस से मस न हुआ नरपालदे प्रतिहार की एक सहेती बहन थी राणा साहब ने अंत पुर में जाकर अपनी पुत्री को बताया कि वह अपने भाई से कंचुकी के नाम से पास बरस की वर्दी करवा ले इस पर बहन ने भाई को रनिवास में बुलाया दोनों के बीच तनाव व्यस्त वातावरण में सवांद होने लगा
लद
भईया मैं कुछ मांगू देंगे
 हां अवश्य दूंगा
मेरी ताई कांसली समझ भेंट सवरूप आप 5 बरस जीवनकाल बढ़ा दो 35 साल जीवित रहो

इस पर भाई ने हंसकर का बहन मेरी राजपूत अपना वचन तोड़ता नहीं तुमने कांसली के बदले 5 बरस मांगे सो मैंने 30 में से 5 बरस तुझको दिए अब मेरी आयु अधिकतम 25 वर्ष तक की रहेगी अब वही मिले जो करता कि उसने तो 30 से ऊपर 5 वर्ष की अवधि बढ़ाने को कहा था
 नरपालदे ने समझाया 
 बढ़ाने पर तो कांसली का क्या दिया वृद्धि से तो लेना हो गया वह तो ले लिया कहां आएगा सो ऐसा पापी नरपाल दे नहीं हो सकता अपने अधिकार में जो कुछ हो उसी में से दिया जाता है सोडा हुआ वह दिया हुआ का उल्लंघन करो या सुवासिनी का दान लेऊ यह दोनों कार्य नरक में ले जाने वाले हैं इन्हें मैं कभी नहीं करूंगा मैं प्रण में बंधा हूं संकल्प भंग करके अपने कुल को कलंकित नहीं करना चाहता हूं 
राजपुत के हाथ से छुटा बाण और मुंह से निकला शब्द वापस नहीं जाते ।
नरपालदे ने अपने परके हुए 140 सैनिकों को साथ लिए और आस-पड़ोस नहीं बल्कि दूर-दराज तक वीरों को ललकारा पर कोई भी अंशिता संकट मोल लेकर सामना करना नहीं चाहते थे अब कुल कुंवर किसी संघर्षशील प्रतिनिधि की प्रतिमा में मारा मारा फिरता था उस की कामना थी कि कोई उसके सामने संघर्ष करें सर कटे धड़ लड़े मडे गैहगढ

दूसरी तरफ अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने गुजरात तथा काठियावाड़ विजय किया और सोमनाथ के मंदिर को भी नष्ट किया लौटते समय विजय वाहिनी के जालौर की ओर प्राण करने का समाचार मिला तो नरपालदे को चिर परीक्षित अभिलाषा पूर्ण करने का असर मिला 
जीरावल जिला सिरोही पाटन मुख्य मार्ग पर स्थित था इसलिए नरपाल दे ने जीरावल की सीमांत गांव निंबंज के वन में डेरा डाला 
वही से होकर मुसलमान फौज को गुजरना था राजपूतो वीरों के मनो में अधोलिखित भाव हिल रहे थे

मरदां मरणौ हकक है मगर पचीचा माय
गौखा रौवे गौरडी मरद हथाया मायं

जब मुसलमान साहि फौज गांवों को लूटती जनता को बंदी बनाती स्त्रियों का अपहरण करती ब्राह्मणों  पर अत्याचार करती गायों का वध करती जीरावल के पड़ोसी गांव गढ़ में पहुंची तो राजपूतों की टुकड़ियों ने मिथ्या विवाद लड़ने के लिए आग्रह किया उनसे युद्ध लड़ना ही पड़ेगा नहीं तो आगे बढ़ने नहीं दिया जाएगा इन्हीं प्रसंग में दोनों समूह मैं जंग छिड़ गई दूसरी तरफ नरपालदे ने अपने साथी गांगसी से कहा कि वह दूर खड़ा रह कर संग्राम को देखें और उनका पूरा वर्णन राणा साहब को सबके सामने करें तब गांगसी जरा सा हट के एक उच्ची जगह पर खड़ा हो गया 
उधर दोनों दलों के बीच मारकाट आरंभ हो गई प्रत्येक राजपूत को अगणय खिलजी सिपाहियों ने घेर लिया क्षत्रिय रणबांकुरों ने ऐसी मार काट मसाई की दुश्मनों के छक्के छूट गए परंतु एक विशाल सेना के सामने मुट्ठी भर राजपूत कब तक ठहर पाते
 अब एक-एक करके धराशाई होने लगे नरपालदे ने भी बिचो बोरियों को मौत के घाट उतारा इसी बीच एक विरोधी के झटके से नरपालदे का सिर धड़ से अलग हो गया सिर कटा होने पर उसने विकराल रुप धारण कर लिया और दोनों हाथों में तलवार ले भयंकर युद्ध करने लगा उसने ना केवल उस शत्रु का एक आगत से सिर उड़ा दिया अब अपितु उसके पश्चात प्रहारों की ऐसी जड़ी लगाई की जिधर से निकलता वही रणभूमि निर्जन हो जाती अंत में जब विपक्षी दल तितर-बितर हो गया तो अपनी अंगी के अंदर के पल्लू से तलवार को अकलुषित की और फिर  बैकुठ सिधार गया
गांगसी के लोहियानागढ़ पहुंचने का समाचार आग की तरह सब जगह फैल गया 
उसने ठाकुर साहब सहित पूरे जन समुदाय को नरपाल दे की तलवार का अवलोकन कराते हुए आंखों देखी घटना का विस्तार से विवरण सुनाया और तीर की तरह वहां से निकलकर दुराचारियों से जा भिड़ा तथा  अनेकानेक आतंकवादियों को मार कर रास्ते रवाना किया अतः उसने भी देव लोक की राह पकड़ी 
नरपाल दे की  पत्नी सहित 140 क्षत्रियानिया इनके पीछे केसुआ मैं सती हो गई ।

ठाकुर साहब ने केसुआ के गढ़ गांव में नरपाल दे सहित 140  वीरों की स्मृति में छतरी और रायपुर वडवज निंबज के बीच एक सबूतरा बनाया जो गोगरा के मामा जी के नाम से प्रसिद्ध है स्थानीय भाषा में लोग जुझार बावसी कहते हैं

पातो लड़यों पातशाह सु जाजल हुयो झुंझार ।
सोनगढ साको कियो पोहु मोटा पढीयार।
कट पडीया रायपुर अपचर वरीया अंग।
रिया संग नरपाल रे उण रजपुतो ने गणो रंग।
(श्री गाजण माता यूथ ब्रिगेड सभी देवल भाईयो से निवदेन करती है..की आप प्रतिहार लिखे या देवल प्रतिहार लिखे जिससे सभी को पता चल सके कि देवल प्रतिहार राजपूतों की शाखा है थोड़ा इस बात पर गौर करें)

सौजन्य:- श्री गाजण माता यूथ ब्रिगेड भारत

जय राणा नरपालदे प्रतिहार।।
जय मिहिरभोज प्रतिहार।।
जय मां चामुण्डा।।
जय लोहियानगढ।।

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